
#लातेहार #खरसावां_गोलीकांड : कृषि फार्म परिसर में आदिवासी शहीदों को पुष्प अर्पित कर दी गई श्रद्धांजलि।
लातेहार जिले के चंदवा स्थित कृषि फार्म परिसर में गुरुवार को खरसावां गोलीकांड की स्मृति में काला दिवस मनाया गया। इस दौरान 1 जनवरी 1948 को शहीद हुए आदिवासी–मूलवासी वीरों को पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता राजीव कुमार उरांव ने किया। वक्ताओं ने इस घटना को स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक दर्दनाक और उपेक्षित अध्याय बताया।
- कृषि फार्म चंदवा परिसर में खरसावां गोलीकांड की स्मृति में आयोजन।
- राजीव कुमार उरांव के नेतृत्व में काला दिवस कार्यक्रम संपन्न।
- 1948 में शहीद हुए आदिवासी–मूलवासी वीरों को दी गई श्रद्धांजलि।
- ओडिशा में विलय के विरोध में निहत्थे लोगों पर चली थी गोलियां।
- हजारों मौतों का दावा, आज तक नहीं आई आधिकारिक रिपोर्ट।
- दो मिनट का मौन रखकर शहीदों को किया गया नमन।
लातेहार जिले के चंदवा प्रखंड अंतर्गत कृषि फार्म परिसर में आयोजित यह कार्यक्रम खरसावां गोलीकांड के शहीदों की स्मृति को जीवित रखने का प्रयास था। 1 जनवरी 1948 को घटित इस घटना को याद करते हुए उपस्थित लोगों ने इसे आदिवासी समाज के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय का प्रतीक बताया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, ग्रामीण और बुद्धिजीवी शामिल हुए।
खरसावां गोलीकांड स्वतंत्र भारत का काला अध्याय
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि खरसावां गोलीकांड कोई औपनिवेशिक दौर की घटना नहीं, बल्कि आज़ाद भारत में सत्ता व्यवस्था द्वारा की गई एक क्रूर कार्रवाई थी। 1 जनवरी 1948 को खरसावां में ओडिशा राज्य में विलय के विरोध में आदिवासी समाज के लोग शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र हुए थे। यह सभा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के अवसर पर आयोजित की गई थी, लेकिन प्रशासन और भीड़ के बीच तनाव के बाद निहत्थे लोगों पर गोलियां चला दी गईं।
वक्ताओं के अनुसार इस गोलीबारी में हजारों आदिवासी–मूलवासी मारे गए, हालांकि आज तक इसकी कोई प्रमाणिक और आधिकारिक संख्या सामने नहीं आ सकी है। यह स्थिति खुद में व्यवस्था की संवेदनहीनता और ऐतिहासिक उपेक्षा को दर्शाती है।
शवों को कुओं और जंगलों में फेंके जाने का आरोप
कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे राजीव कुमार उरांव ने कहा कि गोलीकांड के बाद शहीदों के शवों को पास के कुओं और जंगलों में फेंक दिया गया था, ताकि घटना की भयावहता सामने न आ सके। उन्होंने कहा:
राजीव कुमार उरांव ने कहा: “खरसावां गोलीकांड की न तो कभी निष्पक्ष जांच हुई और न ही आज तक शहीदों की सही संख्या देश के सामने लाई गई। यह इतिहास को मिटाने का संगठित प्रयास रहा है।”
उन्होंने यह भी कहा कि आज की पीढ़ी को इस घटना के बारे में जानना जरूरी है, ताकि लोकतंत्र, संवाद और मानवाधिकारों के महत्व को समझा जा सके।
वक्ताओं ने जताई व्यवस्था पर नाराजगी
कार्यक्रम में उपस्थित अन्य वक्ताओं ने भी खरसावां गोलीकांड को लेकर गहरी नाराजगी व्यक्त की। विकास कुमार भगत (पूर्व मुखिया चकला), चंद्रदेव उरांव, रामनाथ मुंडा, कृष्णा उरांव (मैक्लुस्कीगंज), सुरेश नाथ लोहरा, रतिलाल उरांव, राजेश टाना भगत, कुलेश्वर राम सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह घटना आज भी देश के बड़े हिस्से में अज्ञात है, जो आदिवासी इतिहास के साथ हुए अन्याय को दर्शाता है।
वक्ताओं ने कहा कि अगर यह घटना किसी अन्य समाज से जुड़ी होती, तो शायद इसे राष्ट्रीय स्तर पर उचित पहचान और न्याय मिल चुका होता। लेकिन आदिवासी समाज के बलिदान को लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया।
ग्रामीणों और युवाओं की रही सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीणों और युवाओं की मौजूदगी रही। राकेश लोहरा, संतोष लोहरा, दीपक गंझू, सुशील गंझू, मनोज खरवार, अमर उरांव, दिनेश उरांव, भोला गंझू, सूरज भोगता, शिबू उरांव, श्याम उरांव, माधुरी उरांव, सबिता समेत दर्जनों लोग कार्यक्रम में शामिल हुए। सभी ने शहीद वेदी पर पुष्प अर्पित कर अपनी श्रद्धांजलि दी।
दो मिनट का मौन रखकर शहीदों को नमन
कार्यक्रम के अंत में खरसावां गोलीकांड के शहीदों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया। इस दौरान पूरा परिसर शांत रहा और उपस्थित लोगों ने सिर झुकाकर उन वीरों को नमन किया, जिन्होंने अपने अधिकारों और अस्मिता के लिए जान गंवाई।
न्यूज़ देखो: इतिहास को याद रखना ही सच्ची श्रद्धांजलि
खरसावां गोलीकांड को काला दिवस के रूप में याद किया जाना यह दर्शाता है कि समाज अब अपने दबे हुए इतिहास को सामने लाने की कोशिश कर रहा है। यह कार्यक्रम न केवल श्रद्धांजलि था, बल्कि व्यवस्था से सवाल पूछने का साहस भी। जब तक ऐसे ऐतिहासिक अन्यायों को स्वीकार कर उन पर संवाद नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
स्मृति से संघर्ष तक, इतिहास को न भूलें
शहीदों को याद करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।
खरसावां गोलीकांड जैसी घटनाएं हमें संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का संदेश देती हैं।
अपने इतिहास को जानें, अगली पीढ़ी को बताएं और संवाद को आगे बढ़ाएं।
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