Editorial

डोंबारीबुरु गोलीकांड के अमर शहीदों की शहादत झारखंड की आत्मा का प्रतीक

#झारखंड #आदिवासी_संघर्ष : जल जंगल जमीन और संवैधानिक अधिकारों के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान।

डोंबारीबुरु गोलीकांड झारखंड के इतिहास का वह अध्याय है, जहां आदिवासी समाज ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी। यह घटना केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि राज्य की अस्मिता और संघर्षशील चेतना का प्रतीक है। अन्याय और दमन के विरुद्ध खड़े हुए अमर शहीदों का बलिदान आज भी सामाजिक चेतना को दिशा देता है। उनकी शहादत वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए प्रेरणा बनी हुई है।

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  • डोंबारीबुरु गोलीकांड में आदिवासी समाज के कई वीर सपूत शहीद।
  • जल–जंगल–जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष।
  • झारखंड की अस्मिता और स्वाभिमान से जुड़ा ऐतिहासिक बलिदान।
  • शहीदों की कुर्बानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा।
  • अन्याय, दमन और अत्याचार के विरुद्ध आदिवासी चेतना का प्रतीक।

डोंबारीबुरु गोलीकांड के अमर शहीदों को शत्-शत् नमन। जल–जंगल–जमीन और अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत आदिवासी समाज के अमर वीर सपूतों ने डोंबारीबुरु में अन्याय, दमन और अत्याचार के विरुद्ध अपने प्राणों की आहुति दी। यह केवल एक घटना नहीं थी, बल्कि झारखंड की आत्मा पर अंकित वह क्षण था, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि जब अस्तित्व और सम्मान पर आघात होता है, तो आदिवासी समाज चुप नहीं रहता।

डोंबारीबुरु के शहीदों की शहादत झारखंड की अस्मिता, स्वाभिमान और संघर्षशील चेतना की एक अमिट और गौरवशाली गाथा है। उन्होंने यह दिखाया कि अधिकार केवल कागज़ों में नहीं, बल्कि उन्हें बचाने के लिए साहस, एकता और बलिदान की आवश्यकता होती है। उनके संघर्ष का केंद्र केवल भूमि या संसाधन नहीं था, बल्कि सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार था, जिसे संविधान ने प्रत्येक नागरिक को प्रदान किया है।

जल जंगल जमीन की रक्षा का संघर्ष

आदिवासी समाज का जीवन जल, जंगल और जमीन से जुड़ा हुआ है। यही उसकी संस्कृति, पहचान और आजीविका का आधार है। जब-जब इन मूलभूत अधिकारों पर संकट आया, तब-तब आदिवासी समाज ने संगठित होकर उसका विरोध किया। डोंबारीबुरु में हुआ गोलीकांड इसी संघर्ष की परिणति था, जहां शांतिपूर्ण आवाज़ को बलपूर्वक दबाने का प्रयास किया गया।

यह संघर्ष केवल किसी एक गांव या क्षेत्र का नहीं था, बल्कि पूरे झारखंड की चेतना से जुड़ा था। शहीदों ने यह संदेश दिया कि प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार उसी समाज का है, जिसने सदियों से उनकी रक्षा की है।

शहादत जो इतिहास नहीं, चेतना है

डोंबारीबुरु के शहीदों का बलिदान केवल इतिहास की स्मृति नहीं है। यह वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए चेतना का स्रोत है। उनकी कुर्बानी आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती है कि अधिकारों की रक्षा के लिए सजग रहना अनिवार्य है। यह शहादत बताती है कि जब भी अन्याय, दमन और अत्याचार सिर उठाए, तब समाज को एकजुट होकर उसका प्रतिकार करना चाहिए।

यह बलिदान हमें यह भी याद दिलाता है कि लोकतंत्र की असली शक्ति जनता की चेतना में निहित होती है। यदि जनता जागरूक है, तो किसी भी प्रकार का दमन स्थायी नहीं हो सकता।

झारखंड की अस्मिता से जुड़ी शहादत

डोंबारीबुरु के शहीदों का संघर्ष झारखंड की अस्मिता से गहराई से जुड़ा है। यह अस्मिता केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक चेतना का संगम है। इन शहीदों ने अपने प्राण देकर यह सिद्ध किया कि झारखंड का आदिवासी समाज अपने अस्तित्व और सम्मान से कभी समझौता नहीं करेगा।

उनकी शहादत ने यह भी स्पष्ट किया कि विकास की कोई भी परिभाषा तब तक अधूरी है, जब तक उसमें मूल निवासी समाज की सहमति, सहभागिता और सम्मान शामिल न हो।

वर्तमान संदर्भ में शहीदों की प्रासंगिकता

आज जब देश और राज्य विकास, संसाधनों और अधिकारों को लेकर नए दौर से गुजर रहे हैं, तब डोंबारीबुरु के शहीदों की याद और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनकी कुर्बानी यह प्रश्न उठाती है कि क्या विकास की प्रक्रिया में समाज के सबसे कमजोर वर्गों की आवाज़ सुनी जा रही है।

शहीदों की स्मृति हमें सतर्क करती है कि कहीं ऐसा न हो कि विकास के नाम पर फिर किसी समुदाय के अधिकारों को कुचला जाए। उनकी शहादत लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा का आह्वान है।

सच्ची श्रद्धांजलि का अर्थ

मैं डोंबारीबुरु गोलीकांड के सभी अमर शहीदों को श्रद्धा, सम्मान और नमन अर्पित करता हूँ। उनकी कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी—यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सच्ची श्रद्धांजलि केवल स्मरण तक सीमित नहीं हो सकती; यह उनके सपनों और संघर्षों को आगे बढ़ाने में निहित है। – हृदयानंद मिश्रा

न्यूज़ देखो: शहादत जो आज भी सवाल पूछती है

डोंबारीबुरु गोलीकांड यह याद दिलाता है कि आदिवासी अधिकारों का प्रश्न आज भी उतना ही जीवंत है। शहीदों का बलिदान हमें सत्ता और व्यवस्था से जवाबदेही की अपेक्षा करना सिखाता है। यह घटना बताती है कि लोकतंत्र में स्मृति और संघर्ष दोनों आवश्यक हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

शहीदों की विरासत को जीवित रखना हमारी जिम्मेदारी

डोंबारीबुरु के अमर शहीद हमें साहस, एकता और अधिकार-बोध का संदेश देते हैं।
उनकी शहादत को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित न रखें, बल्कि चेतना में उतारें।
जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संकल्प आज भी उतना ही जरूरी है।
अपनी राय साझा करें, लेख को आगे बढ़ाएं और शहीदों की विरासत को जीवित रखें।

Guest Author
हृदयानंद मिश्र

हृदयानंद मिश्र

मेदिनीनगर, पलामू

हृदयानंद मिश्र झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता, अधिवक्ता एवं हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड, झारखंड सरकार के सदस्य हैं।

यह आलेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है और NewsDekho के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

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