
#सिमडेगा #पर्यटन_विकास : पूर्व मंत्री बिमला प्रधान ने केलाघाघ में नए ट्रैकिंग रूट के विकास का स्वागत किया, लेकिन प्रशासन द्वारा विपक्ष की उपेक्षा और पुरानी जगह को नई खोज बताने पर कड़ी आपत्ति जताई।
- सिमडेगा जिला प्रशासन ने केलाघाघ में नए ट्रैकिंग रूट के विकास की घोषणा की।
- पूर्व मंत्री बिमला प्रधान ने प्रयासों को सराहते हुए विपक्ष की अनदेखी पर नाराजगी जताई।
- उन्होंने बताया कि यह जगह वर्षों पुरानी रोमांचकारी लोकेशन है, नई खोज नहीं।
- बिमला प्रधान ने अपने स्कूल व कॉलेज काल के अनुभवों का उदाहरण देकर ऐतिहासिक तथ्य रखे।
- मानसून में यह इलाका पूरी तरह जलमग्न होने की समस्या की ओर ध्यान दिलाया।
- विभिन्न समितियों में विपक्ष को शामिल न करने पर प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाए।
सिमडेगा में पर्यटन स्थल केलाघाघ को नए रूप में विकसित करने की प्रशासनिक पहल के बीच राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने लगी है। जिला प्रशासन द्वारा घोषित नए ट्रैकिंग रूट को लेकर पूर्व मंत्री श्रीमती बिमला प्रधान ने सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए इसे पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिस स्थान को प्रशासन नई खोज बता रहा है, वह वास्तव में दशकों पुरानी प्रसिद्ध रोमांचकारी जगह है जहाँ लोग वर्षों से जाते रहे हैं। उन्होंने इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता, इतिहास और ग्रामीणों के अनुभवों का हवाला देते हुए प्रशासन की कुछ दावों पर नाराजगी व्यक्त की।
वर्षों पुरानी ट्रैकिंग जगह को नई खोज बताने पर आपत्ति
पूर्व मंत्री बिमला प्रधान ने कहा कि यह स्थान कोई नई खोज नहीं, बल्कि पहले से ही व्यापक रूप से जाना जाता रहा है।
बिमला प्रधान ने कहा: “जिला प्रशासन जिस ट्रैकिंग रूट को नई खोज बता रहा है, वहां मैं अपने स्कूल के दिनों से जाती रही हूं और उस समय भी यह लोगों का पसंदीदा पिकनिक स्पॉट था।”
उन्होंने यादगार किस्सों को बताते हुए कहा कि 1974–75 में छिन्दा जलाशय पर डैम बनने से पहले यहां एक सुंदर प्राकृतिक झरना बहता था, जो स्थानीय लोगों का मुख्य आकर्षण था। उन्होंने बताया कि कॉलेज के दिनों में भी वे चिमटीघाट, बरपानी और आसपास के क्षेत्रों में ट्रैकिंग कर चुकी हैं।
ट्रैकिंग रूट की वास्तविकता: बरसात में पूरी तरह जलमग्न
पूर्व मंत्री ने क्षेत्र की भौगोलिक और मौसमी चुनौतियों पर भी तथ्यात्मक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि प्रशासन जिस रूट को ट्रैकिंग के लिए उपयुक्त बता रहा है, वह केवल गर्मी और जाड़े के दिनों में ही सुरक्षित होता है।
उन्होंने बताया कि बरसात के समय यह पूरा इलाका पानी से भर जाता है और यहां से आवागमन लगभग असंभव हो जाता है। उनके मुताबिक आज भी आसपास के गांवों से लोग उनके घर काम करने आते हैं, लेकिन बारिश के मौसम में पानी भर जाने के कारण महीनों तक नहीं आ पाते।
जंगल और वन्यजीवों से भरा रहा है पूरा इलाका
बिमला प्रधान ने बताया कि उनका वर्तमान आवास जिस जगह पर है, वहां पहले घना जंगल था और जंगली जानवरों का लगातार आना–जाना लगा रहता था। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र की प्राकृतिक और जैविक समृद्धि को ध्यान में रखते हुए किसी भी प्रकार की विकास योजना बनाते समय व्यवहारिक पक्षों को समझना बेहद जरूरी है।
विपक्ष को नजरअंदाज करने पर नाराजगी
पूर्व मंत्री ने इस मुद्दे पर प्रशासन की कार्यशैली पर नाराजगी जताई और कहा कि विभिन्न समितियों में विपक्ष के सदस्यों को शामिल करने का स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन सिमडेगा में विपक्ष की घोर उपेक्षा की जा रही है।
बिमला प्रधान ने कहा: “कुछ नामों को छोड़ दें तो लगभग सभी समितियों में विपक्ष को दरकिनार किया गया है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।”
उन्होंने मांग की कि पर्यटन विकास जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में सभी जनप्रतिनिधियों को समान रूप से शामिल किया जाए, क्योंकि इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया मजबूत होती है और विकास कार्य अधिक प्रभावी होते हैं।
पर्यटन विकास की पहल का स्वागत, सुधार की भी अपेक्षा
हालांकि उन्होंने प्रशासन के पर्यटन विकास के प्रयासों का स्वागत किया, लेकिन उम्मीद जताई कि भविष्य की योजनाओं में ऐतिहासिक तथ्यों, स्थानीय लोगों के अनुभवों और जमीनी हकीकत को भी शामिल किया जाएगा।
न्यूज़ देखो: केलाघाघ विकास में पारदर्शिता और सहभागिता की जरूरत
केलाघाघ ट्रैकिंग रूट को लेकर शुरू हुई यह बहस प्रशासन के दावों और स्थानीय स्मृतियों के बीच के अंतर को उजागर करती है। पर्यटन क्षेत्र में विकास की पहल सराहनीय है, परंतु यह तभी सार्थक होगी जब प्रशासन सभी पक्षों को शामिल करते हुए पारदर्शी तरीके से काम करे। विपक्ष की उपेक्षा लोकतांत्रिक संतुलन को बाधित करती है और योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रभाव डालती है।
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स्थानीय आवाज़ों का सम्मान — सहभागिता से ही होगा सच्चा पर्यटन विकास
एक क्षेत्र की पहचान उसकी इतिहास, संस्कृति और वहां के लोगों की स्मृतियों से बनती है। केलाघाघ जैसे प्राकृतिक स्थलों का विकास तभी टिकाऊ होगा जब प्रशासन स्थानीय समुदाय, जनप्रतिनिधियों और विशेषज्ञों को साथ लेकर चले।







