
#चैनपुर #कृषियोजना : जोड़ा बैल वितरण से आदिम जनजाति परिवारों को खेती में मिलेगी मदद।
गुमला जिले के चैनपुर प्रखंड परिसर में वर्ष 2025-26 की जोड़ा बैल वितरण योजना के तहत आदिम जनजाति परिवारों को बैलों का वितरण किया गया। बारडीह पंचायत के तीन कोरवा परिवारों को इस योजना का लाभ दिया गया। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों और पशुपालन विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी रही। योजना का उद्देश्य दूरदराज के आदिम जनजाति परिवारों को खेती के लिए सहयोग देकर आत्मनिर्भर बनाना है।
- गुमला जिले के चैनपुर प्रखंड परिसर में जोड़ा बैल वितरण कार्यक्रम आयोजित।
- वर्ष 2025-26 योजना के तहत बारडीह पंचायत के तीन कोरवा परिवारों को लाभ।
- लाभुकों में रामेश्वर कोरवा, मंगरु कोरवा और सुबोध कोरवा शामिल।
- कार्यक्रम में जिला परिषद सदस्य मेरी लकड़ा, उप प्रमुख प्रमोद खलखो, मुखिया शोभा देवी रहे उपस्थित।
- पशु स्वास्थ्य जांच और तकनीकी मार्गदर्शन के लिए डॉ. रितु टोप्पो और डॉ. धर्म रक्षित विद्यार्थी मौजूद।
- योजना का उद्देश्य आदिम जनजाति परिवारों को खेती में मदद देकर आत्मनिर्भर बनाना।
गुमला जिले के चैनपुर प्रखंड में कृषि और पशुपालन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत जोड़ा बैल वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रखंड परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम में वर्ष 2025-26 के लिए चयनित आदिम जनजाति परिवारों को बैलों का जोड़ा प्रदान किया गया। इस योजना के माध्यम से दूरदराज के गांवों में रहने वाले गरीब परिवारों को खेती के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने लाभुकों को खेती और पशुपालन के महत्व के बारे में जानकारी भी दी।
बारडीह पंचायत के तीन परिवारों को मिला योजना का लाभ
जोड़ा बैल वितरण योजना के तहत बारडीह पंचायत के अंतर्गत आने वाले आदिम जनजाति (कोरवा) समुदाय के तीन परिवारों को बैलों का जोड़ा दिया गया।
इस योजना के लाभार्थियों में रामेश्वर कोरवा पिता स्वर्गीय पकलू कोरवा, ग्राम कुकरुजा, मंगरु कोरवा पिता स्वर्गीय बंधन कोरवा, ग्राम पाकरकोना तथा सुबोध कोरवा पिता पुनई कोरवा, ग्राम बारडीह शामिल हैं।
इन परिवारों को बैलों का जोड़ा मिलने से अब खेती की जुताई और अन्य कृषि कार्यों में काफी सहूलियत होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां अब भी पारंपरिक खेती पद्धति प्रचलित है, वहां बैलों की अहम भूमिका होती है।
जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में हुआ वितरण
कार्यक्रम का आयोजन जनप्रतिनिधियों और विभागीय अधिकारियों की गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुआ।
इस अवसर पर जिला परिषद सदस्य मेरी लकड़ा, उप प्रमुख प्रमोद खलखो तथा चैनपुर की मुखिया शोभा देवी विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने लाभुकों को बैलों का जोड़ा सौंपते हुए कहा कि सरकार की यह योजना आदिम जनजाति परिवारों के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी।
कार्यक्रम के दौरान जनप्रतिनिधियों ने कहा कि खेती को मजबूत बनाना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने कहा: “इस योजना का उद्देश्य सुदूरवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले आदिम जनजाति परिवारों को आत्मनिर्भर बनाना है, ताकि वे अपनी खेती बेहतर तरीके से कर सकें और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके।”
पशुपालन विभाग ने दिया तकनीकी मार्गदर्शन
कार्यक्रम के दौरान पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने लाभुकों को बैलों के उचित देखभाल और स्वास्थ्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी।
इस मौके पर टीवीओ डॉ. रितु टोप्पो और प्रखंड पशुपालन पदाधिकारी डॉ. धर्म रक्षित विद्यार्थी मुख्य रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने बैलों के स्वास्थ्य की जांच की और लाभुकों को पशुओं के खान-पान, रखरखाव और नियमित जांच के बारे में जागरूक किया।
डॉ. धर्म रक्षित विद्यार्थी ने कहा: “अगर पशुओं की सही देखभाल की जाए तो वे कई वर्षों तक किसानों के लिए उपयोगी बने रहते हैं और खेती को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।”
उन्होंने लाभुकों को यह भी सलाह दी कि बैलों के स्वास्थ्य में किसी भी प्रकार की समस्या होने पर तुरंत पशुपालन विभाग से संपर्क करें।
खेती को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई किसान पारंपरिक तरीके से खेती करते हैं, जहां ट्रैक्टर और अन्य मशीनरी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसे में बैलों की मदद से जुताई और अन्य कृषि कार्य करना किसानों के लिए सबसे व्यवहारिक विकल्प होता है।
सरकार की जोड़ा बैल वितरण योजना ऐसे ही परिवारों के लिए शुरू की गई है, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिनके पास खेती के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी है।
इस योजना से आदिम जनजाति परिवारों को खेती करने में मदद मिलेगी और उनकी आय में भी धीरे-धीरे वृद्धि होने की उम्मीद है।

न्यूज़ देखो: आदिम जनजाति परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सकारात्मक पहल
चैनपुर में आयोजित जोड़ा बैल वितरण कार्यक्रम यह दिखाता है कि अगर योजनाओं को सही तरीके से लागू किया जाए तो वे ग्रामीण और आदिम जनजाति समुदायों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सकती हैं। खेती से जुड़ी सहायता मिलने पर ये परिवार आर्थिक रूप से मजबूत बन सकते हैं और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। हालांकि यह भी जरूरी है कि ऐसी योजनाओं की नियमित निगरानी हो ताकि लाभ सही लोगों तक पहुंचे और उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहे। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
खेती मजबूत तो गांव मजबूत
ग्रामीण भारत की असली ताकत उसकी खेती और किसान हैं। जब छोटे और जरूरतमंद परिवारों को खेती के लिए जरूरी साधन मिलते हैं, तो उनके जीवन में उम्मीद और आत्मनिर्भरता की नई राह खुलती है।
ऐसी योजनाएं केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि सम्मान और आत्मविश्वास भी देती हैं।
अगर आपको लगता है कि इस तरह की योजनाएं और भी लोगों तक पहुंचनी चाहिए, तो इस खबर को अधिक से अधिक लोगों तक साझा करें। अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें और गांव, किसान तथा आदिवासी समाज की आवाज को मजबूत बनाने में भागीदार बनें।






