13 वर्षों की प्रतीक्षा हुई समाप्त, ग्रामीणों ने चंदा और श्रमदान से पूरा किया सरना स्थल की घेराबंदी कार्य

13 वर्षों की प्रतीक्षा हुई समाप्त, ग्रामीणों ने चंदा और श्रमदान से पूरा किया सरना स्थल की घेराबंदी कार्य

author Udaychand Kumar
25 Views Download E-Paper (2)
#सिसई #सरना_संरक्षण : ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से वर्षों से लंबित सरना घेराबंदी कार्य पूरा हुआ।

गुमला जिले के सिसई प्रखंड अंतर्गत कुदरा गांव में लगभग 12-13 वर्षों से अधूरा पड़ा सरना स्थल घेराबंदी कार्य ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से पूरा कर लिया गया। आदिवासी समाज के लोगों ने चंदा संग्रह और श्रमदान के माध्यम से चारदीवारी निर्माण कार्य को पूर्ण किया। कार्य पूर्ण होने के बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना एवं उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया। यह पहल सामुदायिक एकता, संस्कृति संरक्षण और जनभागीदारी का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई है।

Join WhatsApp
  • कुदरा गांव में 12-13 वर्षों से लंबित सरना घेराबंदी कार्य पूरा हुआ।
  • ग्रामीणों ने चंदा संग्रह और श्रमदान के जरिए चारदीवारी निर्माण कराया।
  • कार्य पूर्ण होने पर पारंपरिक पूजा-अर्चना एवं फीता काटकर उद्घाटन किया गया।
  • पूर्व में सरकारी योजना के तहत शुरू हुआ कार्य बीच में अधूरा रह गया था।
  • ग्रामीणों ने सरना स्थल के सौंदर्यीकरण एवं संरक्षण की भी मांग उठाई।
  • उद्घाटन समारोह में पहान, पुजार, ग्राम प्रधान सहित सैकड़ों ग्रामीण शामिल हुए।

सिसई प्रखंड के कुदरा गांव में सामुदायिक एकजुटता और सांस्कृतिक संरक्षण का एक प्रेरणादायक उदाहरण देखने को मिला है। गांव के आदिवासी समाज ने वर्षों से अधूरी पड़ी सरना स्थल घेराबंदी योजना को अपने संसाधनों और श्रम के बल पर पूरा कर दिखाया। लंबे समय से अधूरे पड़े इस कार्य के पूर्ण होने पर गांव में खुशी और उत्साह का माहौल है।

सरना स्थल आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। ऐसे में इसकी घेराबंदी पूर्ण होने को ग्रामीण अपनी सांस्कृतिक पहचान और विरासत के संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं।

12-13 वर्षों से अधूरा पड़ा था कार्य

ग्रामीणों ने बताया कि लगभग 12-13 वर्ष पूर्व सरकारी स्तर पर सरना स्थल की घेराबंदी का कार्य शुरू किया गया था। हालांकि, योजना से जुड़े समिति के अध्यक्ष और सचिव के असामयिक निधन के बाद निर्माण कार्य बीच में ही रुक गया।

इसके बाद ग्रामीणों द्वारा कई बार प्रयास किए गए, लेकिन योजना को पुनः गति नहीं मिल सकी। परिणामस्वरूप सरना स्थल की चारदीवारी अधूरी रह गई और समय के साथ यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

लंबे समय तक कोई समाधान नहीं निकलने से गांव के लोगों में निराशा बढ़ने लगी थी। लेकिन अंततः गांव के प्रबुद्ध नागरिकों और युवाओं ने स्वयं पहल कर इस अधूरे कार्य को पूरा करने का निर्णय लिया।

गांव की बैठक में लिया गया ऐतिहासिक निर्णय

सरना स्थल के महत्व को देखते हुए गांव में बैठक आयोजित की गई, जिसमें सभी समुदाय के लोगों ने भाग लिया। बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि गांव के लोग आपसी सहयोग से चंदा एकत्र करेंगे और श्रमदान कर अधूरे निर्माण कार्य को पूरा करेंगे।

इसके बाद गांव के लोगों ने आर्थिक सहयोग के साथ-साथ स्वयं श्रमदान भी किया। सामूहिक प्रयासों का परिणाम यह रहा कि वर्षों से लंबित सरना घेराबंदी का कार्य आखिरकार पूरा हो गया।

ग्रामीणों का कहना है कि यह कार्य केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि गांव की सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है।

पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुआ उद्घाटन

घेराबंदी कार्य पूरा होने के बाद सरना स्थल पर पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों और धार्मिक विधि-विधान के अनुसार पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया। इसके पश्चात फीता काटकर चारदीवारी का उद्घाटन किया गया।

उद्घाटन समारोह में गांव के बुजुर्ग, महिलाएं, पुरुष, युवा और प्रबुद्ध नागरिक बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूरे आयोजन के दौरान लोगों में उत्साह और गर्व का भाव देखने को मिला।

ग्रामीणों ने कहा कि सामूहिक प्रयास और सामाजिक एकता से कोई भी अधूरा कार्य पूरा किया जा सकता है। सरना स्थल की घेराबंदी इसका जीवंत उदाहरण है।

सौंदर्यीकरण और संरक्षण की उठी मांग

ग्रामीणों ने बताया कि यदि संबंधित विभाग द्वारा इस योजना का लंबित बकाया भुगतान कर दिया जाए तो सरना स्थल की चारदीवारी पर प्लास्टर, रंग-रोगन और अन्य सौंदर्यीकरण कार्य भी कराया जा सकता है।

लोगों ने मांग की कि आदिवासी समाज की आस्था से जुड़े इस महत्वपूर्ण स्थल के संरक्षण और विकास के लिए प्रशासन भी सकारात्मक पहल करे। इससे आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति और परंपरा से जोड़ने में मदद मिलेगी।

बड़ी संख्या में ग्रामीण रहे उपस्थित

कार्यक्रम में मुख्य रूप से पहान कीनू उरांव, पुजार मगन उरांव, पैनभरा लेपा उरांव, ग्राम प्रधान जयराम उरांव सहित सैकड़ों महिला-पुरुष, युवा एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

सभी ने सरना स्थल के संरक्षण और गांव की सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए मिलकर कार्य करने का संकल्प लिया।

न्यूज़ देखो: जनभागीदारी से बदली तस्वीर

कुदरा गांव की यह पहल बताती है कि जब समाज किसी साझा उद्देश्य के लिए एकजुट होता है तो वर्षों से लंबित कार्य भी पूरे हो सकते हैं। सरकारी योजनाओं के अधूरे रह जाने के बावजूद ग्रामीणों ने हार नहीं मानी और अपने बलबूते सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का उदाहरण प्रस्तुत किया। यह घटना केवल एक चारदीवारी निर्माण की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक चेतना और सामुदायिक नेतृत्व की मिसाल है। अब जरूरत है कि संबंधित विभाग भी आगे बढ़कर सरना स्थल के सौंदर्यीकरण और संरक्षण में सहयोग करे। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

संस्कृति की रक्षा में समाज की भागीदारी सबसे बड़ी ताकत

अपनी संस्कृति, परंपरा और धरोहरों को सुरक्षित रखना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।
कुदरा गांव के लोगों ने यह साबित कर दिया कि सामूहिक प्रयास से बड़े से बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
यदि हर गांव और समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए आगे आए तो हमारी पहचान और परंपराएं और मजबूत होंगी।
आइए, अपनी जड़ों से जुड़ें और आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने का संकल्प लें।

आप इस पहल के बारे में क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें, खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं और समाज में सकारात्मक बदलाव की ऐसी प्रेरक कहानियों को आगे बढ़ाएं।

📥 Download E-Paper

यह खबर आपके लिए कितनी महत्वपूर्ण थी?

रेटिंग देने के लिए किसी एक स्टार पर क्लिक करें!

इस खबर की औसत रेटिंग: 0 / 5. कुल वोट: 0

अभी तक कोई वोट नहीं! इस खबर को रेट करने वाले पहले व्यक्ति बनें।

चूंकि आपने इस खबर को उपयोगी पाया...

हमें सोशल मीडिया पर फॉलो करें!

Written by

सिसई, गुमला

🗣️ Join the Conversation!

What are your thoughts on this update? Read what others are saying below, or share your own perspective to keep the discussion going. (Please keep comments respectful and on-topic).

ये खबर आपको कैसी लगी, अपनी प्रतिक्रिया दें

🔔

Notification Preferences

error: