
#हिंदीसाहित्य #साहित्यिकविरासत : छायावाद की परंपरा को अंतिम आलोक देने वाले आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री।
हिंदी साहित्य में छायावाद के उत्कर्ष और अवसान के दौर में आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने इस काव्यधारा को नई गरिमा प्रदान की। 5 फरवरी 1916 को बिहार के गया जिले में जन्मे शास्त्री जी संस्कृत और हिंदी के अद्वितीय विद्वान थे। उन्होंने छायावाद को केवल जीवित ही नहीं रखा, बल्कि उसे शास्त्रीय ऊँचाई और आधुनिक संवेदना से जोड़ा। उनका साहित्य आज भी छायावादी सौंदर्यबोध की शाश्वत प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।
- आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री को छायावाद का पाँचवाँ स्तंभ माना जाता है।
- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का गहरा साहित्यिक सान्निध्य।
- संस्कृत और हिंदी दोनों भाषाओं में कालजयी कृतियाँ।
- ‘राधा’ महाकाव्य में छायावाद का आधुनिक दार्शनिक विस्तार।
- पद्मश्री सम्मान को दो बार अस्वीकार कर दिया।
हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद का युग अपनी कोमल संवेदनाओं, रहस्यवाद और सौंदर्यबोध के लिए जाना जाता है। जब प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा जैसे स्तंभ अपनी सृजन-यात्रा के अंतिम पड़ाव पर थे, तब आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का उदय छायावाद के लिए एक नई ऊर्जा बनकर सामने आया। उन्होंने इस काव्यधारा को न केवल संभाला, बल्कि उसे शास्त्रीय गंभीरता और संगीतात्मक ऊँचाई प्रदान की।
साहित्यिक पृष्ठभूमि और निराला का सान्निध्य
5 फरवरी 1916 को बिहार के गया जिले में जन्मे आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री मूलतः संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। अल्पायु में ही उनकी प्रतिभा प्रकट हो गई थी। मात्र 16–17 वर्ष की अवस्था में रचित संस्कृत गीत काव्य ‘काकली’ उनकी असाधारण मेधा का प्रमाण है।
उनके जीवन और साहित्य पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का गहरा प्रभाव रहा। निराला ने ही उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें हिंदी में सृजन के लिए प्रेरित किया। मुजफ्फरपुर स्थित उनका आवास ‘निराला निकेतन’ दशकों तक हिंदी साहित्य का एक सक्रिय केंद्र बना रहा।
छायावादी काव्य का परिष्कार
छायावाद की प्रमुख विशेषताएँ—प्रकृति का मानवीकरण, आत्मनिष्ठता और सूक्ष्म सौंदर्यबोध—शास्त्री जी के काव्य में परिष्कृत रूप में दिखाई देती हैं। उन्होंने छायावाद को दुरूह होने से बचाते हुए उसमें गीति तत्व को प्रधानता दी।
उनकी प्रमुख कृतियाँ ‘रूप-अरूप’, ‘तीर तरंग’, ‘शिप्रा’ और ‘अवंतिका’ छायावादी सौंदर्य के चरम उत्कर्ष को प्रस्तुत करती हैं। जहाँ पंत ने प्रकृति की सुकुमारता को शब्द दिए, वहीं शास्त्री जी ने प्रकृति के भीतर छिपे संगीत को काव्यात्मक स्वर दिया।
‘राधा’ महाकाव्य और दार्शनिक विस्तार
आचार्य शास्त्री का महाकाव्य ‘राधा’ उनके साहित्यिक चिंतन का शिखर माना जाता है। सात खंडों में विभक्त इस कृति में राधा को पारंपरिक सीमाओं से निकालकर एक आधुनिक, मानवीय और दार्शनिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें प्रेम को केवल विरह और मिलन तक सीमित न रखकर वैश्विक चेतना के रूप में देखा गया है। नारी यहाँ प्रेरणा और सृजन की शक्ति के रूप में उभरती है।
नवगीत के अग्रदूत के रूप में योगदान
छायावाद के साथ-साथ शास्त्री जी ने साहित्य को जड़ नहीं होने दिया। जब छायावाद बोझिल होने लगा, तब उन्होंने उसे नवगीत की ओर मोड़ा। लोकधुनों और शास्त्रीय रागों के अद्भुत समन्वय से उनके गीत जनमानस में रच-बस गए।
उनका प्रसिद्ध गीत “किसने बांसुरी बजाई?” छायावादी स्पर्श और आधुनिक लय का अनुपम उदाहरण है।
स्वाभिमान और जीवन-दर्शन
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी मनीषी भी थे। उन्होंने 1994 और 2010 में भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले पद्मश्री सम्मान को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि उनके शिष्य उनसे बड़े पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। यह निर्णय उनके जीवन-दर्शन और छायावादी स्वाभिमान का प्रतीक था।
आचार्य शास्त्री ने छायावाद को उस समय संभाला, जब आलोचक इसे समाप्त मान चुके थे। उन्होंने सिद्ध किया कि छायावाद कोई सीमित कालखंड नहीं, बल्कि एक शाश्वत दृष्टि है। उनके निधन के साथ हिंदी साहित्य के स्वर्ण युग की एक अंतिम जीवंत कड़ी टूट गई।
न्यूज़ देखो: छायावाद की शाश्वत चेतना के संरक्षक
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का साहित्य यह बताता है कि सृजन की महान परंपराएँ समय से परे होती हैं। उन्होंने छायावाद को केवल बचाया नहीं, बल्कि उसे नई पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बनाया। आज के बाजारवादी और सपाट काव्य-परिदृश्य में उनका साहित्य भाषा की मिठास और गहन संवेदना की याद दिलाता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
साहित्य से जुड़ाव ही सांस्कृतिक चेतना
आचार्य शास्त्री का काव्य हमें हमारी भाषाई जड़ों से जोड़ता है। ऐसे साहित्यकारों को पढ़ना केवल अध्ययन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है। यदि आप हिंदी साहित्य और उसकी विरासत को सहेजना चाहते हैं, तो इस लेख को साझा करें, अपनी राय व्यक्त करें और नई पीढ़ी तक इस चेतना को पहुँचाएँ। साहित्य तभी जीवित रहता है, जब पाठक सक्रिय रहते हैं।








