#चतरा #शिक्षा_विभाग : महज चार छात्रों वाले स्कूल में दो शिक्षिकाओं की तैनाती से भारी फिजूलखर्ची।
चतरा के सिमरिया प्रखंड अंतर्गत उत्क्रमित मध्य विद्यालय मंझली टांड़ में शिक्षा विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई है। यहां महज चार नामांकित बच्चों को पढ़ाने के लिए दो शिक्षिकाएं तैनात हैं, जिस पर हर महीने लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कई स्कूलों में सैकड़ों बच्चों पर मात्र दो शिक्षक हैं।
- चतरा जिले के सिमरिया प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय मंझली टांड़ में मात्र चार बच्चे नामांकित हैं।
- इन चार बच्चों को पढ़ाने के लिए विद्यालय में दो शिक्षिकाएं पदस्थापित हैं, जिससे संसाधनों की बर्बादी हो रही है।
- महज चार छात्रों के लिए बाकायदा रसोइया और मिड-डे मील अध्यक्ष का भी चुनाव कराया गया है।
- प्रखंड के अन्य सरकारी विद्यालयों में सौ से दो सौ बच्चों पर मात्र दो या तीन शिक्षक ही उपलब्ध हैं।
- नामांकित बच्चों की संख्या और स्थानीय आबादी न होने के कारण स्कूल को मर्ज करने की मांग उठी है।
झारखंड के चतरा जिले से सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और संसाधनों के दुरुपयोग की एक हैरान करने वाली तस्वीर सामने आई है। सिमरिया प्रखंड के एक सरकारी विद्यालय में छात्रों की संख्या न के बराबर होने के बावजूद वहां शिक्षकों और अन्य संसाधनों पर हर महीने लाखों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। यह स्थिति तब है जब इसी प्रखंड के कई अन्य स्कूलों में शिक्षक न होने के कारण बच्चों का भविष्य अंधकार में है। शिक्षा विभाग की इस घोर लापरवाही ने सरकारी दावों की पोल खोल कर रख दी है।
चार बच्चों का विशाल विद्यालय और लाखों का खर्च
सिमरिया प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय मंझली टांड़ का भवन काफी बड़ा है और इसमें कई कमरे बने हुए हैं। लेकिन इस आलीशान सरकारी बुनियादी ढांचे का सच यह है कि यहां वर्तमान में केवल चार बच्चे ही पढ़ाई कर रहे हैं। पूरे स्कूल में सिर्फ चार बच्चों का ही नामांकन है। इन चार बच्चों को पढ़ाने के लिए विभाग ने दो शिक्षिकाएं नियुक्त कर रखी हैं। इस प्रकार देखा जाए तो यहाँ एक शिक्षिका पर मात्र दो बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी है। इन शिक्षिकाओं को हर महीने मिलने वाले वेतन को जोड़ लिया जाए तो महज चार बच्चों पर सरकार हर माह लाखों रुपये खर्च कर रही है, जिसका परिणाम शून्य आ रहा है।
चार बच्चों के लिए रसोइया और मिड-डे मील अध्यक्ष
आश्चर्य की बात यह है कि नियमों की खानापूर्ति के लिए इस विद्यालय में महज चार बच्चों के ऊपर भी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था लागू है। स्कूल में मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) के संचालन के लिए बाकायदा एक समिति बनाई गई है और इसके लिए एक अध्यक्ष का चुनाव भी किया गया है। यही नहीं, बच्चों के लिए भोजन पकाने के लिए एक रसोइया की भी नियुक्ति की गई है। स्थानीय लोगों के अनुसार, रसोइया मात्र चार बच्चों का खाना स्कूल के बजाय अपने घर पर ही बनाकर लाती है और उन्हें खिला देती है। इस प्रकार सरकारी राशि का बड़े पैमाने पर दोहन हो रहा है, जबकि धरातल पर इसका कोई तार्किक लाभ नहीं दिख रहा।
शिक्षिका ने खुद उठाई स्कूल को मर्ज करने की मांग
जब इस अनोखी व्यवस्था को लेकर विद्यालय की शिक्षिका से पूछताछ की गई, तो उन्होंने भी दबी जुबान से विभाग की इस व्यवस्था पर असंतोष जताया। उन्होंने माना कि क्षेत्र में आबादी न होने के कारण बच्चों की संख्या नहीं बढ़ रही है।
विद्यालय की शिक्षिका ने कहा: “हमारे स्कूल में वर्तमान में मात्र चार ही बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं और रिकॉर्ड में भी सिर्फ चार का ही नामांकन दर्ज है। चूंकि यहाँ गांव की आबादी नहीं है और बच्चों की संख्या भी नहीं है, इसलिए बेहतर यही होता कि हमारे विद्यालय को पास के किसी दूसरे विद्यालय में मर्ज (विलय) कर दिया जाता।”
दूसरी तरफ सैकड़ों बच्चों वाले स्कूलों में शिक्षकों का टोटा
मंझली टांड़ विद्यालय की यह वीरानगी एक तरफ है, तो दूसरी तरफ चतरा जिले के ही कई ऐसे सरकारी स्कूल हैं जहां बच्चों की संख्या सौ से दो सौ के पार है। विडंबना यह है कि उन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए मात्र दो या तीन शिक्षक ही उपलब्ध हैं। इसके कारण वहां के पठन-पाठन की व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है। कई विद्यालयों में केवल खानापूर्ति की जा रही है क्योंकि इन सरकारी स्कूलों में मुख्य रूप से गरीब परिवारों के बच्चे ही पढ़ने आते हैं। पर्याप्त शिक्षक न होने से इन बच्चों को समय पर सही शिक्षा नहीं मिल पा रही है, जिससे वे पढ़ना और लिखना तक नहीं सीख पा रहे हैं और केवल सर्टिफिकेट के सहारे उनका भविष्य टिका हुआ है।
न्यूज़ देखो: व्यवस्था का यह दोहरा मापदंड गरीब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़
उत्क्रमित मध्य विद्यालय मंझली टांड़ की यह हकीकत शिक्षा विभाग के खराब प्रबंधन का जीता-जागता प्रमाण है। जहां एक तरफ बच्चे नहीं हैं, वहां लाखों का बजट खर्च हो रहा है, और जहां सैकड़ों बच्चे कतार में खड़े हैं, वहां शिक्षक नदारद हैं। यह दोहरा मापदंड साफ दिखाता है कि सरकारी तंत्र को गरीब बच्चों के भविष्य की कोई परवाह नहीं है। शिक्षा विभाग को तुरंत इस विद्यालय का युक्तिकरण (Rationalization) करते हुए इसे नजदीकी स्कूल में मर्ज करना चाहिए और यहाँ की शिक्षिकाओं को शिक्षक विहीन स्कूलों में तैनात करना चाहिए ताकि संसाधनों का सही उपयोग हो सके।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
जागिए और बदलिए अपने बच्चों के हक की आवाज बुलंद करना सीखिए
सरकारी स्कूलों की यह बदहाली केवल व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि हमारी चुप्पी का भी नतीजा है। जब तक हम अपने बच्चों की शिक्षा और उनके अधिकारों को लेकर सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक धरातल पर ऐसी ही खानापूर्ति होती रहेगी। शिक्षा ही वह एकमात्र जरिया है जो हमारे बच्चों को गरीबी और पिछड़ेपन से बाहर निकाल सकता है। अपने क्षेत्र के स्कूलों की स्थिति पर नजर रखें और जब भी ऐसी अव्यवस्था दिखे, तो संगठित होकर प्रशासन के सामने अपनी आवाज उठाएं ताकि हर बच्चे को उसका पूरा अधिकार मिल सके।
यदि आप भी मानते हैं कि सरकारी धन का यह दुरुपयोग बंद होना चाहिए और शिक्षक विहीन स्कूलों में तुरंत शिक्षकों की बहाली होनी चाहिए, तो नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें। इस कड़वे सच को उजागर करने वाली खबर को चतरा और सिमरिया के सभी ग्रुप्स और दोस्तों के साथ ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, ताकि यह बात शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों तक पहुंचे और इस व्यवस्था में अविलंब सुधार हो सके।

🗣️ Join the Conversation!
What are your thoughts on this update? Read what others are saying below, or share your own perspective to keep the discussion going. (Please keep comments respectful and on-topic).