मैकलुस्कीगंज के हेसालोंग में मृत्यु भोज प्रथा खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला, समाज ने दिखाई नई दिशा

मैकलुस्कीगंज के हेसालोंग में मृत्यु भोज प्रथा खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला, समाज ने दिखाई नई दिशा

author Jitendra Giri
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#खलारी #सामाजिक_सुधार : सुड़ी समाज ने बैठक में सर्वसम्मति से मृत्यु भोज प्रथा समाप्त करने का निर्णय लिया।

रांची जिले के खलारी क्षेत्र के हेसालोंग गांव में सुड़ी समाज ने मृत्यु भोज प्रथा समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। यह फैसला दामोदर नदी तट पर आयोजित बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया। समाज ने पीड़ित परिवारों को आर्थिक बोझ से राहत देने का संकल्प लिया। इस पहल को सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

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  • हेसालोंग गांव, लपरा पंचायत में सुड़ी समाज की महत्वपूर्ण बैठक।
  • कुलदीप साहु की अध्यक्षता में मृत्यु भोज प्रथा समाप्त करने का निर्णय।
  • गरीब परिवारों को आर्थिक बोझ से राहत देने की पहल।
  • अब केवल शोक संवेदना और साधारण प्रसाद की परंपरा अपनाई जाएगी।
  • बैठक में सोनू साहु, संदीप कुमार सहित सैकड़ों लोग मौजूद।

खलारी प्रखंड के मैकलुस्कीगंज क्षेत्र अंतर्गत लपरा पंचायत के हेसालोंग गांव में सामाजिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। सुड़ी समाज द्वारा आयोजित बैठक में मृत्यु भोज प्रथा को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। दामोदर नदी तट पर आयोजित इस बैठक में बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए और सर्वसम्मति से इस कुरीति को खत्म करने पर सहमति जताई।

यह निर्णय समाज में लंबे समय से चली आ रही उस परंपरा के खिलाफ है, जिसे अब लोग आर्थिक बोझ और सामाजिक दबाव का कारण मानने लगे हैं।

आर्थिक बोझ बनी थी मृत्यु भोज प्रथा

बैठक के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि मृत्यु भोज की परंपरा धीरे-धीरे समाज के लिए अभिशाप बनती जा रही है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों के लिए यह भले सामान्य हो, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए यह भारी बोझ साबित हो रही है।

बैठक में वक्ताओं ने कहा: “मृत्यु भोज के कारण कई परिवार कर्ज में डूब जाते हैं, इसलिए इसे समाप्त करना जरूरी है।”

इस मुद्दे पर गहन चर्चा के बाद समाज ने इस प्रथा को समाप्त करने का सामूहिक निर्णय लिया।

नई व्यवस्था: शोक संवेदना और सादगी

समाज ने यह तय किया कि अब बारहवीं (बारहवां) के अवसर पर भोज का आयोजन नहीं किया जाएगा। इसके स्थान पर समाज के लोग पीड़ित परिवार के घर जाकर शोक संवेदना व्यक्त करेंगे।

इस दौरान वे आपसी संवाद करेंगे और घर में उपलब्ध साधारण प्रसाद ग्रहण कर वापस लौट जाएंगे। इस पहल से न केवल अनावश्यक खर्च कम होगा, बल्कि सामाजिक संबंध भी मजबूत होंगे।

अंतिम संस्कार में स्वतः सहभागिता

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि अब किसी को मृत्यु की सूचना देने के लिए विशेष बुलावा नहीं भेजा जाएगा। समाज के लोग सूचना मिलते ही स्वयं अंतिम संस्कार में शामिल होंगे।

इससे सामाजिक जिम्मेदारी और आपसी सहयोग की भावना को बढ़ावा मिलेगा।

पारंपरिक कार्यक्रम रहेंगे जारी

हालांकि मृत्यु भोज प्रथा को समाप्त किया गया है, लेकिन दसकर्मा से जुड़े पारंपरिक धार्मिक कार्यक्रम पहले की तरह जारी रहेंगे। बैठक में पंडितों से जुड़े अनुष्ठानों को सरल और व्यावहारिक बनाने पर भी चर्चा की गई।

यह निर्णय यह दर्शाता है कि समाज परंपराओं को बनाए रखते हुए अनावश्यक और बोझिल कुरीतियों को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

समाज में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद

इस फैसले को समाज में एक सकारात्मक और प्रगतिशील कदम के रूप में देखा जा रहा है। इससे न केवल आर्थिक बोझ कम होगा, बल्कि सामाजिक समानता और सहयोग की भावना भी मजबूत होगी।

इस पहल से अन्य समाजों को भी प्रेरणा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

बैठक में बड़ी संख्या में लोग रहे उपस्थित

इस महत्वपूर्ण बैठक में सोनू साहु, संदीप कुमार, गोपाल साहु, जितेंद्र भारतीय, बसंत कुमार, पंकज, सुमित कुमार, मदन साहु, ठाकुर साहु सहित सैकड़ों गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

सभी ने एकजुट होकर इस निर्णय को लागू करने का संकल्प लिया और समाज में जागरूकता फैलाने की बात कही।

न्यूज़ देखो: कुरीतियों के खिलाफ जागरूक समाज की पहल

हेसालोंग गांव का यह निर्णय दर्शाता है कि जब समाज खुद बदलाव के लिए आगे आता है, तो बड़ी से बड़ी कुरीतियां भी खत्म हो सकती हैं। मृत्यु भोज जैसी प्रथाएं लंबे समय से आर्थिक और सामाजिक बोझ बन चुकी थीं। ऐसे में यह पहल अन्य समाजों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है। अब यह देखना अहम होगा कि यह निर्णय कितनी प्रभावी ढंग से लागू होता है और क्या अन्य समुदाय भी इसे अपनाते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

बदलाव की शुरुआत समाज से ही होती है

समाज की बेहतरी के लिए बदलाव जरूरी है और इसकी शुरुआत हमें खुद से करनी होगी।
अनावश्यक परंपराओं को छोड़कर सादगी और सहयोग की राह अपनाना ही सच्चा सुधार है।
ऐसे फैसले न केवल आर्थिक बोझ कम करते हैं, बल्कि समाज को एक नई दिशा भी देते हैं।
आइए, हम भी अपने आसपास सकारात्मक बदलाव लाने में योगदान दें।

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Written by

खलारी, रांची

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