#कर्रा #आदिवासी_संस्कृति : धुमकुड़िया भवन निर्माण से परंपरा और सामाजिक पहचान को मिलेगा संरक्षण।
कर्रा प्रखंड के लिमड़ा पंचायत अंतर्गत सोटेया, कोनहप्पा एवं चान्हो गांव में धुमकुड़िया भवन निर्माण कार्य का विधिवत शिलान्यास किया गया। कार्यक्रम में विधायक सुदीप गुड़िया ने कहा कि धुमकुड़िया आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और पारंपरिक मूल्यों का महत्वपूर्ण केंद्र है। उन्होंने नई पीढ़ी को मातृभाषा और संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अतिथियों का स्वागत करते हुए इस पहल का स्वागत किया।
- सोटेया, कोनहप्पा और चान्हो गांव में धुमकुड़िया भवन निर्माण का शिलान्यास।
- विधायक सुदीप गुड़िया ने आदिवासी संस्कृति संरक्षण पर दिया जोर।
- धुमकुड़िया को बताया सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र।
- नई पीढ़ी को मातृभाषा और परंपराओं से जोड़ने की बात कही गई।
- ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अतिथियों का स्वागत किया।
- कार्यक्रम में पंचायत प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में ग्रामीण रहे मौजूद।
कर्रा प्रखंड अंतर्गत लिमड़ा पंचायत के ग्राम सोटेया, कोनहप्पा एवं चान्हो में आज धुमकुड़िया भवन निर्माण कार्य का विधिवत शिलान्यास किया गया। यह पहल आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक पहचान और पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण, पंचायत प्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुआ कार्यक्रम
शिलान्यास कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों और बुजुर्गों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अतिथियों का स्वागत किया। आदिवासी संस्कृति की झलक कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से देखने को मिली।
गांव के लोगों ने इस पहल को समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला कदम बताया। कार्यक्रम के दौरान लोगों में उत्साह और खुशी का माहौल देखा गया।
विधायक सुदीप गुड़िया को ग्रामीणों का स्नेह, विश्वास एवं आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ।
धुमकुड़िया को बताया सांस्कृतिक चेतना का केंद्र
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक सुदीप गुड़िया ने कहा कि धुमकुड़िया केवल एक भवन नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और पारंपरिक मूल्यों का जीवंत केंद्र है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की सभ्यता और परंपराएं सदियों से सामुदायिक जीवन, भाईचारा और सामाजिक संस्कारों का संदेश देती रही हैं।
विधायक सुदीप गुड़िया ने कहा: “धुमकुड़िया हमारी लोक परंपराओं, नृत्य-संगीत, रीति-रिवाजों एवं सामाजिक शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।”
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करना बेहद जरूरी हो गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रह सकें।
नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने की पहल
विधायक श्री गुड़िया ने कहा कि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, संस्कृति और पारंपरिक मूल्यों से दूर न हो, इसके लिए धुमकुड़िया भवनों का निर्माण किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में पारंपरिक पहचान को बचाए रखना समाज की बड़ी जिम्मेदारी है। धुमकुड़िया भवन युवाओं को अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज और सामुदायिक मूल्यों को समझने का अवसर प्रदान करेंगे।
विधायक सुदीप गुड़िया ने कहा: “नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, संस्कृति और पारंपरिक मूल्यों से जुड़ी रहे, इसी संकल्प के साथ इन भवनों के निर्माण की पहल की गई है।”
उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्र के समग्र विकास के साथ-साथ आदिवासी अस्मिता और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
जल, जंगल और जमीन से जुड़ी परंपराओं पर जोर
कार्यक्रम के दौरान विधायक ने जल, जंगल और जमीन से जुड़े आदिवासी समाज के पारंपरिक संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी सभ्यता प्रकृति के साथ संतुलन और सामुदायिक जीवन की सीख देती है।
उन्होंने कहा कि समाज की लोक परंपराएं, सामूहिक नृत्य, लोकगीत और सामाजिक शिक्षा धुमकुड़िया व्यवस्था के माध्यम से पीढ़ियों तक संरक्षित रही हैं। इसलिए इन सांस्कृतिक केंद्रों को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
ग्रामीणों ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इससे गांवों में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और युवाओं को अपनी पहचान समझने का अवसर मिलेगा।
बड़ी संख्या में ग्रामीण रहे मौजूद
शिलान्यास कार्यक्रम में पंचायत प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भागीदारी रही। लोगों ने इस पहल को आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक कदम बताया।
ग्रामीणों ने कहा कि धुमकुड़िया भवन केवल सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र नहीं होंगे, बल्कि समाज में एकता, परंपरा और सामुदायिक सहयोग की भावना को भी मजबूत करेंगे।
कार्यक्रम के दौरान गांव के बुजुर्गों ने भी अपनी पारंपरिक संस्कृति और रीति-रिवाजों को बचाने की जरूरत पर जोर दिया।
न्यूज़ देखो: संस्कृति संरक्षण के लिए जमीनी पहल जरूरी
कर्रा क्षेत्र में धुमकुड़िया भवन निर्माण की यह पहल केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने का प्रयास भी है। तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में पारंपरिक मूल्यों और लोक संस्कृति को संरक्षित करना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में गांव स्तर पर सांस्कृतिक केंद्रों का निर्माण युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकता है। अब जरूरत इस बात की है कि इन केंद्रों को सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से लगातार सक्रिय रखा जाए ताकि परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सकें। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी
किसी भी समाज की असली पहचान उसकी संस्कृति, भाषा और परंपराओं से होती है। जब नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है, तभी समाज मजबूत और संगठित बनता है। गांवों में सांस्कृतिक केंद्रों का निर्माण केवल विकास नहीं, बल्कि अपनी विरासत को बचाने की दिशा में बड़ा कदम है। हमें अपनी लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए मिलकर प्रयास करना चाहिए।

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