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आदिवासी आस्था का विराट स्वरूप, ककड़ोलता सिरसी ता नाले में सामूहिक पूजा संपन्न

#डुमरी #आदिवासी_आस्था : ऐतिहासिक ककड़ोलता धाम में विधिवत पूजा के साथ उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब।

डुमरी प्रखंड के ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व वाले स्थल सिरसी ता नाले उर्फ ककड़ोलता में गुरुवार को भव्य सामूहिक प्रार्थना सह पूजा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस पावन अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से आए 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया। आदिवासी धर्मगुरुओं के नेतृत्व में विधिवत पूजा संपन्न हुई, जिसमें समाज और देश की सुख-शांति के लिए प्रार्थना की गई। आयोजन ने आदिवासी आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया।

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  • ककड़ोलता सिरसी ता नाले में भव्य सामूहिक प्रार्थना सह पूजा का आयोजन।
  • देश के विभिन्न राज्यों से 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति।
  • बंधन तिग्गा और गहजू बैगा की अगुवाई में विधिवत पूजा संपन्न।
  • श्रद्धालुओं ने परिवार, समाज और देश की सुख-शांति के लिए प्रार्थना की।
  • पूजा स्थल पर चाला मां, धर्मेश बाबा और मानव सृजन स्थल के प्रति गहरी आस्था।

डुमरी प्रखंड अंतर्गत स्थित ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले स्थल सिरसी ता नाले उर्फ ककड़ोलता गुरुवार को आस्था के महासंगम में तब्दील हो गया। सुबह से ही पूजा स्थल परिसर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। देश के अलग-अलग राज्यों से आए लोगों ने इस सामूहिक प्रार्थना सह पूजा कार्यक्रम में भाग लेकर अपनी आस्था प्रकट की। पूरे परिसर में धार्मिक उल्लास, श्रद्धा और भक्ति का वातावरण देखने को मिला।

धर्मगुरुओं के नेतृत्व में विधिवत पूजा

गुरुवार की सुबह ककड़ोलता परिसर में आदिवासी धर्मगुरु बंधन तिग्गा एवं गहजू बैगा की अगुवाई में सामूहिक प्रार्थना और पूजा विधिवत रूप से संपन्न हुई। पूजा के दौरान पारंपरिक विधि-विधान के साथ श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर लोगों ने अपने परिवार, समाज और देश की सुख-शांति, समृद्धि और कल्याण की कामना की।

पूजा के समय ढोल-नगाड़ों की गूंज और पारंपरिक मंत्रोच्चार से पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। श्रद्धालु पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ पूजा में शामिल नजर आए।

गुरुवार का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व

इस अवसर पर धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने ककड़ोलता में गुरुवार को पूजा किए जाने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा:

“हमारे समाज के पूर्वजों ने गहन आस्था और विश्वास के साथ गुरुवार के दिन को विशेष पूजा के लिए चुना है। इस दिन की पूजा का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है।”

उन्होंने आगे कहा कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से यहां आकर पूजा करता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। इसी विश्वास के कारण हर वर्ष यहां श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन की समस्याओं से मुक्ति की कामना

धर्मगुरु ने बताया कि ककड़ोलता में लोग शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, पारिवारिक सुख, दुःख-दर्द और जीवन की विभिन्न परेशानियों से मुक्ति पाने की कामना लेकर आते हैं। श्रद्धालु चाला मां, धर्मेश बाबा और मानव सृजन स्थल पर अपनी गहरी आस्था व्यक्त करते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता को मजबूत करने का माध्यम भी है।

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आस्था का जीवंत उदाहरण बना संतान प्राप्ति का प्रसंग

कार्यक्रम के दौरान आस्था और विश्वास का एक जीवंत उदाहरण भी सामने आया। एक परिवार ने बताया कि उन्हें लंबे समय तक संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो रही थी। ककड़ोलता में पूजा-अर्चना और मन्नत मांगने के बाद उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। संतान प्राप्ति की खुशी में उस परिवार ने चाला मां, धर्मेश बाबा एवं मानव सृजन स्थल पर 21 हजार रुपये का दक्षिणा अर्पित कर अपनी श्रद्धा प्रकट की।

यह प्रसंग श्रद्धालुओं के बीच आस्था को और भी मजबूत करता नजर आया।

देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु

इस भव्य आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ पड़ोसी देश से भी श्रद्धालु पहुंचे। प्रमुख रूप से बिहार से प्रमोद उरांव, पश्चिम बंगाल से भगवान दास मुंडा, छत्तीसगढ़ से मिटकु उरांव, असम से विश्वनाथ कुजूर, उड़ीसा से मनीलाल उरांव, नेपाल से पांचू उरांव, उत्तर प्रदेश से जितेंद्र उरांव उपस्थित रहे।

इसके अलावा झारखंड से कमले उरांव, रवि जी तिग्गा, चिंतामणि उरांव, रंथु उरांव सहित हजारों श्रद्धालुओं ने पूजा में भाग लिया। आयोजन के दौरान अनुशासन और शांति बनाए रखने में स्थानीय समिति और स्वयंसेवकों की भूमिका भी सराहनीय रही।

न्यूज़ देखो: आदिवासी आस्था और एकता का सशक्त प्रतीक

ककड़ोलता में आयोजित यह सामूहिक पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता का सशक्त प्रतीक है। इतने बड़े स्तर पर श्रद्धालुओं की भागीदारी यह दर्शाती है कि पारंपरिक आस्थाएं आज भी समाज को जोड़ने का काम कर रही हैं। ऐसे आयोजनों के संरक्षण और सुव्यवस्थित संचालन की जिम्मेदारी प्रशासन और समाज दोनों की है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

आस्था से जुड़ी परंपरा, समाज को जोड़ने का संदेश

ककड़ोलता की यह पूजा आस्था, विश्वास और सामाजिक एकजुटता की प्रेरणा देती है। परंपराओं के संरक्षण के साथ नई पीढ़ी को इससे जोड़ना समय की जरूरत है।
धार्मिक आयोजनों में अनुशासन और आपसी सम्मान बनाए रखना हम सभी का दायित्व है।
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Aditya Kumar

डुमरी, गुमला

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