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मनरेगा को कमजोर करने की साजिश बर्दाश्त नहीं — हृदयानंद मिश्रा का केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार

#झारखंड #मनरेगा_अधिकार : बजट कटौती और भुगतान संकट पर कांग्रेस नेता ने उठाए गंभीर सवाल।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हृदयानंद मिश्रा ने मनरेगा योजना को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों पर कड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि बजट कटौती, भुगतान में देरी और तकनीकी शर्तों के कारण ग्रामीण मजदूरों का अधिकार कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और 150 दिन का काम सुनिश्चित करने की मांग दोहराई। यह बयान ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के भविष्य से जुड़ा अहम मुद्दा बन गया है।

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  • मनरेगा कानून को यूपीए सरकार ने ग्रामीण रोजगार सुरक्षा के लिए लागू किया था।
  • वर्तमान बजट में 4,000 करोड़ रुपये की कटौती का आरोप।
  • 20 प्रतिशत बजट पुराने बकाया भुगतान में खर्च होने की आशंका।
  • आधार आधारित भुगतान और एनएमएमएस को बताया बहिष्करणकारी।
  • न्यूनतम मजदूरी 400 रुपये और 150 दिन काम की मांग।
  • कांग्रेस पार्टी ने सड़क से संसद तक संघर्ष का ऐलान किया।

ग्रामीण भारत में रोजगार की गारंटी देने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम योजना एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं झारखंड सरकार के हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड के सदस्य हृदयानंद मिश्रा ने मनरेगा को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए इसे गरीब विरोधी करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह योजना केवल रोजगार नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के लिए सामाजिक सुरक्षा की रीढ़ है, जिसे योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया जा रहा है।

मनरेगा की ऐतिहासिक भूमिका

हृदयानंद मिश्रा ने कहा कि मनरेगा कानून देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि है। इस कानून ने पहली बार ग्रामीण गरीबों को कानूनी रूप से रोजगार का अधिकार दिया। उन्होंने कहा कि इस योजना ने सूखा, पलायन और भुखमरी से जूझ रहे करोड़ों परिवारों को सम्मानजनक जीवन का सहारा दिया।

हृदयानंद मिश्रा ने कहा:
“मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के गरीबों के आत्मसम्मान और जीविका की गारंटी है।”

बजट कटौती पर गंभीर सवाल

उन्होंने आरोप लगाया कि चालू वित्त वर्ष में मनरेगा के लिए केवल 86,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि बजट में लगभग 4,000 करोड़ रुपये की कटौती की गई है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि कुल बजट का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा पिछले वर्षों के बकाया भुगतान को निपटाने में ही खर्च हो जाएगा।

हृदयानंद मिश्रा ने कहा कि इससे नए रोजगार सृजन पर सीधा असर पड़ेगा और लाखों मजदूर काम से वंचित हो सकते हैं।

तकनीकी बाधाओं से मजदूरों का बहिष्कार

मनरेगा में लागू की गई आधार आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS) और नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) को लेकर भी उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि ये व्यवस्थाएं तकनीकी रूप से सक्षम लोगों के लिए बनाई गई हैं, जबकि ग्रामीण मजदूर आज भी नेटवर्क, स्मार्टफोन और तकनीकी ज्ञान की कमी से जूझ रहे हैं।

हृदयानंद मिश्रा ने कहा:
“तकनीक के नाम पर गरीब मजदूरों को काम और मजदूरी से वंचित करना अन्याय है।”

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उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर मजदूरी भुगतान महीनों तक लंबित रहता है, जिससे मजदूर कर्ज और भूख के चक्र में फंस जाते हैं।

महंगाई के मुकाबले बेहद कम मजदूरी

कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि मौजूदा मजदूरी दर महंगाई के अनुपात में बेहद कम है। उन्होंने न्यूनतम 400 रुपये प्रतिदिन मजदूरी तय करने की मांग करते हुए कहा कि आज के समय में मौजूदा दर पर परिवार का भरण-पोषण असंभव है।

कांग्रेस की पांच प्रमुख मांगें

हृदयानंद मिश्रा ने मनरेगा को प्रभावी बनाने के लिए कांग्रेस पार्टी की ओर से स्पष्ट मांगें रखीं—

  • मनरेगा के लिए पर्याप्त और वास्तविक जरूरत के अनुरूप बजट
  • न्यूनतम दैनिक मजदूरी 400 रुपये सुनिश्चित की जाए।
  • मजदूरी का समयबद्ध और पारदर्शी भुगतान हो।
  • आधार आधारित भुगतान प्रणाली और एनएमएमएस की अनिवार्यता समाप्त की जाए।
  • वार्षिक गारंटीकृत कार्य दिवस 100 से बढ़ाकर 150 किए जाएं।

उन्होंने कहा कि इन मांगों के बिना मनरेगा केवल कागजों की योजना बनकर रह जाएगी।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव

हृदयानंद मिश्रा ने आगाह किया कि मनरेगा कमजोर होने का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि मजदूरी, पलायन और सामाजिक स्थिरता पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जब गांव में रोजगार नहीं मिलेगा, तो युवा मजबूरी में शहरों की ओर पलायन करेंगे, जिससे सामाजिक असंतुलन बढ़ेगा।

न्यूज़ देखो: मनरेगा बनाम नीतिगत उदासीनता

यह बयान साफ करता है कि मनरेगा केवल रोजगार योजना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का माध्यम है। बजट कटौती और तकनीकी शर्तें सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो ग्रामीण संकट और गहराएगा। सरकार को जवाब देना होगा कि वह मनरेगा को मजबूत करना चाहती है या धीरे-धीरे निष्क्रिय। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

ग्रामीण अधिकारों की रक्षा का समय

मनरेगा का भविष्य करोड़ों मजदूरों के वर्तमान और कल से जुड़ा है। यदि योजनाएं कमजोर होंगी, तो समाज की नींव हिलेगी।
आज जरूरत है कि नागरिक सवाल पूछें, नीति पर नजर रखें और अधिकारों के लिए संगठित हों।
ग्रामीण भारत की आवाज को दबने न दें।
अपनी राय कमेंट में साझा करें, इस खबर को आगे बढ़ाएं और रोजगार के अधिकार की लड़ाई में सहभागी बनें।

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