
#बरवाडीह #कानूनी_जागरूकता : विद्यालय में बाल विवाह कानून पर छात्र-छात्राओं को जागरूक किया गया।
लातेहार जिले के बरवाडीह स्थित संत सोल्जर पब्लिक स्कूल में बाल विवाह (प्रतिषेध) अधिनियम, 2006 पर जागरूकता सेमिनार आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण और झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देश पर संपन्न हुआ। सेमिनार में विद्यार्थियों को बाल विवाह के दुष्परिणाम, कानूनी प्रावधान और अधिकारों की जानकारी दी गई, जो सामाजिक जागरूकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
- संत सोल्जर पब्लिक स्कूल, बरवाडीह में बाल विवाह कानून पर जागरूकता सेमिनार का आयोजन।
- कार्यक्रम का आयोजन NALSA एवं JHALSA, रांची के निर्देश पर किया गया।
- अध्यक्षता प्राचार्य सुनील कुमार सिंह ने की।
- पीएलवी डॉ. मुरारी झा ने बाल विवाह अधिनियम के कानूनी प्रावधान समझाए।
- छात्र-छात्राओं को 18 और 21 वर्ष की वैधानिक आयु संबंधी जानकारी दी गई।
लातेहार जिले के बरवाडीह प्रखंड में बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से संत सोल्जर पब्लिक स्कूल परिसर में एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) एवं झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (JHALSA), रांची के निर्देश तथा माननीय प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार लातेहार के मार्गदर्शन में यह कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यालय के प्राचार्य सुनील कुमार सिंह ने की, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, शिक्षक-शिक्षिकाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सहभागिता की।
सेमिनार का उद्देश्य और आयोजन की पृष्ठभूमि
इस जागरूकता सेमिनार का मुख्य उद्देश्य बाल विवाह (प्रतिषेध) अधिनियम, 2006 के प्रति विद्यार्थियों और समाज में कानूनी समझ विकसित करना था। ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अब भी बाल विवाह जैसी कुरीतियां देखने को मिलती हैं, जिसे रोकने के लिए विधिक जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि विद्यालय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि छात्र-छात्राएं समाज के भविष्य होते हैं और वे अपने परिवार व समुदाय को भी जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस प्रकार के विधिक सेमिनार सामाजिक बदलाव की दिशा में ठोस कदम माने जाते हैं।
बाल विवाह (प्रतिषेध) अधिनियम 2006 की विस्तृत जानकारी
सेमिनार के दौरान पैरा लीगल वॉलंटियर (पीएलवी) डॉ. मुरारी झा ने बाल विवाह निषेध अधिनियम के कानूनी प्रावधानों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह अधिनियम वर्ष 2007 से पूरे देश में प्रभावी है और इसका उद्देश्य बाल विवाह जैसी कुप्रथा को पूर्ण रूप से समाप्त करना है।
डॉ. मुरारी झा ने कहा:
“बाल विवाह निषेध अधिनियम वर्ष 2007 से पूरे देश में प्रभावी है और इसका उद्देश्य बाल विवाह जैसी कुप्रथा को पूरी तरह समाप्त करना है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु की लड़की तथा 21 वर्ष से कम आयु के लड़के का विवाह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध संज्ञेय एवं गैर-जमानती है, जिसमें दोषी पाए जाने पर दो वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
बाल विवाह के दुष्परिणामों पर विशेषज्ञों का जोर
वक्ताओं ने छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए बाल विवाह के सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणामों पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कम उम्र में विवाह से बच्चों की शिक्षा बाधित होती है और उनका मानसिक तथा शारीरिक विकास प्रभावित होता है।
विशेष रूप से बालिकाओं के संदर्भ में बताया गया कि कम आयु में विवाह से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, साथ ही उनका सामाजिक और आर्थिक विकास भी प्रभावित होता है। वक्ताओं ने कहा कि बाल विवाह से बालिकाओं के आत्मनिर्भर बनने की संभावनाएं कम हो जाती हैं और उनका भविष्य असुरक्षित हो जाता है।
छात्रों को उनके अधिकारों के प्रति किया गया जागरूक
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को उनके मौलिक अधिकारों, शिक्षा के महत्व और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रेरित किया गया। उन्हें बताया गया कि शिक्षा ही जीवन को बेहतर दिशा देने का सबसे सशक्त माध्यम है और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं शिक्षा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनती हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि बच्चों को अपने अधिकारों की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे किसी भी प्रकार के सामाजिक दबाव या कुरीतियों का विरोध कर सकें। साथ ही विद्यार्थियों को यह भी बताया गया कि किसी भी संदिग्ध बाल विवाह की सूचना 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन या नजदीकी पुलिस प्रशासन को देकर इसे रोका जा सकता है।
समाज, परिवार और विद्यालय की संयुक्त जिम्मेदारी
सेमिनार में यह भी रेखांकित किया गया कि बाल विवाह केवल एक कानूनी अपराध ही नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक कुरीति है। इसे समाप्त करने के लिए समाज, परिवार, विद्यालय और प्रशासन की सामूहिक भागीदारी आवश्यक है। जागरूकता के अभाव में कई बार परिवार सामाजिक दबाव या परंपराओं के कारण कम उम्र में बच्चों का विवाह कर देते हैं।
वक्ताओं ने कहा कि यदि विद्यालय स्तर से ही बच्चों को कानून और सामाजिक जिम्मेदारियों की जानकारी दी जाए, तो वे अपने आसपास होने वाली गलत परंपराओं के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। इससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद मिलती है।
विद्यालय परिवार की सक्रिय सहभागिता
कार्यक्रम में विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लिया और बाल विवाह रोकने का संकल्प लिया। प्राचार्य सुनील कुमार सिंह ने भी विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए शिक्षा के महत्व और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता पर जोर दिया।
विद्यालय प्रबंधन की ओर से सभी अतिथियों का स्वागत किया गया तथा अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस दौरान विद्यार्थियों में बाल विवाह के प्रति जागरूकता और कानून के प्रति समझ विकसित होती स्पष्ट रूप से देखी गई।
जागरूकता कार्यक्रमों की बढ़ती आवश्यकता
लातेहार जैसे जिलों में इस प्रकार के विधिक जागरूकता कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि यहां सामाजिक स्तर पर कई चुनौतियां मौजूद हैं। बाल विवाह उन्मूलन के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जन-जागरूकता और शिक्षा का प्रसार भी उतना ही आवश्यक है।
इस सेमिनार ने यह संदेश दिया कि जब प्रशासन, विधिक संस्थाएं और शैक्षणिक संस्थान मिलकर कार्य करते हैं, तब सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाया जा सकता है। ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में प्रेरित करते हैं।
न्यूज़ देखो: बाल विवाह के खिलाफ शिक्षा आधारित जागरूकता की मजबूत पहल
बरवाडीह में आयोजित यह जागरूकता सेमिनार दर्शाता है कि बाल विवाह जैसी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए विधिक शिक्षा और सामाजिक जागरूकता सबसे प्रभावी माध्यम हैं। विद्यालय स्तर पर कानून की जानकारी देना एक दूरदर्शी पहल है, जिससे नई पीढ़ी सजग और जिम्मेदार बन सकती है। अब सवाल यह है कि क्या ऐसे कार्यक्रमों को ग्रामीण स्तर पर नियमित रूप से बढ़ाया जाएगा। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
जागरूक समाज ही बाल विवाह मुक्त भविष्य की पहचान
बाल विवाह रोकना केवल कानून का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है।
हर छात्र और अभिभावक को इस कुरीति के खिलाफ जागरूक होना होगा।
शिक्षा, जागरूकता और कानूनी समझ से ही सुरक्षित भविष्य संभव है।
यदि कहीं बाल विवाह की आशंका दिखे तो चुप न रहें, जिम्मेदारी निभाएं।
सजग नागरिक बनें, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाएं।
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