हार्डनिंग सेंटर से बदली बिरसमुनी देवी की जिंदगी, बानो की महिला किसान बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

हार्डनिंग सेंटर से बदली बिरसमुनी देवी की जिंदगी, बानो की महिला किसान बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

author Shivnandan Baraik
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#सिमडेगा #महिला_सशक्तिकरण : मुर्गी पालन से बिरसमुनी देवी ने बनाई नई पहचान।

सिमडेगा जिले के बानो प्रखंड स्थित कानारोवा गांव की बिरसमुनी देवी आज ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बनकर उभरी हैं। जेएसएलपीएस और आजीविका महिला समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने हार्डनिंग सेंटर और मुर्गी पालन व्यवसाय के जरिए आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की। प्रशिक्षण और मेहनत के बल पर उन्होंने चूजा पालन से लेकर मुर्गी दाना निर्माण तक अपना व्यवसाय विकसित किया। आज उनकी सफलता गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार की दिशा में प्रेरित कर रही है।

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  • बिरसमुनी देवी ने वर्ष 2015 में “प्यारी आजीविका महिला समूह” से जुड़कर सफर शुरू किया।
  • जेएसएलपीएस के सहयोग से शुरू किया हार्डनिंग सेंटर और मुर्गी पालन व्यवसाय।
  • पहली बार 1000 आशील नस्ल के चूजों से करीब 10 हजार रुपये का लाभ मिला।
  • अब साल में चार बार चूजा पालन कर कमा रही हैं नियमित आय।
  • मुर्गी दाना निर्माण कर छत्तीसगढ़ तक सप्लाई कर रही हैं बिरसमुनी देवी।
  • सालाना लगभग 50 से 60 हजार रुपये की आय अर्जित कर बनीं प्रेरणा।

सिमडेगा जिले के बानो प्रखंड की ग्रामीण महिला बिरसमुनी देवी आज मेहनत, प्रशिक्षण और आत्मविश्वास की बदौलत एक नई पहचान बना चुकी हैं। कभी सामान्य घरेलू महिला के रूप में जीवन बिताने वाली बिरसमुनी देवी अब हार्डनिंग सेंटर संचालन और मुर्गी पालन व्यवसाय के जरिए आर्थिक रूप से मजबूत होकर अन्य महिलाओं के लिए उदाहरण बन गई हैं। उनकी सफलता यह साबित करती है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही दिशा, प्रशिक्षण और अवसर मिले तो वे न केवल आत्मनिर्भर बन सकती हैं बल्कि पूरे समाज को नई दिशा भी दे सकती हैं।

आजीविका समूह से शुरू हुआ बदलाव का सफर

बानो प्रखंड के कानारोवा गांव निवासी बिरसमुनी देवी ने वर्ष 2015 में “प्यारी आजीविका महिला समूह” से जुड़कर अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन की नई शुरुआत की। समूह में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने सचिव पद की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान उन्होंने न केवल समूह की गतिविधियों को मजबूत किया बल्कि गांव की महिलाओं को संगठित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा मिली। वर्ष 2016 में उनका चयन कृषि सखी के रूप में किया गया। इसी दौरान विभाग की ओर से उन्हें मुर्गी पालन का विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

प्रशिक्षण से मिली नई राह

प्रशिक्षण के दौरान बिरसमुनी देवी ने मुर्गियों के पालन-पोषण, चूजा प्रबंधन और पोषण संबंधी तकनीकी जानकारी हासिल की। इसके बाद उन्होंने जेएसएलपीएस के सहयोग से हार्डनिंग सेंटर की कार्यप्रणाली को करीब से समझा।

प्रशिक्षण और अनुभव के आधार पर उन्होंने अपने गांव में हार्डनिंग सेंटर शुरू करने का फैसला लिया। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उन्होंने आत्मविश्वास और मेहनत के साथ कदम बढ़ाया।

1000 चूजों से शुरू हुआ व्यवसाय

बिरसमुनी देवी ने अपने हार्डनिंग सेंटर में शुरुआत में आशील नस्ल के लगभग 1000 चूजों को रखा। उन्होंने 20 से 30 दिनों तक उनका पालन-पोषण किया और फिर बिक्री की।

पहली ही बिक्री में उन्हें लगभग 10 हजार रुपये का लाभ हुआ। यह सफलता उनके लिए नई उम्मीद लेकर आई। उन्होंने महसूस किया कि यह व्यवसाय उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकता है।

बिरसमुनी देवी ने कहा: “समूह से जुड़ने के बाद मुझे नई दिशा मिली। प्रशिक्षण और सहयोग ने मुझे आत्मनिर्भर बनने का आत्मविश्वास दिया।”

लगातार बढ़ता गया कारोबार

पहली सफलता के बाद बिरसमुनी देवी ने दोबारा चूजे मंगाकर व्यवसाय को आगे बढ़ाया। दूसरी बार भी उन्हें अच्छा लाभ प्राप्त हुआ। धीरे-धीरे उनका यह कार्य नियमित व्यवसाय का रूप लेने लगा।

वर्तमान समय में वह साल में चार बार हार्डनिंग सेंटर के माध्यम से चूजा पालन और बिक्री का कार्य कर रही हैं। इससे उन्हें नियमित आय होने लगी है और परिवार की आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हुआ है।

मुर्गी दाना निर्माण से बढ़ी आय

बिरसमुनी देवी ने केवल चूजा पालन तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने मुर्गी दाना तैयार करने का कार्य भी शुरू किया। अब वे अपने गांव के साथ-साथ आसपास के अन्य हार्डनिंग सेंटरों में भी दाना की आपूर्ति कर रही हैं।

हाल ही में उन्होंने छत्तीसगढ़ में लगभग 8 क्विंटल मुर्गी दाना की सप्लाई की, जिससे उन्हें करीब छह हजार रुपये की अतिरिक्त आय हुई। इससे उनके व्यवसाय को और मजबूती मिली।

ग्रामीण महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

आज बिरसमुनी देवी सालाना लगभग 50 से 60 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। उनकी इस उपलब्धि ने गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित किया है।

ग्रामीण क्षेत्र में जहां महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित माने जाते हैं, वहां बिरसमुनी देवी ने यह साबित किया है कि मेहनत और सही मार्गदर्शन से महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत बन सकती हैं।

उनकी सफलता की कहानी अब बानो प्रखंड में महिला सशक्तिकरण का उदाहरण बनती जा रही है।

जेएसएलपीएस और आजीविका समूह की महत्वपूर्ण भूमिका

बिरसमुनी देवी अपनी सफलता का श्रेय झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस), आजीविका महिला समूह और प्रशिक्षण संस्थाओं को देती हैं। उनका कहना है कि यदि उन्हें प्रशिक्षण और सहयोग नहीं मिलता तो शायद वे कभी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पातीं।

ग्रामीण महिलाओं को आजीविका से जोड़ने की यह पहल अब कई परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने में मददगार साबित हो रही है।

न्यूज़ देखो: गांव की महिलाएं बदल रही हैं आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर

बिरसमुनी देवी की कहानी केवल एक महिला की सफलता नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत में बदलती सामाजिक और आर्थिक सोच का उदाहरण है। सरकारी योजनाएं और महिला समूह तभी सफल होते हैं जब उनका लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचे और लोग उसे अपनाकर अपनी जिंदगी बदलें। आज जरूरत है कि ऐसी प्रेरणादायक महिलाओं को और अधिक मंच तथा संसाधन दिए जाएं ताकि गांवों में स्वरोजगार और महिला सशक्तिकरण की नई लहर मजबूत हो सके। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

आत्मनिर्भर गांव की ओर बढ़ते कदम

ग्रामीण महिलाओं की सफलता पूरे समाज को नई दिशा देती है। मेहनत, प्रशिक्षण और अवसर मिल जाए तो गांव की महिलाएं भी बड़े बदलाव की कहानी लिख सकती हैं। बिरसमुनी देवी जैसी महिलाएं यह संदेश देती हैं कि आत्मनिर्भरता की शुरुआत छोटे प्रयासों से ही होती है।

यदि आपके आसपास भी कोई महिला अपने दम पर बदलाव ला रही है, तो उसकी कहानी लोगों तक जरूर पहुंचाएं। ऐसी प्रेरणादायक खबरों को साझा करें, अपनी राय कमेंट में दें और गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करें।

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Written by

बानो, सिमडेगा

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