#गुमला #अवैधबालूखनन : नागफेनी कोयल नदी पुल के समीप दिनदहाड़े बालू उठाव जारी है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जहां पर्यावरण संरक्षण के संदेश दिए जा रहे हैं, वहीं गुमला जिले के नागफेनी स्थित कोयल नदी पुल के पास कथित अवैध बालू उठाव चिंता का विषय बन गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि दिनदहाड़े ट्रैक्टरों से बालू की निकासी की जा रही है, जिससे नदी, पर्यावरण और पुल की सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा है। क्षेत्रवासियों ने प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
- नागफेनी स्थित कोयल नदी पुल के समीप कथित रूप से दिनदहाड़े बालू उठाव जारी।
- स्थानीय लोगों का आरोप, ट्रैक्टरों के माध्यम से बालू निकालकर आसपास डंप और बिक्री की जा रही है।
- पहले से प्रभावित पुल की सुरक्षा को लेकर ग्रामीणों में बढ़ी चिंता।
- अवैध खनन से नदी के जलस्तर और पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल।
- खनन विभाग और प्रशासन से कार्रवाई की मांग तेज हुई।
विश्व पर्यावरण दिवस पर एक ओर पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के बचाव की बातें की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर गुमला जिले के सिसई प्रखंड अंतर्गत नागफेनी स्थित कोयल नदी क्षेत्र में कथित अवैध बालू खनन के आरोपों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप स्थित नदी क्षेत्र से खुलेआम बालू निकाला जा रहा है, जिससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पहले से क्षतिग्रस्त पुल की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।
पुल के समीप बालू उठाव को लेकर बढ़ी चिंता
स्थानीय लोगों के अनुसार नागफेनी स्थित कोयल नदी पुल के आसपास लगातार बालू निकासी की जा रही है। आरोप है कि ट्रैक्टरों के माध्यम से नदी से बालू निकालकर पास के क्षेत्रों में डंप किया जा रहा है और बाद में उसका व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह गतिविधि दिन के समय खुलेआम हो रही है, जिससे लोगों में प्रशासनिक निगरानी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। उनका मानना है कि नदी के संवेदनशील हिस्से से लगातार बालू हटाए जाने से भूमि की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
पहले से प्रभावित पुल पर फिर मंडराया खतरा
नागफेनी स्थित कोयल नदी का नया पुल पिछले काफी समय से पूरी तरह उपयोग में नहीं लाया जा रहा है। स्थानीय जानकारी के अनुसार पुल के एक पिलर में तकनीकी समस्या और धंसाव की स्थिति सामने आने के बाद वहां से आवागमन रोक दिया गया था।
ऐसे में ग्रामीणों का कहना है कि पुल के समीप लगातार बालू निकासी होने से उसकी नींव और आसपास की संरचना पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। लोगों ने आशंका जताई है कि यदि समय रहते स्थिति की जांच नहीं हुई तो भविष्य में पुल को और अधिक नुकसान पहुंच सकता है।
पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ सकता है असर
पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि नदी से अनियंत्रित बालू निकासी का सीधा असर जलधारण क्षमता और नदी तंत्र पर पड़ता है। बालू प्राकृतिक फिल्टर का काम करती है और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि नदी तल के अत्यधिक दोहन से जलस्तर प्रभावित हो सकता है। साथ ही नदी किनारों पर कटाव बढ़ने की संभावना भी रहती है। कटाव के कारण नदी तट के पेड़-पौधों और वनस्पतियों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे स्थानीय जैव विविधता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
प्रशासनिक निगरानी को लेकर उठ रहे सवाल
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि क्षेत्र से होकर विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मी गुजरते हैं, लेकिन कथित अवैध बालू उठाव पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है। ग्रामीणों ने मांग की है कि खनन विभाग, जिला प्रशासन और पुलिस संयुक्त रूप से क्षेत्र का निरीक्षण करें तथा यदि अवैध गतिविधियां हो रही हैं तो उनके विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करें।
लोगों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और सार्वजनिक संरचनाओं की सुरक्षा के लिए समय रहते प्रभावी कदम उठाना आवश्यक है।
पर्यावरण दिवस पर संरक्षण बनाम दोहन की बहस
विश्व पर्यावरण दिवस का मूल उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ावा देना है। ऐसे समय में यदि नदी, जलस्रोत और प्राकृतिक संपदाओं के दोहन के आरोप सामने आते हैं, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि विकास और संसाधनों के उपयोग के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यदि नियमों के तहत खनन गतिविधियां संचालित हों तो पर्यावरणीय नुकसान को कम किया जा सकता है, लेकिन अवैध या अनियंत्रित दोहन दीर्घकालिक संकट पैदा कर सकता है।



न्यूज़ देखो: प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा केवल प्रशासन नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी
कोयल नदी क्षेत्र से कथित अवैध बालू उठाव का मामला केवल खनन नियमों का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है। यदि पुल की संरचना और नदी के पारिस्थितिक तंत्र पर खतरे की आशंकाएं सही हैं, तो संबंधित विभागों को तत्काल तकनीकी जांच करानी चाहिए। विश्व पर्यावरण दिवस पर यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण केवल सरकारी दायित्व नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी भी है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
प्रकृति बचेगी तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा
नदियां, जंगल और जलस्रोत हमारी आने वाली पीढ़ियों की धरोहर हैं।
क्षणिक लाभ के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन भविष्य के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है।
आइए पर्यावरण संरक्षण को केवल एक दिवस का अभियान न बनाकर जीवन का हिस्सा बनाएं।
प्रकृति की रक्षा ही मानव जीवन की सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार है।
यदि आपके क्षेत्र में भी पर्यावरण या प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण मुद्दा है, तो उसकी जानकारी साझा करें। अपनी राय कमेंट में दें, खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं और पर्यावरण संरक्षण की इस मुहिम का हिस्सा बनें।

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