#सिमडेगा #शैक्षणिक_कार्यक्रम : खड़िया जनजाति की संस्कृति पर केंद्रित व्याख्यान का सफल आयोजन।
सिमडेगा में फादर कामिल बुल्के मासिक व्याख्यान श्रृंखला के तहत हिंदी विभाग द्वारा एक शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस सत्र में खड़िया जनजाति के जीवन, संस्कृति और परंपराओं पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाते हुए विभिन्न विषयों पर प्रस्तुति दी। आयोजन ने जनजातीय अध्ययन के प्रति जागरूकता और अकादमिक रुचि को बढ़ावा दिया।
- फादर कामिल बुल्के व्याख्यान श्रृंखला के तहत कार्यक्रम आयोजित।
- विषय खड़िया जनजाति, संस्कृति और परंपराओं पर चर्चा।
- अंजली कुजूर, सोफिया किंडो, सुरभि बा ने दी प्रस्तुतियां।
- डॉ. जयंत कुमार कश्यप ने स्वागत भाषण दिया।
- डॉ. फादर रोमन बा ने प्रेरणादायक संदेश साझा किया।
सिमडेगा में आयोजित फादर कामिल बुल्के मासिक व्याख्यान की श्रृंखला के अंतर्गत हिंदी विभाग द्वारा एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम सेमिनार हॉल में सुबह 10 बजे आयोजित हुआ, जिसमें विद्यार्थियों और शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का विषय “खड़िया जनजाति” रखा गया, जिसके माध्यम से जनजातीय जीवन, संस्कृति और परंपराओं को समझने का अवसर मिला।
कार्यक्रम की शुरुआत और संचालन
कार्यक्रम की शुरुआत स्वागत भाषण से हुई, जिसे डॉ. जयंत कुमार कश्यप ने प्रस्तुत किया। उन्होंने सभी अतिथियों और विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन कविता तिर्की द्वारा किया गया, जिन्होंने पूरे कार्यक्रम को सुव्यवस्थित और रोचक ढंग से प्रस्तुत किया।
मुख्य वक्ता का प्रेरणादायक संदेश
कार्यक्रम में डॉ. फादर रोमन बा ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार साझा किए। उन्होंने खड़िया जनजाति की विशेषताओं, उनकी जीवन शैली और सांस्कृतिक मूल्यों पर प्रकाश डाला।
डॉ. फादर रोमन बा ने कहा: “खड़िया जनजाति की संस्कृति हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य और सामूहिक जीवन की सीख देती है, जिसे समझना और संरक्षित करना जरूरी है।”
उनका संदेश विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक रहा।
विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
अंजली कुजूर ने “खड़िया जनजाति: जीवन, संस्कृति और परंपराएं” विषय पर विस्तृत जानकारी दी।
सोफिया किंडो ने खड़िया जनजाति में विवाह की परंपराओं पर प्रकाश डाला।
सुरभि बा ने “खड़िया जनजाति के अंतिम संस्कार” विषय पर अपनी प्रस्तुति दी।
प्रत्येक प्रस्तुति के बाद प्रश्नोत्तरी सत्र का आयोजन किया गया, जिससे विषय की समझ और भी गहरी हुई और विद्यार्थियों को अपनी जिज्ञासाओं का समाधान मिला।
शिक्षकों की उपस्थिति और मार्गदर्शन
इस कार्यक्रम में हिंदी विभाग की प्राध्यापक प्रतिमा परधिया सहित अन्य प्राध्यापकगण भी उपस्थित रहे। उन्होंने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हुए कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षीय भाषण स. प्र. सीमा खेस द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने जनजातीय अध्ययन के महत्व को रेखांकित किया।
कार्यक्रम का समापन
अंत में मुक्ति टोप्पो ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और सभी प्रतिभागियों एवं उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया।
इस पूरे आयोजन ने न केवल विद्यार्थियों को जनजातीय संस्कृति के प्रति जागरूक किया, बल्कि उन्हें अपनी जड़ों और परंपराओं को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान किया।
न्यूज़ देखो: जनजातीय संस्कृति को समझने की पहल सराहनीय
इस तरह के शैक्षणिक कार्यक्रम समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं। खड़िया जनजाति जैसे समुदायों की परंपराओं और जीवनशैली को समझना आज के समय में बेहद जरूरी है। शिक्षा संस्थानों द्वारा इस प्रकार की पहल न केवल ज्ञान बढ़ाती है, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाती है। क्या ऐसे कार्यक्रमों को और व्यापक स्तर पर ले जाने की जरूरत है? हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
संस्कृति को जानें, विरासत को बचाएं
हमारी विविधता ही हमारी असली ताकत है। जनजातीय संस्कृति और परंपराएं हमारे समाज की अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें समझना और सहेजना हम सभी की जिम्मेदारी है।
ऐसे कार्यक्रमों से सीख लेकर हम अपने आसपास की सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक बन सकते हैं।
अपनी राय जरूर साझा करें, इस खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं और अपनी संस्कृति के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाएं।

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