हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: पूर्व एसपी अमरजीत बलिहार हत्याकांड में दो माओवादियों की फांसी की सजा बदली, अब उम्रकैद

हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: पूर्व एसपी अमरजीत बलिहार हत्याकांड में दो माओवादियों की फांसी की सजा बदली, अब उम्रकैद

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#रांची #न्यायालय_निर्णय : दो जजों के भिन्न मत के कारण मौत की सजा पर लगी रोक, हाई कोर्ट ने सजा को आजीवन कारावास में बदला
  • झारखंड हाई कोर्ट ने दो माओवादियों की फांसी की सजा घटाकर उम्रकैद की।
  • फैसला जस्टिस गौतम कुमार चौधरी की अदालत ने सुनाया।
  • खंडपीठ के दो जजों के अलग-अलग निर्णय को आधार बनाया गया।
  • मामला पूर्व पाकुड़ एसपी अमरजीत बलिहार और छह पुलिसकर्मियों की हत्या से जुड़ा।
  • दोषियों में सुखलाल उर्फ प्रवीर मुर्मू और सनातन बास्की उर्फ ताला शामिल।

रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने पूर्व पाकुड़ एसपी अमरजीत बलिहार और छह पुलिसकर्मियों की हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट के जस्टिस गौतम कुमार चौधरी की एकल पीठ ने इस बहुचर्चित नक्सली हमले में दोषी करार दो माओवादियों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। अदालत ने कहा कि जब खंडपीठ (डिवीजन बेंच) में बैठे दो जजों की राय अलग-अलग हो, तो मौत की सजा को बरकरार रखना न्यायिक रूप से संभव नहीं है—भले ही अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो।

खंडपीठ में दो अलग फैसले—फांसी बरकरार रखना संभव नहीं

इस मामले में इससे पहले हाई कोर्ट की खंडपीठ ने विरोधाभासी निर्णय दिया था।

  • जस्टिस आर. मुखोपाध्याय ने अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था।
  • वहीं जस्टिस संजय प्रसाद ने उन्हें दोषी मानते हुए मौत की सजा उचित बताई थी।

इन दोनों जजों की राय भिन्न होने के कारण मामला एकल पीठ को भेजा गया था। जस्टिस गौतम कुमार चौधरी ने सुनवाई के बाद कहा कि ऐसे मामलों में सर्वोच्च सिद्धांत यही है कि सबसे हल्की सजा को अपनाया जाए।

दुमका की निचली अदालत ने सुनाई थी फांसी

इस हत्याकांड में दुमका की निचली अदालत ने माओवादी सुखलाल उर्फ प्रवीर मुर्मू और सनातन बास्की उर्फ ताला को फांसी की सजा सुनाई थी। इन्हें एसपी अमरजीत बलिहार और छह पुलिसकर्मियों की हत्या का मुख्य आरोपी माना गया था। इस नक्सली हमले ने पूरे राज्य को हिला दिया था।

मामला क्यों है महत्वपूर्ण?

यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह झारखंड के सबसे गंभीर नक्सली हमलों में से एक से जुड़ा है। साथ ही हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में यदि उच्च स्तरीय मतभेद हो तो मौत की सजा को अंतिम उपाय के रूप में नहीं माना जा सकता।

न्यूज़ देखो: न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़ा संकेत

यह फैसला बताता है कि कानून में मौत की सजा केवल उन मामलों में दी जा सकती है जहाँ न्यायिक निष्कर्ष स्पष्ट और निर्विवाद हों। उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह निर्णय न्यायव्यवस्था की प्रक्रिया, संतुलन और सावधानी को दर्शाता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

न्याय और व्यवस्था पर आपकी राय क्या है?

क्या मौत की सजा पर पुनर्विचार होना चाहिए? क्या ऐसे मामलों में न्यायिक मतभेद के कारण सजा कम करना उचित है? अपनी राय टिप्पणी में लिखें। खबर को साझा करें और न्याय पर जागरूक चर्चा का हिस्सा बनें।

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