
#छतरपुर #नगर_चुनाव : नामांकन से पहले ही दावों और वादों की राजनीति तेज, जनता से हिसाब का वक्त।
छतरपुर नगर पंचायत चुनाव के नामांकन चरण की शुरुआत से पहले ही स्थानीय राजनीति पूरी तरह गर्मा गई है। अध्यक्ष और वार्ड पार्षद पद के लिए बड़ी संख्या में दावेदार मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। खास बात यह है कि वर्षों तक विकास के मुद्दों पर खामोश रहने वाले चेहरे अब अचानक विकास का झंडा उठाते नजर आ रहे हैं। ऐसे में यह चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने का नहीं, बल्कि जनता द्वारा जवाबदेही तय करने की बड़ी कसौटी बन गया है।
- छतरपुर नगर पंचायत चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए आधा दर्जन से अधिक दावेदार।
- दो दर्जन से ज्यादा वार्ड पार्षद प्रत्याशी नामांकन की तैयारी में।
- वर्षों तक खामोशी, अब अचानक विकास के दावे।
- पैसे, भीड़ और जातीय समीकरण की चर्चाएं तेज।
- बुनियादी समस्याओं पर सात साल का सवाल जनता के सामने।
- चुनाव को हिसाब मांगने का अवसर मानने की अपील।
छतरपुर नगर पंचायत चुनाव का माहौल धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगने लगा है। नामांकन की प्रक्रिया पूरी तरह शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां चरम पर पहुंच चुकी हैं। अध्यक्ष पद के लिए आधा दर्जन से अधिक दावेदार और वार्ड पार्षद पद के लिए दो दर्जन से ज्यादा प्रत्याशियों की सक्रियता इस बात का संकेत है कि इस बार कुर्सी की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। हर गली, हर चौराहे पर चुनावी चर्चाएं हैं, और हर चर्चा के केंद्र में एक ही शब्द है—विकास।
अचानक जागा विकास का शोर
सबसे दिलचस्प और साथ ही चिंताजनक पहलू यह है कि इस बार चुनावी मैदान में ऐसे कई चेहरे भी सक्रिय हो गए हैं, जिनका बीते सात वर्षों में शहर के विकास से कोई प्रत्यक्ष सरोकार नहीं दिखा। जिन सड़कों पर बरसात में कीचड़ और गड्ढों का राज रहा, जिन नालियों और सार्वजनिक शौचालयों से बदबू उठती रही, जिन मोहल्लों में अंधेरा और जलजमाव आम समस्या रहा—उन मुद्दों पर ये चेहरे कभी मुखर नहीं हुए। लेकिन जैसे ही चुनाव की आहट आई, अचानक विकास के बड़े-बड़े वादे और योजनाएं सामने आने लगीं।
विकास या वोट की राजनीति
चुनाव के समय विकास की बातें करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि यह विकास नियत से उपजा है या मजबूरी से। क्या यह जनसेवा का सच्चा संकल्प है, या फिर कुर्सी की चाह, जातीय समीकरण और धनबल का मिला-जुला खेल? राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम हो चली है कि इस बार कई प्रत्याशी पैसे के दम पर माहौल बनाने, भीड़ जुटाने और समीकरण साधने में लगे हुए हैं। नामांकन जुलूस, ढोल-नगाड़े, पोस्टर और बैनर से ऐसा दृश्य रचा जा रहा है मानो शहर की तस्वीर बदलने वाले यही लोग हों।
सात साल की चुप्पी का जवाब कौन देगा
नगर पंचायत का गठन ही इसलिए किया गया था ताकि शहरी क्षेत्र में विकास, सुविधाएं और जनहित के कार्यों को गति मिल सके। लेकिन सवाल यह है कि फिर पिछले सात वर्षों में छतरपुर की जनता बुनियादी समस्याओं से क्यों जूझती रही? समुचित पेयजल व्यवस्था, जल संचयन, शहर का सौंदर्यीकरण, बजबजाते सार्वजनिक शौचालयों का समाधान, कचरा प्रबंधन, जल निकासी, सड़क और प्रकाश व्यवस्था—इन मुद्दों पर आवाज क्यों नहीं उठी? करों के बढ़ते बोझ और सुविधाओं की कमी पर खामोशी क्यों रही?
अब, चुनाव से ठीक पहले, विकास की फाइलें खुलने लगी हैं। घोषणाओं और वादों की बाढ़ आ गई है। लेकिन जनता के मन में यह सवाल गूंज रहा है कि जो लोग आज मंच से विकास की बात कर रहे हैं, वे अब तक कहां थे?
चुनाव वादों का नहीं, हिसाब का समय
लोकतंत्र में चुनाव केवल घोषणापत्र पढ़ने या नए वादों से प्रभावित होने का अवसर नहीं होता। यह उस प्रतिनिधि से हिसाब मांगने का समय होता है, जिसने या जो प्रतिनिधित्व का दावा कर रहा है। जो प्रत्याशी आज बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने बिना कुर्सी के जनता के लिए क्या किया? क्या वे संकट के समय लोगों के साथ खड़े रहे, या सिर्फ चुनावी मौसम में ही सक्रिय होते हैं?
पैसे और प्रभाव की राजनीति
इस बार चुनाव में धनबल और प्रभाव का मुद्दा भी चर्चा में है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कुछ प्रत्याशी प्रचार में भारी खर्च कर रहे हैं, ताकि माहौल अपने पक्ष में बनाया जा सके। लेकिन भीड़, शोर और नारों से असली विकास की पहचान नहीं होती। विकास वह होता है, जो मोहल्लों में दिखे, गलियों में महसूस हो और आम आदमी के जीवन को आसान बनाए।
जनता के लिए असली कसौटी
छतरपुर की जनता के लिए यह चुनाव सिर्फ प्रतिनिधि चुनने का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों का भविष्य तय करने का अवसर है। मतदाताओं को यह देखना होगा कि—
कौन नेता जमीन से जुड़ा रहा है?
किसने बिना किसी पद के भी जनता की समस्याओं के लिए आवाज उठाई?
किसका विकास केवल पोस्टर और भाषण तक सीमित नहीं, बल्कि वास्तविक काम में दिखता है?
चेहरे नहीं, चरित्र पर वोट
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मतदाता चेहरे नहीं, चरित्र और कार्यों को देखकर फैसला करें। अगर जनता फिर से केवल नारों और दिखावे के पीछे चली गई, तो आने वाले वर्षों में शिकायत करने का नैतिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन अगर जनता ने सवाल पूछना और जवाब मांगना सीख लिया, तो शायद छतरपुर को वह नेतृत्व मिल सके, जिसकी उसे लंबे समय से जरूरत है।
न्यूज़ देखो: चुनाव में जवाबदेही की असली परीक्षा
छतरपुर नगर पंचायत चुनाव यह साफ कर रहा है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता के पास होती है। यह चुनाव बताएगा कि मतदाता दिखावे से प्रभावित होते हैं या काम और नीयत को प्राथमिकता देते हैं। क्या इस बार जनता सात साल की चुप्पी का जवाब मांगेगी, या फिर वादों में बह जाएगी? हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
जिम्मेदार नेतृत्व ही शहर का भविष्य तय करेगा
छतरपुर के विकास के लिए जरूरी है कि सत्ता में वही लोग आएं, जो जिम्मेदारी समझते हों।
अब समय है सवाल पूछने का, जवाब मांगने का और सोच-समझकर मतदान करने का।
इस मुद्दे पर अपनी राय साझा करें, खबर को आगे बढ़ाएं और दूसरों को भी जागरूक करें, ताकि छतरपुर को मिले ऐसा नेतृत्व जो वाकई विकास करे, सिर्फ वादा नहीं।







