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बेतला में बाघों की निरंतर मौजूदगी से वन्यजीव संरक्षण को मिली नई पहचान, उमेश दुबे के नेतृत्व की हो रही सराहना

#बरवाडीह #वन्यजीव_संरक्षण : बेतला नेशनल पार्क में बाघों की नियमित मौजूदगी ने मजबूत वन प्रबंधन की तस्वीर पेश की।

लातेहार जिले के बेतला नेशनल पार्क में लगातार बाघों की मौजूदगी वन्यजीव संरक्षण की बड़ी सफलता के रूप में सामने आई है। पलामू टाइगर रिज़र्व अंतर्गत इस क्षेत्र में बाघों का बार-बार दिखना प्रभावी वन प्रबंधन और सुरक्षित पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है। प्रभारी रेंजर उमेश दुबे के नेतृत्व में सुरक्षा, निगरानी और स्थानीय सहभागिता के प्रयासों को व्यापक सराहना मिल रही है। यह उपलब्धि पर्यटन और जैव विविधता दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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  • बेतला नेशनल पार्क में बीते महीनों में कई बार बाघों की मौजूदगी की पुष्टि।
  • प्रभारी रेंजर उमेश दुबे के नेतृत्व में सख्त सुरक्षा और आधुनिक निगरानी व्यवस्था।
  • कैमरा ट्रैप और ड्रोन से बाघों की गतिविधियों पर निरंतर नजर।
  • स्थानीय ग्रामीणों और पर्यटकों में उत्साह, वन विभाग की खुलकर प्रशंसा।
  • बाघों की मौजूदगी को संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत माना जा रहा है।

पलामू टाइगर रिज़र्व के अंतर्गत स्थित बेतला नेशनल पार्क एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। यहां लगातार बाघों के देखे जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि यह क्षेत्र बाघों के लिए सुरक्षित और अनुकूल आवास बनता जा रहा है। वन्यजीव प्रेमियों के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीण और पर्यटक भी इसे संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता मान रहे हैं। बेतला की यह उपलब्धि झारखंड के वन्यजीव मानचित्र पर इसकी अहमियत को और मजबूत करती है।

बेतला में बाघों की बढ़ती मौजूदगी

बीते कुछ महीनों के दौरान बेतला नेशनल पार्क में कई बार बाघों को खुले जंगल में विचरण करते देखा गया है। कभी पर्यटकों ने सफारी के दौरान बाघ को जंगल की पगडंडी पार करते देखा, तो कभी कैमरा ट्रैप में उसकी स्पष्ट तस्वीरें कैद हुईं। इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि बेतला का जंगल न केवल सुरक्षित है, बल्कि बाघों की आवश्यकताओं के अनुरूप संसाधनों से भी समृद्ध है।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी जंगल में शीर्ष शिकारी प्रजाति, जैसे बाघ, की मौजूदगी पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन का प्रमाण होती है। इसका अर्थ है कि वहां शिकार प्रजातियों की संख्या संतुलित है, जल स्रोत उपलब्ध हैं और मानवीय हस्तक्षेप सीमित है।

उमेश दुबे के नेतृत्व में बदली तस्वीर

प्रभारी रेंजर उमेश दुबे ने बेतला क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालने के बाद से ही वन सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। अवैध शिकार पर सख्त नियंत्रण, नियमित पैदल गश्ती, मोटरसाइकिल और वाहन गश्ती के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का प्रभावी उपयोग किया गया। कैमरा ट्रैप, ड्रोन निगरानी और रिसर्च यूनिट की मदद से वन्यजीवों की गतिविधियों पर चौबीसों घंटे नजर रखी जा रही है।

प्रभारी रेंजर उमेश दुबे ने कहा: “वन्यजीव संरक्षण किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है। यह पूरी टीम और स्थानीय समुदाय के सहयोग से ही संभव हो पाता है।”

उनके नेतृत्व में वन विभाग की सक्रियता से जंगल में भयमुक्त वातावरण तैयार हुआ, जिसका सकारात्मक असर सीधे बाघों की मौजूदगी के रूप में सामने आया।

ग्रामीणों की भागीदारी से मजबूत हुआ संरक्षण

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पहले जंगल के आसपास अवैध गतिविधियों की आशंका बनी रहती थी, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। वनकर्मियों की नियमित मौजूदगी और जागरूकता अभियानों से ग्रामीणों में भी वन्यजीव संरक्षण को लेकर सकारात्मक सोच विकसित हुई है।

ग्रामीणों के अनुसार, उमेश दुबे स्वयं गांवों में जाकर लोगों से संवाद करते हैं और बाघों व अन्य वन्यजीवों के महत्व के बारे में समझाते हैं। किसी भी समस्या पर त्वरित कार्रवाई का भरोसा मिलने से ग्रामीणों का वन विभाग पर विश्वास बढ़ा है।

पर्यटकों में दिखा खास उत्साह

बेतला नेशनल पार्क में बाघों की मौजूदगी से पर्यटन को भी नई रफ्तार मिली है। हाल के दिनों में जिन पर्यटकों ने बाघ को अपनी आंखों से देखा, उनके लिए यह अनुभव अविस्मरणीय रहा। कई पर्यटकों ने कहा कि प्राकृतिक जंगल में खुले में बाघ देखना रोमांचक और प्रेरणादायक अनुभव है।

पर्यटकों का मानना है कि बेहतर प्रबंधन और ईमानदार नेतृत्व के कारण ही बेतला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहा है। इससे स्थानीय गाइड, होटल व्यवसाय और अन्य पर्यटन से जुड़े लोगों की आय में भी वृद्धि हो रही है।

मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, बेतला क्षेत्र में हिरण, सांभर, चीतल और जंगली सूअर जैसी प्रजातियों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। यह बाघों के लिए मजबूत भोजन श्रृंखला का निर्माण करता है। इसके साथ ही जंगल के भीतर प्राकृतिक जलस्रोतों का संरक्षण और नए जलकुंडों का निर्माण भी बाघों के अनुकूल वातावरण बनाने में सहायक साबित हुआ है।

भविष्य की योजनाएं

प्रभारी रेंजर उमेश दुबे ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में संरक्षण प्रयासों को और सशक्त किया जाएगा। बाघों के साथ-साथ अन्य दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। उनका कहना है कि संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है, जिसे योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा।

न्यूज़ देखो: बेतला बना संरक्षण की मिसाल

बेतला नेशनल पार्क में बाघों की लगातार मौजूदगी यह दर्शाती है कि सही नेतृत्व और सामूहिक प्रयास से वन्यजीव संरक्षण संभव है। यह सफलता झारखंड के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है। अब चुनौती है इस उपलब्धि को लंबे समय तक बनाए रखने की। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

जंगल सुरक्षित तो भविष्य सुरक्षित

बेतला की सफलता बताती है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य से विकास संभव है।
वन्यजीवों की सुरक्षा हमारी साझा जिम्मेदारी है।
आइए, संरक्षण के इन प्रयासों को और मजबूत बनाएं।
अपनी राय कमेंट करें, खबर साझा करें और पर्यावरण संरक्षण का संदेश फैलाएं।

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Akram Ansari

बरवाडीह, लातेहार

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