
#बरवाडीह #लातेहार #शिक्षा_सुधार : प्रशासनिक सख्ती से निजी स्कूलों की मनमानी पर लगी रोक — अभिभावकों को राहत।
बरवाडीह प्रखंड में निजी स्कूलों की मनमानी पर प्रभावी नियंत्रण का सकारात्मक परिणाम सामने आया है। पिछले तीन वर्षों से यहां री-एडमिशन फीस पूरी तरह बंद कर दी गई है और फीस वृद्धि को सीमित किया गया है। इस पहल से सैकड़ों अभिभावकों को आर्थिक राहत मिली है। जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर और शिक्षा विभाग की सक्रियता इसमें अहम रही।
- बरवाडीह प्रखंड में तीन वर्षों से री-एडमिशन फीस पूरी तरह बंद।
- संतोषी शेखर की पहल और शिक्षा विभाग की सख्ती का असर।
- फीस वृद्धि को अधिकतम 10 प्रतिशत तक सीमित किया गया।
- करीब 1000 से अधिक छात्रों के अभिभावकों को मिली राहत।
- आगे RTE के तहत 25% निशुल्क शिक्षा पर भी काम जारी।
लातेहार जिले के बरवाडीह प्रखंड में निजी विद्यालयों की मनमानी पर प्रभावी लगाम लगाकर एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। जहां राज्य के कई हिस्सों में निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों से मनमाने शुल्क वसूले जा रहे हैं, वहीं बरवाडीह में पिछले तीन वर्षों से री-एडमिशन फीस पूरी तरह समाप्त कर दी गई है।
इस निर्णय का सीधा लाभ प्रखंड के लगभग 1000 से अधिक बच्चों के अभिभावकों को मिला है, जिन्हें हर साल अनावश्यक आर्थिक बोझ से राहत मिली है।
संतोषी शेखर की पहल से शुरू हुआ बदलाव
बताया जाता है कि वर्ष 2022 में निर्वाचित होने के बाद जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने निजी विद्यालयों की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाई थी। उन्होंने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए प्रशासन और शिक्षा विभाग का ध्यान आकर्षित किया।
इसके बाद शिक्षा विभाग द्वारा सख्त निर्देश जारी किए गए, जिसके तहत निजी स्कूलों में री-एडमिशन फीस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
संतोषी शेखर ने कहा: “शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है, ऐसे में अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालना बिल्कुल भी उचित नहीं है।”
फीस वृद्धि पर भी लगाया गया नियंत्रण
री-एडमिशन फीस पर रोक लगाने के साथ-साथ निजी स्कूलों द्वारा मनमानी फीस वृद्धि पर भी नियंत्रण लगाया गया। विभागीय निर्देशों के अनुसार फीस में अधिकतम 10 प्रतिशत तक ही वृद्धि की अनुमति दी गई।
इस निर्णय के बाद वर्ष 2023 से सभी निजी विद्यालयों ने नियमों का पालन करते हुए री-एडमिशन फीस लेना बंद कर दिया और निर्धारित सीमा के भीतर ही फीस वृद्धि की।
अभिभावकों को मिली बड़ी राहत
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा अभिभावकों को हुआ है, जिन्हें हर साल बच्चों के पुनः नामांकन के नाम पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता था। अब इस व्यवस्था के समाप्त होने से उनकी आर्थिक स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
अभिभावकों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इससे शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और न्यायसंगत व्यवस्था को बढ़ावा मिला है।
आगे और सुधार की तैयारी
जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने बताया कि भविष्य में शिक्षा के क्षेत्र में और भी सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
साथ ही किताबों की कीमतों को नियंत्रित करने और अन्य शैक्षणिक खर्चों को कम करने पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि हर वर्ग के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।
बरवाडीह बना मिसाल
बरवाडीह प्रखंड का यह मॉडल अन्य क्षेत्रों के लिए एक उदाहरण बन सकता है, जहां अभी भी निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावक परेशान हैं। यदि इसी तरह प्रशासन और जनप्रतिनिधि मिलकर कार्य करें, तो शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जनहितकारी बनाया जा सकता है।
न्यूज़ देखो: क्या यह मॉडल पूरे राज्य में लागू होगा
बरवाडीह में निजी स्कूलों पर नियंत्रण का यह सफल प्रयोग यह सवाल खड़ा करता है कि क्या इस मॉडल को पूरे राज्य में लागू किया जा सकता है। जब एक प्रखंड में यह संभव है, तो अन्य जिलों में क्यों नहीं? अब जरूरत है कि सरकार और शिक्षा विभाग इस पहल को व्यापक स्तर पर लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
शिक्षा का अधिकार, हर बच्चे तक पहुंचे
शिक्षा केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि हर बच्चे का अधिकार है।
जब समाज और प्रशासन मिलकर प्रयास करते हैं, तभी बदलाव संभव होता है।
आइए, हम भी शिक्षा के अधिकार के प्रति जागरूक बनें और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं।
अपनी राय कमेंट में साझा करें, खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं और बदलाव की इस पहल का हिस्सा बनें।






