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नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स वॉटसन फादर ऑफ डी एन ए हैं: हृदयानंद मिश्रा

#विज्ञान #वैचारिक_विश्लेषण : डीएनए की ऐतिहासिक खोज से लेकर अवैज्ञानिक सामाजिक विचारों तक जेम्स वॉटसन का विरोधाभासी जीवन
  • प्रधानमंत्री से लेकर देश के अधिकांश नेता अपने भाषण में डी एन ए की बातें करते हैं, लेकिन बड़ी संख्या को इसकी बुनियादी जानकारी भी नहीं।
  • नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स वॉटसन को फादर ऑफ डीएनए कहा जाता है, जिन्होंने जीव विज्ञान में नायाब खोज की।
  • डीऑक्सी रायबोन्यूक्लिक एसिड (डीएनए) की खोज 1869 में फ्रेडरिक मीशर ने की थी।
  • 1953 में जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने डीएनए की डबल हेलिक्स संरचना की खोज की।
  • बाद के वर्षों में वॉटसन के सामाजिक और नस्लीय विचार उन्हें बदनामी और अलगाव की ओर ले गए।
  • 8 नवंबर को 97 वर्ष की आयु में जेम्स वॉटसन का निधन हुआ।

आजकल प्रधानमंत्री से लेकर देश के अधिकांश नेतागण अपने भाषण में धड़ल्ले से डी एन ए की बातें करते हैं लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उनमें से पच्चास प्रतिशत को डी न ए की जानकारी की बात तो दूर उसका फुलफॉर्म भी पता नहीं होगा। महान् वैज्ञानिक नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स वॉटसन फादर ऑफ डीएनए नाम से भी जाने जाते हैं। जीव विज्ञान में नायाब खोज की, खूब नाम कमाया, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए, बाद में बदनाम हो गए।

हालांकि डीऑक्सी रायबोन्यूक्लिक एसिड (डीएनए) की खोज फ्रेडरिक मीशर ने 1869 में की थी। इसके बाद 1953 में जेम्स वॉटसन ने फ्रांसीसी वैज्ञानिक फ्रांसिस क्रिक के साथ मिलकर डीएनए की डबल हेलिक्स संरचना की खोज की। यह 20वीं सदी की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खोजों में से एक था। इस दोहरी कुंडली संरचना के खुलासे के साथ ही चिकित्सा विज्ञान में नई क्रांति आ गई। जीव विज्ञान के क्षेत्र में कई अनुसंधानों को बढ़ावा मिला।

वैज्ञानिकों के लिए यह समझने का रास्ता खुल गया कि आनुवंशिकता का आणविक आधार क्या है और कोशिकाओं में प्रोटीन का संश्लेषण कैसे होता है। दिलचस्प बात है कि जब डीएनए संरचना संबंधी वॉटसन और क्रिक का शोध पत्र प्रकाशित हुआ था, तब वॉटसन मात्र 25 वर्ष के थे।

बाद की उम्र में उनके सामाजिक विचार अवैज्ञानिक रहे। बताते हैं कि वॉटसन बहुत बड़बोले थे। वर्ण और लिंगभेद पर उनके विचार असामाजिक थे। महिलाओं की क्षमताओं पर काफी नकारात्मक विचार रखते थे। 2001 में वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले) में एक व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने त्वचा के रंग को यौन इच्छा से जोड़ दिया और कहा था कि दुबले लोग ज्यादा महत्वाकांक्षी होते हैं।

इसी तरह 2007 में उन्होंने दावा किया था कि अश्वेत लोग श्वेत लोगों की तुलना में कम बुद्धिमान होते हैं। उन्होंने यहूदी विरोध को भी जायज ठहराया। वह अफ्रीका वासियों के धुर विरोधी बन गए। उन्होंने कहा कि वह अफ्रीका के भविष्य को लेकर निराश हैं, क्योंकि हमारी सारी नीतियां यह मानकर बनी हैं कि अफ्रीकी लोगों की बुद्धि हमारे जैसी ही है, जबकि सभी टेस्ट कुछ और बताते हैं।

इस बयान के बाद उन्हें न्यूयॉर्क की कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लैब में चांसलर के पद से हटा दिया गया। 2019 में उन्होंने फिर से ऐसा ही बयान दिया—कहा कि नस्ल और बुद्धि के बीच संबंध हैं। इस बयान के बाद उनसे चांसलर एमेरिटस, प्रोफेसर एमेरिटस और मानद ट्रस्टी समेत सभी उपाधियां छीन ली गईं। लैब ने कहा, डॉ. वॉटसन के बयानों का विज्ञान समर्थन नहीं करता।

इसके बाद वॉटसन अलग-थलग पड़ गए। उन्होंने 2014 में अपना नोबेल पुरस्कार का गोल्ड मेडल नीलाम कर दिया। वॉटसन की खोज की कद्र करने वाले एक रूसी व्यक्ति ने यह पदक 4.8 मिलियन डॉलर में खरीदा और तुरंत वॉटसन को वापस दे दिया। पिछले सप्ताह आठ नवंबर को 97 साल के जेम्स वॉटसन का निधन हो गया। जीवन के लंबे कालखंड में वह अकेले हो गए। वॉटसन की ख्याति के कारण उनकी गलत सोच समाज के वैज्ञानिक विचारों को आघात पहुंचाती रही।

ऐसे ही वैचारिक दिवालिएपन के शिकार रूस के प्लेखानो के लिए लेनिन ने कहा था—समय पर मर जाना भी कितना अच्छा होता है।

Guest Author:
हृदयानंद मिश्र
एडवोकेट एवं वैचारिक विश्लेषक

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