
#चतरा #मानवीय_संवेदनशीलता : सड़क दुर्घटना में घायल आदिम जनजाति के बुजुर्ग की समाजसेवी ने स्वयं संभाली इलाज की जिम्मेदारी।
चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड में प्रमुख प्रतिनिधि एवं समाजसेवी श्रवण रजक ने मानवता की मिसाल पेश की है। सड़क दुर्घटना में घायल आदिम जनजाति बिरहोर समुदाय के बुजुर्ग को न केवल अस्पताल पहुंचाया गया, बल्कि इलाज के दौरान पूरी रात साथ रहकर देखरेख भी की गई। यह घटना प्रशासनिक जिम्मेदारी से आगे बढ़कर सामाजिक संवेदनशीलता का उदाहरण बनी है। क्षेत्र में इस मानवीय पहल की व्यापक सराहना हो रही है।
- लावालौंग प्रखंड के प्रमुख प्रतिनिधि सह समाजसेवी श्रवण रजक की पहल।
- आदिम जनजाति बिरहोर समुदाय के 61 वर्षीय बुजुर्ग सीता बिरहोर हुए थे घायल।
- सिमरिया से सदर अस्पताल चतरा तक स्वयं पहुंचाया गया घायल को।
- इलाज के दौरान रात भर अस्पताल में मौजूद रहे प्रमुख प्रतिनिधि।
- पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई।
चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड में एक बार फिर यह साबित हो गया कि यदि जनप्रतिनिधि चाहें तो प्रशासनिक दायित्व के साथ-साथ मानवीय जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई जा सकती है। प्रमुख प्रतिनिधि सह समाजसेवी श्रवण रजक ने सड़क दुर्घटना में घायल एक आदिम जनजाति के बुजुर्ग की मदद कर समाज के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
घटना सिमरिया थाना क्षेत्र के जबड़ा गांव की है, जहां बिरहोर समुदाय के बुजुर्ग सीता बिरहोर (उम्र लगभग 61 वर्ष), पिता बैहरा बिरहोर, अपने निजी कार्य से गए हुए थे। इसी दौरान सड़क दुर्घटना में वे गंभीर रूप से घायल हो गए। दुर्घटना के बाद स्थानीय स्तर पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया, लेकिन घायल की स्थिति को देखते हुए तत्काल मदद की आवश्यकता थी।
सूचना मिलते ही हरकत में आए प्रमुख प्रतिनिधि
जैसे ही इस दुर्घटना की सूचना लावालौंग प्रखंड प्रमुख प्रतिनिधि श्रवण रजक को मिली, उन्होंने बिना समय गंवाए तत्काल कार्रवाई की। उन्होंने पहले घायल को रेफरल अस्पताल सिमरिया भिजवाया, जहां प्राथमिक उपचार किया गया। चिकित्सकों ने गंभीर स्थिति को देखते हुए बेहतर इलाज के लिए सदर अस्पताल रेफर करने की सलाह दी।
इसके बाद प्रमुख प्रतिनिधि स्वयं घायल सीता बिरहोर को सदर अस्पताल चतरा लेकर पहुंचे। इस दौरान उनके साथ रमेश बिरहोर भी मौजूद थे। अस्पताल पहुंचने के बाद उन्होंने केवल औपचारिकता निभाकर वापस लौटना उचित नहीं समझा, बल्कि पूरी रात अस्पताल में रहकर घायल की स्थिति पर नजर बनाए रखी।
इलाज के दौरान निभाई पारिवारिक भूमिका
अस्पताल सूत्रों के अनुसार, घायल बुजुर्ग की हालत अब स्थिर बताई जा रही है और वह खतरे से बाहर हैं। इस पूरे इलाज के दौरान श्रवण रजक ने परिजन की तरह भूमिका निभाई। डॉक्टरों से लगातार संपर्क में रहकर इलाज की जानकारी ली और आवश्यक सहयोग प्रदान किया।
सुबह जब प्रमुख प्रतिनिधि अस्पताल से निकले, तो उन्होंने घायल के परिजनों को एक हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी प्रदान की, ताकि तत्काल जरूरतों को पूरा किया जा सके। यह सहयोग किसी सरकारी योजना के तहत नहीं, बल्कि पूरी तरह मानवीय भावना से किया गया।
समाज के लिए प्रेरणा बना यह मानवीय कार्य
आज के समय में, जब सड़क दुर्घटनाओं में लोग मदद करने से कतराते हैं और घायल को छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, ऐसे में श्रवण रजक द्वारा दिखाई गई संवेदनशीलता समाज के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। खासकर आदिम जनजाति बिरहोर समुदाय, जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में आता है, उनके लिए यह सहायता बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय पर इलाज नहीं मिलता, तो बुजुर्ग की जान भी जा सकती थी। प्रमुख प्रतिनिधि की तत्परता ने न केवल एक जान बचाई, बल्कि प्रशासन और समाज के बीच भरोसे को भी मजबूत किया है।
क्षेत्र में हो रही सराहना
इस मानवीय पहल की खबर फैलते ही लावालौंग और आसपास के इलाकों में श्रवण रजक की जमकर सराहना हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे जनप्रतिनिधि ही वास्तव में जनता के सच्चे सेवक होते हैं, जो संकट के समय आगे आकर मदद करते हैं।
स्थानीय लोगों ने यह भी कहा कि आदिम जनजातियों के लिए अक्सर सरकारी सुविधाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं, ऐसे में व्यक्तिगत स्तर पर की गई यह मदद भरोसे की नई किरण बनकर सामने आई है।
न्यूज़ देखो: जब पद से आगे बढ़कर निभाई जाती है जिम्मेदारी
यह घटना दिखाती है कि जनप्रतिनिधि केवल योजनाओं और बैठकों तक सीमित नहीं होते, बल्कि संकट के समय उनकी संवेदनशीलता ही उनकी असली पहचान बनती है। आदिम जनजाति जैसे वंचित वर्ग के लिए यह सहयोग बेहद मायने रखता है। ऐसे उदाहरण प्रशासनिक तंत्र को भी आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
इंसानियत अभी ज़िंदा है
दुर्घटना में घायल की मदद करना केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि इंसान होने की पहचान है।
ऐसे कार्य समाज में भरोसा और संवेदना को जीवित रखते हैं।
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