
#गढ़वा #प्राकृतिक_खेती : जिला उद्यान विभाग की पहल पर चार प्रखंडों के सात क्लस्टर गांवों में एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित।
गढ़वा जिले में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन योजना के अंतर्गत 1125 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। जिला उद्यान विभाग द्वारा परियोजित और कृषि विज्ञान केन्द्र गढ़वा द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में 50-50 किसानों के बैच बनाकर चार प्रखंडों के सात क्लस्टर गांवों में जागरूकता अभियान चलाया गया। किसानों को रासायनिक खेती के दुष्परिणाम और प्राकृतिक खेती के लाभों की जानकारी दी गई।
- राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन योजना के तहत 1125 किसानों को मिला प्रशिक्षण।
- गढ़वा, मेराल, मंझिआँव और कांडी प्रखंडों के 7 क्लस्टर गांवों में कार्यक्रम आयोजित।
- 50-50 किसानों के बैच बनाकर दिया गया एक दिवसीय व्यावहारिक प्रशिक्षण।
- कृषि वैज्ञानिकों ने रासायनिक खेती के नुकसान व प्राकृतिक खेती के लाभ समझाए।
- आत्मा गढ़वा, जेएसएलपीएस की 18 सीआरपी दीदियों व जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी।
गढ़वा जिले में किसानों को टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन योजना के तहत व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिला उद्यान विभाग, गढ़वा द्वारा परियोजित और कृषि विज्ञान केन्द्र, गढ़वा द्वारा आयोजित इस पहल के अंतर्गत कुल 1125 कृषकों को 50-50 के बैच में एक दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
चार प्रखंडों के सात क्लस्टर गांवों में हुआ आयोजन
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम गढ़वा जिले के चार प्रखंडों—गढ़वा, मेराल, मंझिआँव और कांडी—के अंतर्गत चयनित सात क्लस्टर गांवों में आयोजित किया गया। जिन गांवों में प्रशिक्षण हुआ उनमें गढ़ाखुर्द, बलियारी, बेलचम्पा, प्रतापपुर, चेचरिया, खरसोता, रामपुर, डुमरसोता और हरिहरपुर शामिल हैं।
गांव स्तर पर प्रशिक्षण आयोजित किए जाने से किसानों की भागीदारी सुनिश्चित हुई और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जानकारी प्रदान की गई।
रासायनिक खेती के नुकसान और प्राकृतिक खेती के लाभ पर जोर
प्रशिक्षण के दौरान किसानों को रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले दुष्परिणामों की विस्तृत जानकारी दी गई। बताया गया कि रासायनिक खेती से मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, जल स्रोतों का प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं।
इसके साथ ही प्राकृतिक खेती को एक सुरक्षित, किफायती और दीर्घकालिक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया। किसानों को जैविक घोल, जीवामृत, बीजामृत, आच्छादन और मिश्रित फसल प्रणाली जैसी तकनीकों के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी गई।
विशेषज्ञों ने दिया तकनीकी मार्गदर्शन
प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र, गढ़वा के वरीय वैज्ञानिक सह प्रधान श्री महेश चंद्र जेराई ने किसानों को प्राकृतिक खेती के वैज्ञानिक आधार और उसके दीर्घकालिक लाभों पर प्रकाश डाला।
केन्द्र के एसआरएफ श्री नवलेश कुमार, कृषि महाविद्यालय गढ़वा के सहायक प्रोफेसर सह जूनियर वैज्ञानिक डॉ. अंजनी राहुल, डॉ. राहुल कुमार, डॉ. इंग्ले दीपक श्यामराव तथा डॉ. मीरनमोय विश्वास ने विभिन्न तकनीकी सत्रों के माध्यम से किसानों को प्रशिक्षण दिया।
विशेषज्ञों ने बताया कि प्राकृतिक खेती न केवल उत्पादन लागत को कम करती है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध हो सकती है।
प्रगतिशील किसानों और तकनीकी टीम की सहभागिता
कार्यक्रम में केन्द्र के सहायक श्री सियाराम पाण्डेय तथा प्रगतिशील किसान श्री ब्रज किशोर महतो ने अपने अनुभव साझा करते हुए किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया।
आत्मा गढ़वा से प्रखंड तकनीकी प्रबंधक श्री ओम प्रकाश भी उपस्थित रहे। इसके अलावा जेएसएलपीएस की सीआरपी दीदियां—नीतिशा, अमृता देवी, रीना देवी, पूजा दीदी सहित कुल 18 दीदियों—ने अपने-अपने पंचायत क्षेत्रों में कार्यक्रम के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई।
जनप्रतिनिधियों और कृषक मित्रों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिससे कार्यक्रम का प्रभाव और व्यापक हुआ।
किसानों में दिखा उत्साह
प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने प्राकृतिक खेती से जुड़े सवाल पूछे और अपने अनुभव साझा किए। कई किसानों ने भविष्य में रासायनिक खेती की निर्भरता कम कर प्राकृतिक पद्धति अपनाने की इच्छा जताई।
यह पहल जिले में टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।



न्यूज़ देखो: टिकाऊ खेती ही भविष्य की राह
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ता यह कदम गढ़वा जिले के कृषि परिदृश्य में सकारात्मक बदलाव का संकेत है। यदि किसान वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ इस पद्धति को अपनाते हैं तो इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण भी संभव है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
रसायन मुक्त खेती की ओर बढ़ें किसान
प्राकृतिक खेती सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता है। किसान भाई-बहन नई तकनीकों को अपनाएं और प्रशिक्षण का लाभ उठाएं। आप क्या सोचते हैं—क्या प्राकृतिक खेती ही समाधान है? अपनी राय कमेंट में जरूर दें और खबर को साझा करें।







