#सिमडेगा #रामरेखा_धाम : पर्यटन क्षेत्र के फैसले के विरोध में श्रद्धालुओं ने तीर्थ क्षेत्र घोषित करने की मांग उठाई।
सिमडेगा के ऐतिहासिक श्रीरामरेखा धाम को पर्यटन क्षेत्र घोषित किए जाने के विरोध में मंगलवार को हजारों श्रद्धालुओं ने आक्रोश मार्च निकाला। सनातन समाज और संत समाज के नेतृत्व में गांधी मैदान से समाहरणालय तक पैदल मार्च कर धाम को तीर्थ क्षेत्र घोषित करने की मांग उठाई गई। आंदोलन में झारखंड के साथ ओडिशा और छत्तीसगढ़ से भी श्रद्धालु शामिल हुए। प्रतिनिधिमंडल ने पर्यटन मंत्री के नाम हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन प्रशासन को सौंपा।
- श्रीरामरेखा धाम को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने के विरोध में हजारों श्रद्धालु सड़कों पर उतरे।
- गांधी मैदान से समाहरणालय तक निकाला गया विशाल आक्रोश मार्च।
- संत समाज ने धाम को तीर्थ क्षेत्र घोषित करने की मांग उठाई।
- कृष्ण चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज ने धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करने की चेतावनी दी।
- ओडिशा और छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आंदोलन में शामिल हुए।
- प्रशासन को पर्यटन मंत्री के नाम हजारों हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन सौंपा गया।
सिमडेगा का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाला श्रीरामरेखा धाम मंगलवार को एक बड़े जनआंदोलन का केंद्र बन गया। धाम को पर्यटन क्षेत्र घोषित किए जाने के विरोध में सनातन समाज ने शहर में विशाल आक्रोश मार्च निकाला। हजारों श्रद्धालु, संत समाज के प्रतिनिधि और विभिन्न सामाजिक संगठनों के सदस्य गांधी मैदान में एकत्र हुए, जहां से समाहरणालय तक पैदल मार्च किया गया। पूरे शहर में “श्रीरामरेखा धाम को तीर्थ क्षेत्र घोषित करो” जैसे नारों की गूंज सुनाई देती रही।
आंदोलन में शामिल लोगों का कहना था कि भगवान श्रीराम के वनगमन काल से जुड़ा यह स्थल केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। इसलिए इसे तीर्थ क्षेत्र का दर्जा मिलना चाहिए।
संत समाज ने जताया विरोध
कार्यक्रम में संत समाज के प्रांत अध्यक्ष कृष्ण चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज ने कहा कि सनातन समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का अधिकार किसी को नहीं है। उन्होंने कहा कि श्रीरामरेखा धाम सदियों से वनवासी और सनातनी समाज की आस्था का केंद्र रहा है।
कृष्ण चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज ने कहा, “जिस प्रकार अयोध्या को राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के रूप में पहचान मिली है, उसी प्रकार श्रीरामरेखा धाम को भी तीर्थ क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि पर्यटन क्षेत्र घोषित करने से इस पवित्र स्थल की धार्मिक मर्यादा प्रभावित हो सकती है।
ओडिशा और छत्तीसगढ़ से भी पहुंचे श्रद्धालु
आक्रोश मार्च में केवल सिमडेगा जिले के लोग ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों ओडिशा और छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। गांधी मैदान में सुबह से ही लोगों का जुटान शुरू हो गया था।
चिलचिलाती धूप के बावजूद हजारों श्रद्धालु हाथों में धार्मिक ध्वज और बैनर लेकर पैदल मार्च में शामिल हुए। रैली समाहरणालय पहुंची, जहां प्रशासन द्वारा बैरिकेडिंग कर भीड़ को रोका गया। इसके बाद संत समाज के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने एसडीओ सिमडेगा को पर्यटन मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।
ज्ञापन में मांग की गई कि सरकार पर्यटन क्षेत्र घोषित करने के निर्णय पर पुनर्विचार करे और श्रीरामरेखा धाम को आधिकारिक रूप से तीर्थ क्षेत्र घोषित करे।
धार्मिक मर्यादा बनाए रखने की मांग
सनातन समाज के प्रतिनिधि कौशल राज सिंह देव ने कहा कि श्रीरामरेखा धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है।
कौशल राज सिंह देव ने कहा, “यदि इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया तो ऐसे लोगों का आगमन बढ़ेगा जो धार्मिक मर्यादाओं का पालन नहीं करेंगे, जिससे धाम की पवित्रता प्रभावित होगी।”
उन्होंने कहा कि सरकार को तीर्थ स्थलों की गरिमा बनाए रखने के लिए अलग नीति बनानी चाहिए।
तीर्थ और पर्यटन में अंतर बताया
कार्यक्रम में उपस्थित जैन मुनि डॉ. पद्मराज ने भी अपनी बात रखते हुए तीर्थ और पर्यटन के बीच का अंतर स्पष्ट किया।
डॉ. पद्मराज ने कहा, “पर्यटन का उद्देश्य मनोरंजन और मौज-मस्ती होता है, जबकि तीर्थ लोगों को आध्यात्मिक चेतना और आत्मशुद्धि से जोड़ता है। इसलिए श्रीरामरेखा धाम को तीर्थ क्षेत्र के रूप में ही मान्यता दी जानी चाहिए।”
उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ी हुई है, इसलिए ऐसे स्थलों के संरक्षण में संवेदनशीलता जरूरी है।
आंदोलन को लेकर आगे की चेतावनी
कार्यक्रम में विभिन्न मंदिर समितियों, धार्मिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। वक्ताओं ने कहा कि फिलहाल यह एक सांकेतिक आंदोलन है, लेकिन यदि सरकार ने जल्द निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
श्रद्धालुओं ने प्रशासन से मांग की कि श्रीरामरेखा धाम की धार्मिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए विशेष नीति बनाई जाए और यहां तीर्थ क्षेत्र के अनुरूप सुविधाएं विकसित की जाएं।
श्रीरामरेखा धाम का धार्मिक महत्व
श्रीरामरेखा धाम को भगवान श्रीराम के वनगमन काल से जुड़ा स्थल माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान इस क्षेत्र में पहुंचे थे। इसी कारण यह स्थल वर्षों से श्रद्धालुओं के लिए आस्था और भक्ति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
हर वर्ष यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थल केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है।
न्यूज़ देखो: आस्था और प्रशासनिक फैसलों के बीच संतुलन जरूरी
श्रीरामरेखा धाम को लेकर उठी यह आवाज केवल एक धार्मिक आंदोलन नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान और आस्था से जुड़ा बड़ा सवाल है। सरकार के लिए जरूरी है कि विकास और पर्यटन की योजनाओं के साथ धार्मिक भावनाओं का भी सम्मान किया जाए। तीर्थ स्थलों की गरिमा बनाए रखना प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। आने वाले दिनों में सरकार इस मांग पर क्या निर्णय लेती है, इस पर पूरे क्षेत्र की नजर बनी रहेगी। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
आस्था की विरासत को संभालना हमारी साझा जिम्मेदारी
धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरें केवल इमारतें नहीं होतीं, वे समाज की पहचान और परंपरा की जीवित निशानी होती हैं।
नई पीढ़ी को अपनी आस्था और संस्कृति के महत्व को समझना होगा।
सामाजिक सौहार्द और धार्मिक सम्मान के साथ ही विकास का सही रास्ता निकल सकता है।
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