
#कोलेबिरा #सरहुल_पर्व : प्रकृति पूजन और भाईचारे के संदेश के साथ भव्य आयोजन हुआ।
सिमडेगा जिले के कोलेबिरा प्रखंड में सरहुल पर्व हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें विधायक नमन बिक्सल कोनगाड़ी सहित कई जनप्रतिनिधि शामिल हुए। सरना स्थलों पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। यह आयोजन प्रकृति के प्रति आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर उभरा।
- कोलेबिरा प्रखंड में सरहुल पर्व धूमधाम से मनाया गया।
- विधायक नमन बिक्सल कोनगाड़ी शोभायात्रा में हुए शामिल।
- सरना स्थलों पर पहान पुजार द्वारा विधि-विधान से पूजा।
- नीलांबर पीतांबर स्मारक भवन में सरना झंडा पूजा।
- शोभायात्रा विभिन्न मार्गों से होते हुए रण बहादुर सिंह चौक पहुंची।
सिमडेगा जिले के कोलेबिरा प्रखंड क्षेत्र में सरहुल पर्व पूरे पारंपरिक उत्साह और धार्मिक आस्था के साथ मनाया गया। इस दौरान क्षेत्र में भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। सरहुल पर्व के अवसर पर प्रकृति पूजन और सामूहिक सहभागिता ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।
प्रकृति पूजन के साथ शुरू हुआ पर्व का आयोजन
सरहुल पर्व की शुरुआत कोलेबिरा सरना स्थल पर पारंपरिक विधि-विधान के साथ हुई, जहां पहान पुजार द्वारा साल वृक्ष की पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान पुजारियों ने निर्जला उपवास रखकर प्रकृति की आराधना की और समाज की सुख-समृद्धि की कामना की।
इसके अलावा नीलांबर पीतांबर स्मारक भवन परिसर में सरना झंडा का विधिवत पूजन किया गया। वहीं नवाटोली सरना स्थल पर भी सरहुल के अवसर पर प्रकृति पूजा संपन्न हुई, जिसके बाद शोभायात्रा निकाली गई।
भव्य शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब
सरना स्थल से शुरू हुई शोभायात्रा कोलेबिरा के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए आगे बढ़ी। यह यात्रा कोलेबिरा मुख्य पथ, थाना मोड़, साहू बस्ती, पूजार टोली होते हुए कोलेबिरा शिव मंदिर पहुंची, जहां श्रद्धालुओं ने बूढ़ा महादेव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक किया।
इसके बाद शोभायात्रा बानो रोड, प्लस टू उच्च विद्यालय, बाजार होते हुए रण बहादुर सिंह चौक पहुंची। वहीं नवाटोली से निकली शोभायात्रा भी कोलेबिरा-सिमडेगा मुख्य मार्ग से होते हुए इसी चौक पर पहुंची, जहां दोनों जुलूसों का मिलन हुआ।
यहां पहान पुजार द्वारा सरना झंडा की पूजा-अर्चना की गई। इसके पश्चात सभी श्रद्धालु सरहुल गीतों और मांदर की थाप पर नाचते-गाते हुए सरना स्थल पहुंचे, जहां विभिन्न समूहों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किया।
विधायक नमन बिक्सल कोनगाड़ी ने दिया भाईचारे का संदेश
इस अवसर पर कोलेबिरा विधायक नमन बिक्सल कोनगाड़ी ने उपस्थित लोगों को सरहुल और ईद पर्व की शुभकामनाएं दीं।
नमन बिक्सल कोनगाड़ी ने कहा: “सरहुल प्रकृति को पूजने और उन्हें धन्यवाद देने का पर्व है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और आपसी भाईचारे के साथ रहने का संदेश देता है।”
उन्होंने आगे कहा कि सरहुल और ईद दोनों पर्व समाज में एकता और सौहार्द का प्रतीक हैं, जिन्हें मिलजुलकर मनाना चाहिए।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की रही उपस्थिति
इस मौके पर प्रखंड विकास पदाधिकारी सह अंचलाधिकारी अनूप कच्छप, थाना प्रभारी हर्ष कुमार शाह, जिला परिषद अध्यक्ष रोस प्रतिमा सोरेंग, प्रखंड प्रमुख दुतामी हेमरोम, उप प्रमुख सुनीता देवी, कोलेबिरा मुखिया अंजना लकड़ा, सांसद प्रतिनिधि सुनील खड़िया, कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा जिला अध्यक्ष रावेल लकड़ा, विधायक प्रतिनिधि श्यामलाल प्रसाद, सुलभ नेल्सन डुंगडुंग, कांग्रेस प्रखंड अध्यक्ष राकेश कोनगाड़ी, कांग्रेस युवा विधानसभा अध्यक्ष अमृत डुंगडुंग, कांग्रेस महिला प्रखंड अध्यक्ष महिमा केरकेट्टा, फुलकेरिया डांग, सुरेश द्विवेदी, सुमन गुड़िया, भाजपा मंडल अध्यक्ष अशोक इंदवार, पूर्व सांसद प्रतिनिधि चिंतामणि कुमार, जनेश्वर बिल्हौर, कांग्रेस मंडल जोसेफ सोरेंग, संजय डांग, अमरनाथ सिंह, अनुपम बैक, विनोद कुमार, कृष्णा दास, आश्रित इंदवार, अनूप पहन, कुलदीप सोरेंग, हेरेन केरकेट्टा, सुनिता कुल्लू, मनोज डुंगडुंग, अनिल लुगुन सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
पारंपरिक नृत्य और शांतिपूर्ण समापन
सरना स्थल स्थित अखाड़ा में विभिन्न गांवों से आए समूहों ने सरहुल गीतों पर पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने माहौल को जीवंत बना दिया। मांदर की थाप और लोकगीतों की गूंज ने पूरे आयोजन को यादगार बना दिया।
अंत में पूरे आयोजन का शांतिपूर्ण ढंग से समापन हुआ, जिससे क्षेत्र में सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का संदेश गया।
न्यूज़ देखो: प्रकृति और संस्कृति के संगम का जीवंत उदाहरण
कोलेबिरा में मनाया गया सरहुल पर्व यह दर्शाता है कि आज भी आदिवासी परंपराएं और प्रकृति के प्रति सम्मान समाज में गहराई से जुड़ा हुआ है। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है। अब यह जरूरी है कि इन परंपराओं को नई पीढ़ी तक संरक्षित और प्रसारित किया जाए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
प्रकृति से जुड़ें, संस्कृति को आगे बढ़ाएं
सरहुल जैसे पर्व हमें यह सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है। आज के समय में जब पर्यावरण संकट बढ़ रहा है, ऐसे त्योहार हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देते हैं।
हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को संजोकर रखें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। समाज में भाईचारे और एकता को मजबूत बनाना भी हम सभी का कर्तव्य है।






