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Editorial

नगर निकाय चुनाव में प्रत्याशी ही नहीं, मतदाता भी असमंजस में; रिश्तों, जाति, काम और पैसों के बीच उलझा लोकतंत्र

#नगरनिगम #चुनावीमाहौल : प्रत्याशियों की भीड़ से मतदाता दिग्भ्रमित और सामाजिक समीकरणों में उलझे।

नगर निकाय चुनाव में इस बार मुकाबला बहुकोणीय होता नजर आ रहा है, जिससे प्रत्याशियों के साथ मतदाता भी असमंजस की स्थिति में हैं। परिचित चेहरों और व्यक्तिगत रिश्तों के कारण जनता के लिए निर्णय लेना आसान नहीं रह गया है। जातिगत समीकरण, पुराने संबंध, विकास कार्य और धनबल—सभी कारक मतदान को प्रभावित कर रहे हैं। चुनावी सरगर्मी के बीच सामाजिक संबंधों और लोकतांत्रिक शालीनता की भी परीक्षा हो रही है।

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  • बहुकोणीय मुकाबले से मतदाता असमंजस में।
  • रिश्ते, जाति, काम और धन—सब बन रहे निर्णायक कारक।
  • घर-घर संपर्क से गृहणियों की दिनचर्या प्रभावित।
  • चुनावी प्रतीकों और प्रचार शैली से बढ़ी दिलचस्पी।
  • सोशल मीडिया पर तीखापन, आमने-सामने शालीनता बरकरार।

इस बार के नगर निकाय चुनाव में सिर्फ प्रत्याशी ही नहीं, मतदाता भी बेहाल हैं। जहां प्रत्याशियों की भीड़ के कारण सभी को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है, वहीं जनता भी दिग्भ्रमित है कि किसको वोट करे, किसको नहीं। सभी चेहरे अपने हैं, परिचित हैं, इसलिए जनता किसी से अपने व्यक्तिगत रिश्ते खराब भी नहीं करना चाहती। मुकाबला कभी त्रिकोणीय, कभी चतुष्कोणीय होता दिखाई दे रहा है। ऐसे में जनता यह निर्णय नहीं कर पा रही कि तीनों में सबसे बेहतर कौन, या चारों में सबसे बेहतर कौन? कुछ वोट पुराने संबंधों पर पड़ेंगे, कुछ संबंधों में आई कटुता की भेंट चढ़ेंगे। अपने कार्यकाल में पदासीन जनप्रतिनिधियों ने जिन्हें लाभ पहुंचाया या जिसका सम्मान रखा, उन्हें अवश्य जनता पहली पसंद बनाएगी। वहीं पद के मद में चूर और मिलने में काफी मशक्कत करने वालों को जनता बाहर का रास्ता दिखाएगी।

वोटों का गणित: रिश्ते, जाति और काम

कुछ वोट जातिगत आधार पर बंटेंगे, कुछ काम पर और कुछ पैसों पर। एक खास तबका चुनाव एकदम नजदीक आते पैसों के लेनदेन पर अपने वोटों का सौदा करते दिखेगा, तो कुछ तटस्थ लोग अभी से लेकर मतदान के दिन तक अपने पसंदीदा प्रत्याशी का पक्ष लेते दिखेंगे। लोकतंत्र का यह रंग भी दिलचस्प है और चिंताजनक भी—जहां विचार, विकास और व्यक्तिगत समीकरण साथ-साथ चल रहे हैं।

मतदाता भी ‘डिस्टर्ब’ हैं

मुश्किलें और थकान सिर्फ प्रत्याशियों के जिम्मे नहीं हैं। एक पड़ोसी महिला ने कहा:

“हमसब भी डिस्टर्ब हैं, दैनिक रूटीन काफी उथल-पुथल भरा हो गया है। कभी वार्ड प्रत्याशी आ रहे हैं तो कभी मेयर प्रत्याशी! दिनभर अपना घर और खुद को मेंटेन रखना पड़ रहा है, पता नहीं कब कौन टपक जाए।”

कुछ उम्मीदवार आंख खुलते ही, दतवन या ब्रश करती जनता के घर पहुंच जा रहे हैं, तो कुछ चाय की चुस्कियों पर चर्चा करने। कुल मिलाकर गृहणियों की जिम्मेदारी काफी बढ़ गई है। लेकिन फिर भी वे उत्साहित हैं क्योंकि ज्यादातर उनके बीच की बहन, बेटियां या बहुएं चुनाव मैदान में हैं।

चुनावी हास्य और प्रतीकों की जंग

एक हास्यास्पद स्थिति यह भी है कि किसी को अगर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम कर दीजिए तो वह पूछ बैठता है, “आप भी उठे हैं का अबरी?”

बड़े ही दिलचस्प अंदाज में चुनाव का दिन नजदीक आता जा रहा है। सभी अपनी-अपनी स्टाइल में जनता को रिझाने में लगे हैं। कहीं बेंच पर साथ बैठने की बातें हो रही हैं, कहीं बिस्किट खाने को प्रेरित किया जा रहा है, कहीं एसी को निरंतर विकास का प्रतीक बताया जा रहा है। कहीं लोग बाल्टी, कहीं ब्रीफकेस, कहीं चूड़ियां, कहीं टॉर्च, कहीं कैमरा, कहीं बक्सा तो कहीं छड़ी दिखाई जा रही है।

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जनता अपनाए तो भला किसे अपनाए? बहुत ही पशोपेश में पड़ी आम जनता कभी फोन पर तो कभी आमने-सामने बैठकर चुनावी चर्चा में लगी है। फोन कॉल पर भी प्रणाम पाती के बाद अगला सवाल यही है—“कौन निकल रहा है इस बार?” या “आपके वार्ड से किसका पलड़ा भारी है?”

लोकतांत्रिक शालीनता की मिसाल

इस महामुकाबले का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि चुनाव मैदान में भले ही लोग एक-दूसरे के विपक्षी हैं, मीडिया या सोशल साइट्स पर भले ही एक-दूसरे की बखिया उधेड़ रहे हों, लेकिन सामने मिलने पर एक-दूसरे को नमस्कार, प्रणाम या गले मिलकर अभिवादन कर रहे हैं।

यही लोकतंत्र की असली ताकत है—मतभेद के बावजूद संवाद और सम्मान। यही कामना रहेगी लोकतंत्र के इस महापर्व में—मतभेद भले ही हो, मनभेद न होने पाए। यही कोशिश कीजिए तमाम प्रत्याशी। और जीतकर भी जनता के उतने ही करीब रहिए जितना आज हैं।

न्यूज़ देखो: मतदाता की दुविधा ही असली चुनावी कहानी

यह चुनाव केवल प्रत्याशियों की रणनीति का नहीं, बल्कि मतदाता की मन:स्थिति का भी आईना है। रिश्तों, जातीय समीकरणों और विकास के दावों के बीच मतदाता का संतुलन साधना आसान नहीं है। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि प्रतिस्पर्धा के बावजूद सामाजिक ताना-बाना न टूटे। अब देखना यह है कि जनता भावनाओं से ऊपर उठकर किसे अपनी प्राथमिकता देती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सजग मतदाता, मजबूत लोकतंत्र

लोकतंत्र की असली ताकत आपका वोट है। रिश्तों का सम्मान करें, लेकिन निर्णय विवेक से लें। विकास, जवाबदेही और उपलब्धता—इन तीन कसौटियों पर अपने प्रत्याशी को परखें।

चुनाव बीत जाएंगे, लेकिन शहर और समाज हमारे साथ ही रहेंगे। इसलिए मतभेद को मनभेद न बनने दें।
अपनी राय जरूर रखें, चर्चा करें, और सोच-समझकर मतदान करें।
अगर आपको यह विश्लेषण सार्थक लगा, तो इसे साझा करें और लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत बनाएं।

Guest Author
शर्मिला वर्मा

शर्मिला वर्मा

मेदिनीनगर, पलामू

शर्मिला वर्मा, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता: वरदान चेरिटेबल ट्रस्ट मेदिनीनगर से जुड़कर सामाजिक जागरूकता के लिए लगातार कार्यरत हैं।

यह आलेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है और NewsDekho के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

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