#गढ़वा #खेतबचाओअभियान : कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को जलवायु अनुकूल खेती अपनाने की सलाह दी।
गढ़वा के मेढ़ना स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में गुरुवार को खेत बचाओ अभियान के ग्यारहवें दिन किसानों को टिकाऊ और जलवायु अनुकूल खेती के प्रति जागरूक किया गया। कार्यक्रम में जल संरक्षण, फसल विविधता, मृदा स्वास्थ्य और संतुलित उर्वरक उपयोग पर विशेष चर्चा हुई। वैज्ञानिकों ने किसानों को कम पानी वाली फसलों और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने की सलाह दी। अभियान का उद्देश्य खेती को अधिक लाभकारी और भविष्य के लिए सुरक्षित बनाना है।
- कृषि विज्ञान केंद्र गढ़वा में खेत बचाओ अभियान के ग्यारहवें दिन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित हुआ।
- वरीय वैज्ञानिक महेश चन्द्र जेराई ने जल संरक्षण और फसल विविधता अपनाने पर जोर दिया।
- किसानों को धान की सीधी बुआई, कम पानी वाली फसलें और कम अवधि वाली किस्मों के चयन की सलाह दी गई।
- मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य कार्ड की अनुशंसाओं का पालन करने पर बल दिया गया।
- जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद और दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने की जानकारी दी गई।
- कार्यक्रम में कई प्रगतिशील किसान उपस्थित रहे और खेती से जुड़े अनुभव साझा किए गए।
गढ़वा जिले के मेढ़ना स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में चल रहे खेत बचाओ अभियान के अंतर्गत गुरुवार को किसानों के लिए एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। अभियान के ग्यारहवें दिन आयोजित इस कार्यक्रम में किसानों को जलवायु परिवर्तन, घटते जलस्तर और मिट्टी की उर्वरता जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए आधुनिक एवं वैज्ञानिक खेती के तरीकों की जानकारी दी गई। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि वर्तमान समय में खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाने के लिए फसल विविधता, जल संरक्षण और संतुलित पोषण प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है।
जल संरक्षण को खेती का आधार बनाने की अपील
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, गढ़वा के वरीय वैज्ञानिक सह प्रधान महेश चन्द्र जेराई ने किसानों से जल संरक्षण को प्राथमिकता देने की अपील की। उन्होंने कहा कि बदलते मौसम और कम होती वर्षा की स्थिति में किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ नई तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने किसानों को सलाह दी कि धान की रोपनी के बजाय धान की सीधी बुआई की तकनीक अपनाएं, जिससे पानी की बचत होगी और उत्पादन लागत भी कम होगी। इसके अलावा कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों तथा कम अवधि में तैयार होने वाली किस्मों का चयन करने की भी सलाह दी गई।
महेश चन्द्र जेराई ने कहा: “किसान फसल विविधता और फसल चक्र को अपनाकर खेती करें। जल संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। कम पानी वाली और जलवायु अनुकूल फसलों का चयन भविष्य की खेती के लिए जरूरी है।”
जलवायु जोखिम कम करने के उपायों पर चर्चा
वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव खेती पर लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में किसानों को केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय अंतरफसल प्रणाली अपनानी चाहिए। इससे जोखिम कम होगा और आय के अतिरिक्त स्रोत भी विकसित होंगे।
कार्यक्रम में जलवायु अनुकूल किस्मों के चयन, फसल विविधीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने कहा कि वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने पर उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन भी बनाए रखा जा सकता है।
मृदा परीक्षण और संतुलित उर्वरक उपयोग पर विशेष बल
कार्यक्रम के दौरान किसानों को मृदा स्वास्थ्य के महत्व से भी अवगत कराया गया। वैज्ञानिकों ने कहा कि बिना मृदा परीक्षण के उर्वरकों का प्रयोग कई बार मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाता है और उत्पादन लागत बढ़ाता है।
किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर उर्वरकों के उपयोग की सलाह दी गई। साथ ही संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश के प्रयोग पर जोर दिया गया।
उर्वरकों के सही उपयोग की दी गई जानकारी
कार्यक्रम में श्री नवलेश कुमार ने किसानों को उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उर्वरकों का प्रयोग सही मात्रा, सही समय और सही विधि से किया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि असंतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता घटती है, उत्पादन लागत बढ़ती है और पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए किसानों को वैज्ञानिक सलाह के अनुरूप ही उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए।
नवलेश कुमार ने कहा: “संतुलित उर्वरक उपयोग से न केवल उत्पादन बढ़ता है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।”
जैविक खेती और दलहनी फसलों को बढ़ावा देने पर जोर
कार्यक्रम में किसानों को जैविक और प्राकृतिक खेती के विभिन्न विकल्पों के बारे में भी जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने कहा कि दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने से मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
किसानों को जैविक खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, मूंग, ढैंचा, लोबिया, सनई, जीवामृत, बीजामृत और घनजीवामृत के उपयोग के बारे में विस्तार से बताया गया। इन तकनीकों से मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ती है और दीर्घकालिक उत्पादकता में सुधार होता है।
किसान क्रेडिट कार्ड योजना का लाभ लेने की सलाह
कार्यक्रम में किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना की जानकारी भी दी गई। विशेषज्ञों ने कहा कि किसान इस योजना का लाभ लेकर कृषि कार्यों के लिए समय पर वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं। इससे खेती की लागत का बेहतर प्रबंधन संभव हो सकेगा।
प्रगतिशील किसानों की रही सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम में क्षेत्र के कई प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया। उपस्थित किसानों में ब्रजकिशोर महतो, अनिल कुमार, पवन कुमार सिंह, वीरेंद्र सिंह, कुन्दन कुमार सिंह, सोनी देवी और ललिता देवी सहित अन्य किसान शामिल थे। किसानों ने कृषि वैज्ञानिकों से विभिन्न विषयों पर प्रश्न पूछे और खेती से जुड़े अनुभव साझा किए।

न्यूज़ देखो: बदलती खेती के लिए बदलती सोच जरूरी
खेती आज केवल परंपरा नहीं बल्कि विज्ञान और संसाधन प्रबंधन का विषय बन चुकी है। गढ़वा में आयोजित यह कार्यक्रम किसानों को भविष्य की चुनौतियों के प्रति तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य और जैविक खेती जैसे विषय आने वाले समय में कृषि की रीढ़ साबित होंगे। यदि किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुरूप खेती करें तो उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी संभव होगा। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
खेतों को बचाना है तो नई तकनीकों को अपनाना होगा
खेती केवल आज की जरूरत नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी जिम्मेदारी है।
जल संरक्षण, स्वस्थ मिट्टी और वैज्ञानिक खेती से ही किसानों का भविष्य सुरक्षित बन सकता है।
प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग ही कृषि को स्थायी और लाभकारी बनाएगा।
अपने गांव और आसपास के किसानों को भी आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी दें।
स्वस्थ मिट्टी, समृद्ध किसान और सुरक्षित भविष्य के इस संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। अपनी राय कमेंट में साझा करें, खबर को आगे बढ़ाएं और टिकाऊ खेती के इस अभियान का हिस्सा बनें।

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