
#ठेठईटांगर #पेयजल_संकट : लाखों की योजना विफल होने पर जिला परिषद ने स्थल निरीक्षण कर जांच का भरोसा दिया।
सिमडेगा जिले के ठेठईटांगर प्रखंड की पंचायत केरया के ग्राम चीरोबेड़ा और देऊबहार में निर्मित डीप बोरिंग और जलमीनार वर्षों बाद भी बेकार पड़े हैं। लाखों की लागत से बनी संरचनाओं से आज तक किसी घर में पानी नहीं पहुंचा, जिससे ग्रामीण कुआं और डाड़ी पर निर्भर हैं। ग्रामीणों की शिकायत पर जिला परिषद अध्यक्ष रोस प्रतिमा सोरेंग और उपाध्यक्ष सोनी पैंकरा ने स्थल निरीक्षण किया। उन्होंने तकनीकी खामियों की जांच और जिम्मेदारी तय कर सुधारात्मक कार्रवाई का आश्वासन दिया।
- चीरोबेड़ा और देऊबहार में बने डीप बोरिंग व जलमीनार निष्क्रिय।
- लाखों की लागत के बावजूद घरों तक पानी नहीं पहुंचा।
- ग्रामीणों को कुआं और डाड़ी के पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा।
- शिकायत पर जिला परिषद अध्यक्ष रोस प्रतिमा सोरेंग और उपाध्यक्ष सोनी पैंकरा का निरीक्षण।
- संवेदक की लापरवाही के आरोप, जांच व सख्त कार्रवाई का भरोसा।
सिमडेगा जिले के ठेठईटांगर प्रखंड में पेयजल संकट ने एक बार फिर सरकारी योजनाओं की गुणवत्ता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पंचायत केरया के ग्राम चीरोबेड़ा और देऊबहार में कार्यालय जिला परिषद सिमडेगा द्वारा कराए गए दो डीप बोरिंग और जलमीनार का उद्देश्य ग्रामीणों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराना था, लेकिन हकीकत में ये संरचनाएं केवल दिखावे तक सीमित रह गई हैं। वर्षों बीत जाने के बावजूद किसी भी ग्रामीण के घर तक पानी नहीं पहुंच सका है। गर्मी के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब कुएं और डाड़ी सूखने लगते हैं।
योजना का उद्देश्य और जमीनी सच्चाई
इन गांवों में डीप बोरिंग और जलमीनार का निर्माण इसलिए कराया गया था ताकि दूरस्थ और ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पेयजल की समस्या का स्थायी समाधान हो सके। योजना पर लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन आज भी ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए जूझ रहे हैं। जलमीनार खड़ा है, पाइपलाइन बिछी है, लेकिन पानी का प्रवाह शून्य है। यह स्थिति बताती है कि योजना की प्लानिंग, क्रियान्वयन और निगरानी तीनों स्तरों पर गंभीर खामियां रहीं।
ग्रामीणों की मजबूरी और आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि इन जल संरचनाओं से पानी न मिलने के कारण उन्हें आज भी पुराने स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। कुआं और डाड़ी ही उनकी एकमात्र सहारा हैं, जो गर्मी के मौसम में अक्सर सूख जाते हैं। ग्रामीणों ने स्पष्ट आरोप लगाया कि यह पूरी स्थिति संवेदक की लापरवाही और गैर-जिम्मेदार कार्यप्रणाली का परिणाम है। उनका कहना है कि निर्माण के दौरान तकनीकी मानकों का पालन नहीं किया गया, जिससे योजना शुरू होने से पहले ही विफल हो गई।
तकनीकी नियमों की अनदेखी का गंभीर आरोप
स्थानीय लोगों ने निरीक्षण के दौरान बताया कि जब डीप बोरिंग के समय पानी नहीं निकला, तो संवेदक ने तकनीकी नियमों को दरकिनार करते हुए कुएं का पानी बोरिंग में भर दिया। यह दावा किया गया कि इससे जलस्तर बढ़ेगा और आगे चलकर पानी मिलने लगेगा। कुछ समय के लिए जलमीनार में पानी चढ़ाया भी गया, लेकिन उसके बाद से आज तक दोबारा पानी नहीं आया। इस प्रक्रिया ने न केवल तकनीकी मानकों का उल्लंघन किया, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका को भी जन्म दिया।
शिकायत के बाद जिला परिषद की त्वरित कार्रवाई
ग्रामीणों की इस गंभीर समस्या को लेकर ठेठईटांगर के जिला परिषद सदस्य कृष्णा बड़ाईक के पास शिकायत पहुंची। शिकायत मिलते ही जिला परिषद अध्यक्ष रोस प्रतिमा सोरेंग और उपाध्यक्ष सोनी पैंकरा ने मामले को गंभीरता से लिया और जिला परिषद सदस्य के साथ मौके पर पहुंचकर डीप बोरिंग और जलमीनार का स्थलीय निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और निर्माण की स्थिति का जायजा लिया।
जांच और सुधार का भरोसा
स्थल निरीक्षण के बाद जिला परिषद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि इस समस्या का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। उन्होंने बताया कि जल्द ही वहां नया और तकनीकी रूप से सही डीप बोरिंग कराया जाएगा ताकि स्थायी रूप से पानी उपलब्ध हो सके। साथ ही पहले किए गए कार्यों की गहन जांच कर यह तय किया जाएगा कि सरकारी राशि के दुरुपयोग के लिए कौन जिम्मेदार है। दोषी संवेदक के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की बात भी कही गई।
पेयजल संकट से जुड़ी बड़ी तस्वीर
यह मामला केवल दो गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं की गुणवत्ता, निगरानी और जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। पेयजल जैसी बुनियादी जरूरत पर अगर लापरवाही होती है, तो उसका सीधा असर ग्रामीणों के स्वास्थ्य और जीवन स्तर पर पड़ता है। ऐसे मामलों में समय पर जांच और कार्रवाई न हो, तो जनता का भरोसा व्यवस्था से उठने लगता है।
ग्रामीणों की उम्मीद और अपेक्षा
जिला परिषद के आश्वासन के बाद ग्रामीणों को उम्मीद है कि उन्हें जल्द ही स्वच्छ और नियमित पेयजल मिलेगा। उनका कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर अधूरी और बेकार योजनाएं स्वीकार्य नहीं हैं। ग्रामीण चाहते हैं कि भविष्य में ऐसी योजनाओं का क्रियान्वयन पूरी पारदर्शिता और तकनीकी मानकों के साथ हो।
न्यूज़ देखो: जवाबदेही तय किए बिना नहीं सुलझेगा संकट
चीरोबेड़ा और देऊबहार का यह मामला दिखाता है कि कागजों पर सफल योजनाएं जमीनी स्तर पर कैसे विफल हो जाती हैं। जिला परिषद द्वारा किया गया निरीक्षण एक सकारात्मक कदम है, लेकिन असली परीक्षा कार्रवाई और सुधार की होगी। जब तक दोषियों की जिम्मेदारी तय नहीं होती, ऐसे संकट बार-बार सामने आते रहेंगे। ग्रामीणों को उनका अधिकार दिलाना ही प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
पानी जीवन है, लापरवाही नहीं चलेगी
पेयजल केवल सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
जब जलमीनार खड़े होकर भी सूखे रह जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
जवाबदेही, गुणवत्ता और पारदर्शिता से ही भरोसा लौटाया जा सकता है।
ग्रामीणों की आवाज सुनी जाए और समाधान समय पर हो, यही सच्चा विकास है।





