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शिक्षा के नाम पर चंदा वसूली का आरोप, घाघरा में सॉलिटेयर एकेडमी फिर विवादों में

#घाघरा #शिक्षा_विवाद : कैंसर पीड़ित की मदद के नाम पर स्कूली बच्चों से बाजार में करवाई गई कथित चंदा वसूली।

गुमला जिले के घाघरा प्रखंड स्थित सॉलिटेयर एकेडमी पर गंभीर आरोप सामने आए हैं, जहां स्कूली बच्चों को पढ़ाई के समय बाजार भेजकर कैंसर पीड़ित के नाम पर चंदा मंगवाने का मामला उजागर हुआ है। स्कूल यूनिफॉर्म में बच्चों को सार्वजनिक स्थानों पर चंदा मांगते देख स्थानीय लोग और अभिभावक आक्रोशित हो गए। मामला बाल अधिकार, बच्चों की सुरक्षा और शैक्षणिक मर्यादा से जुड़ा होने के कारण प्रशासनिक स्तर पर भी गंभीरता से लिया गया है। जिला शिक्षा विभाग ने जांच के संकेत दिए हैं।

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  • सॉलिटेयर एकेडमी, मकरा गांव पर बच्चों से चंदा वसूली का आरोप।
  • स्कूल यूनिफॉर्म में बाजार भेजे गए नौनिहाल।
  • मेडल और सर्टिफिकेट का लालच देकर डोनेशन लक्ष्य तय करने की बात।
  • अभिभावकों और बुद्धिजीवियों में आक्रोश, बाल अधिकारों पर सवाल।
  • जिला शिक्षा पदाधिकारी ने जांच का आश्वासन दिया।

घाघरा प्रखंड के मकरा गांव स्थित सॉलिटेयर एकेडमी एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। इस बार आरोप बेहद गंभीर हैं। स्कूल प्रबंधन पर आरोप है कि उसने शिक्षा के मंदिर में पढ़ने वाले मासूम बच्चों को समाज सेवा के नाम पर बाजार में उतारकर कैंसर पीड़ित के इलाज के लिए चंदा वसूली करवायी। पढ़ाई के समय बच्चों को इस तरह सार्वजनिक स्थानों पर भेजे जाने से क्षेत्र में नाराजगी फैल गई है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, घाघरा प्रखंड मुख्यालय के बाजार में कई दुकानदारों और राहगीरों ने स्कूल यूनिफॉर्म पहने छोटे-छोटे बच्चों को हाथ में चंदा का डिब्बा लेकर घूमते देखा। जब लोगों ने बच्चों से पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि यह निर्देश स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा दिया गया है और उन्हें कैंसर पीड़ित की मदद के लिए पैसा इकट्ठा करना है।

पढ़ाई के समय बाजार में बच्चे

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह गतिविधि स्कूल समय के दौरान करवाई गई। अभिभावकों का कहना है कि वे बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कूल भेजते हैं, न कि चंदा वसूली के लिए। बच्चों की कम उम्र और बाजार की भीड़ को देखते हुए सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि मदद करना मानवता का कार्य है, लेकिन इसके लिए बच्चों को आगे करना न केवल अनुचित है, बल्कि उनके आत्मसम्मान और सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है।

मेडल और सर्टिफिकेट का ‘रेट कार्ड’

मामले में सामने आया एक और पहलू लोगों को और अधिक नाराज कर रहा है। आरोप है कि बच्चों को अधिक चंदा लाने के लिए मेडल और सर्टिफिकेट का लालच दिया गया। कथित तौर पर बच्चों के लिए एक तरह का ‘रेट कार्ड’ तय किया गया था।

  • ₹249 से ₹349 तक चंदा लाने पर सिल्वर मेडल और सर्टिफिकेट।
  • ₹349 से ₹450 तक चंदा लाने पर गोल्ड मेडल और सर्टिफिकेट।
  • ₹450 से अधिक चंदा लाने पर विशेष गोल्ड मेडल और सर्टिफिकेट।

स्थानीय बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह बच्चों में सेवा भाव पैदा करने का तरीका नहीं, बल्कि उन्हें लक्ष्य आधारित वसूली के लिए इस्तेमाल करने जैसा है।

अभिभावकों और समाज के सवाल

इस घटना के बाद अभिभावकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कई सवाल खड़े किए हैं।
क्या स्कूली बच्चों को पढ़ाई छोड़कर बाजारों में चंदा मांगने भेजना उचित है।
बाजार जैसी भीड़भाड़ वाली जगहों पर बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा।
क्या स्कूल प्रशासन ने जिला प्रशासन या शिक्षा विभाग से इसकी अनुमति ली थी।

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लोगों का कहना है कि यदि वास्तव में किसी कैंसर पीड़ित की मदद करनी थी, तो स्कूल स्वयं अभिभावकों या समाज से सहयोग मांग सकता था, न कि बच्चों को माध्यम बनाया जाता।

स्कूल प्रबंधन का पक्ष

मामले पर सॉलिटेयर एजुकेशनल एकेडमी के प्रिंसिपल चंद्रकांत पाठक ने आरोपों को आंशिक रूप से खारिज करते हुए इसे जागरूकता कार्यक्रम बताया।

चंद्रकांत पाठक ने कहा: “यह एक जागरूकता कार्यक्रम था। बच्चों को केवल हस्ताक्षर करवा कर लाना था। डोनेशन पूरी तरह स्वेच्छा पर निर्भर था, जितना मिल जाए ले लेना था।”

हालांकि, इस सफाई से अभिभावकों का आक्रोश कम होता नहीं दिख रहा है।

शिक्षा विभाग की प्रतिक्रिया

जिला शिक्षा पदाधिकारी कविता खलखो ने मामले को गंभीर बताते हुए जांच का आश्वासन दिया है।

कविता खलखो ने कहा: “मामले की जानकारी मिली है। इसकी जांच कराई जाएगी और यदि नियमों का उल्लंघन पाया गया तो संबंधित स्कूल प्रबंधन के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।”

बढ़ता जनआक्रोश

फिलहाल इस घटना को लेकर घाघरा क्षेत्र में गहरी नाराजगी है। अभिभावक और प्रबुद्ध नागरिक शिक्षा विभाग से मांग कर रहे हैं कि बच्चों के अधिकार और सुरक्षा से जुड़े इस मामले में सख्त कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में शिक्षा के नाम पर बच्चों का इस तरह उपयोग न किया जा सके।

न्यूज़ देखो: शिक्षा या शोषण की सीमा

यह मामला दिखाता है कि समाज सेवा के नाम पर कहीं न कहीं शैक्षणिक मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ है। बच्चों की सुरक्षा, सम्मान और शिक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। अब देखना होगा कि जांच के बाद प्रशासन क्या ठोस कदम उठाता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

बच्चों का भविष्य सबसे पहले

शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को सशक्त बनाना है, न कि उन्हें किसी लक्ष्य या लालच का माध्यम बनाना। समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है कि ऐसे मामलों पर सजग रहें। अपनी राय साझा करें, इस खबर को आगे बढ़ाएं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाएं।

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