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महुआडांड़: मृत सहायक अध्यापक के परिजनों को संघ ने दी 10,000 की सहायता, पारा शिक्षकों की बदहाली पर उठाए सवाल

#महुआडांड़ – सहायक अध्यापक संघ ने स्व. दिलीप कुजूर के परिजनों को दी सहयोग राशि, राज्य सरकार से संवेदनशील रवैया अपनाने की अपील

  • महुआडांड़ में मृत शिक्षक के परिजनों को दी गई आर्थिक मदद
  • झारखंड के पारा शिक्षकों को नहीं मिल रही समान वेतन और सुविधाएं
  • सरकार पर अनदेखी का आरोप, अनुकंपा और मृत्यु लाभ से वंचित शिक्षक
  • सहायक अध्यापक संघ ने शिक्षा विभाग से की मानवीय अपील
  • दर्जनों शिक्षकों की मौजूदगी में दिया गया सहयोग

10,000 की सहयोग राशि देकर शिक्षक की स्मृति को किया सम्मानित

महुआडांड़ अनुमंडल क्षेत्र में गुरुवार को सहायक अध्यापक संघ महुआडांड़ की ओर से स्व. दिलीप कुजूर (उ.म. विद्यालय कुरूद) के परिजनों को 10,000 रुपये की सहयोग राशि प्रदान की गई। संघ के सदस्यों ने इसे शोकाकुल परिवार की मदद और साथी शिक्षक के योगदान का सम्मान बताया।

पारा शिक्षकों की दशा पर जताई चिंता, सरकार से मांगी न्यायपूर्ण नीति

मौके पर उपस्थित सहायक अध्यापक संघ के सदस्यों ने झारखंड सरकार पर आरोप लगाया कि प्रदेश के 60 हजार से अधिक पारा शिक्षक पिछले 20 वर्षों से सरकारी विद्यालयों में कार्यरत हैं, फिर भी उन्हें न तो समान कार्य के लिए समान वेतन मिल रहा है, न ही मृत्यु अथवा अनुकंपा का कोई लाभ दिया जा रहा है।

“सरकार यदि शिक्षक हितों पर ध्यान नहीं देगी, तो ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था चरमरा जाएगी। हम सिर्फ सम्मान और न्यूनतम अधिकार की अपेक्षा रखते हैं।”
सुभाष कुमार, प्रखंड अध्यक्ष

शिक्षकों की मजबूत एकजुटता दिखी कार्यक्रम में

कार्यक्रम में दर्जनों शिक्षक-शिक्षिकाएं उपस्थित रहे जिनमें प्रमुख नाम थे:
सुभाष कुमार (प्रखंड अध्यक्ष), निर्मल उरांव (सचिव), विजय तिर्की (महामंत्री), हसन राजा अली (मीडिया प्रभारी), विजय वाड़ा, सुनील उरांव, रेणुका कुजूर, निल कुसुम, फिरतु बड़ाइक, मिलकू मांझी आदि। सभी ने एकजुट होकर कहा कि जब तक सरकार नीति में बदलाव नहीं करती, तब तक उनकी आवाज जारी रहेगी।

न्यूज़ देखो : शिक्षक सम्मान और अधिकार की लड़ाई में साथ

न्यूज़ देखो पारा शिक्षकों के संघर्ष और उनकी मानवता आधारित मांगों की आवाज को मंच देने के लिए कृतसंकल्पित है। शिक्षा व्यवस्था की नींव इन्हीं शिक्षकों के परिश्रम पर टिकी है, और उनके साथ न्याय होना बेहद जरूरी है।

समाज के सच्चे निर्माताओं के साथ खड़े होकर ही हम समृद्ध भारत की कल्पना कर सकते हैं।

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