पिंगलवाड़ा के संत भगत पूर्णसिंह की जयंती पर मानव सेवा और करुणा के अद्वितीय जीवन को नमन

पिंगलवाड़ा के संत भगत पूर्णसिंह की जयंती पर मानव सेवा और करुणा के अद्वितीय जीवन को नमन

author News देखो Team
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#पंजाब #मानव_सेवा : भगत पूर्णसिंह का जीवन करुणा और समर्पण की मिसाल बना।

पिंगलवाड़ा धमार्थ संस्थान के संस्थापक भगत पूर्णसिंह की जयंती पर उनके असाधारण सेवा कार्यों को याद किया जा रहा है। उन्होंने अपना पूरा जीवन अनाथों, अपाहिजों, वृद्धों और समाज के उपेक्षित लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया। मानवता, करुणा और निस्वार्थ सेवा के उनके आदर्श आज भी लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। पिंगलवाड़ा संस्था उनके जीवन दर्शन और सामाजिक समर्पण की जीवंत पहचान बनी हुई है।

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  • 4 जून 1904 को लुधियाना के राजेवाल गांव में हुआ था भगत पूर्णसिंह का जन्म।
  • समाज के उपेक्षित, अनाथ, अपंग और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों की सेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य।
  • पिंगलवाड़ा संस्थान की स्थापना कर हजारों जरूरतमंदों को दिया आश्रय और सम्मानपूर्ण जीवन।
  • 1981 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित हुए, बाद में सम्मान लौटा दिया।
  • पर्यावरण संरक्षण, सादगी और मानवीय मूल्यों के प्रबल समर्थक थे भगत पूर्णसिंह।
  • 5 अगस्त 1992 को निधन के बाद भी उनकी सेवा की विरासत समाज को प्रेरित कर रही है।

मानव सेवा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं से परे जाकर प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं। पिंगलवाड़ा धमार्थ संस्थान के संस्थापक भगत पूर्णसिंह ऐसा ही एक नाम हैं। 4 जून को उनकी जयंती के अवसर पर देशभर में उनके जीवन, सेवा कार्यों और मानवीय मूल्यों को याद किया जाता है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन उन लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया जिन्हें समाज अक्सर उपेक्षित कर देता है।

उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची महानता पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति में नहीं, बल्कि दूसरों के दुख को अपना समझकर उनकी सहायता करने में निहित है।

कठिन परिस्थितियों में बीता बचपन

भगत पूर्णसिंह का जन्म 4 जून 1904 को पंजाब के लुधियाना जिले के राजेवाल गांव में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उनकी माता ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया।

आर्थिक अभावों के बावजूद उनकी माता ने उनमें सेवा, दया, करुणा और मानवता के संस्कार विकसित किए। यही संस्कार आगे चलकर उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बने और उन्होंने समाज सेवा को ही अपना जीवन लक्ष्य बना लिया।

गुरुद्वारा सेवा से शुरू हुआ मानवता का सफर

युवावस्था में भगत जी ने महसूस किया कि समाज में अनेक ऐसे लोग हैं जिन्हें केवल भोजन या आश्रय ही नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान की भी आवश्यकता है।

इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने लाहौर के गुरुद्वारा डेहरा साहब में सेवा कार्य शुरू किया। वहां वे बिना किसी स्वार्थ या वेतन के जरूरतमंद लोगों की सहायता करते थे। उनकी निस्वार्थ सेवा भावना ने लोगों को प्रभावित किया और वे धीरे-धीरे “भगत जी” के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

एक बालक की जिम्मेदारी ने बदल दी जीवन की दिशा

भगत पूर्णसिंह के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक वर्ष 1924 में हुई। एक चार वर्षीय गूंगे, बहरे और अपाहिज बालक को उसके अभिभावक गुरुद्वारे में छोड़ गए थे।

कोई भी संस्था उस बच्चे की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी। ऐसे समय में भगत जी ने स्वयं उस बच्चे को अपनाया और उसका नाम प्यारासिंह रखा। उन्होंने जीवनभर उसकी सेवा की।

यह घटना उनके सेवा जीवन की आधारशिला बनी और यहीं से उन्होंने समाज के असहाय लोगों को अपना परिवार मानने का संकल्प लिया।

विवाह का त्याग कर चुना सेवा का मार्ग

वर्ष 1932 में उन्होंने सिख धर्म को अपनाया और उनका नाम पूर्णसिंह हो गया। उन्होंने विवाह न करने का निर्णय लिया ताकि अपना पूरा जीवन समाज सेवा के लिए समर्पित कर सकें।

वे हर जरूरतमंद व्यक्ति को अपने परिवार का सदस्य मानते थे। चाहे कोई बीमार हो, अपंग हो, मानसिक रूप से अस्वस्थ हो या बेसहारा, वे उसकी सहायता के लिए हमेशा तैयार रहते थे।

विभाजन की त्रासदी से जन्मा पिंगलवाड़ा

भारत विभाजन के बाद लाखों लोग विस्थापित होकर पंजाब पहुंचे। शरणार्थी शिविरों में बड़ी संख्या में अनाथ, अपाहिज, बीमार और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग बेसहारा जीवन जी रहे थे।

जब शिविर बंद होने लगे तो इन लोगों के सामने रहने और खाने की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई। ऐसे समय में भगत पूर्णसिंह ने एक खाली भवन में उन्हें आश्रय देना शुरू किया।

यही प्रयास आगे चलकर पिंगलवाड़ा के रूप में विकसित हुआ। शुरुआत में वे स्वयं भीख मांगकर लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करते थे। धीरे-धीरे समाज का सहयोग मिलने लगा और संस्था का विस्तार होता गया।

आज भी मानवता की मिसाल है पिंगलवाड़ा

आज पिंगलवाड़ा केवल एक संस्था नहीं, बल्कि मानव सेवा का विशाल केंद्र बन चुका है। यहां अनाथ बच्चों, वृद्धों, मानसिक रोगियों, अपंगों और जरूरतमंद लोगों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिलता है।

यह संस्थान भगत पूर्णसिंह की सोच और सेवा भावना की जीवंत विरासत है, जो आज भी हजारों लोगों के जीवन में आशा का प्रकाश बनकर कार्य कर रहा है।

पर्यावरण संरक्षण और सादगी के समर्थक

भगत पूर्णसिंह केवल समाजसेवी ही नहीं थे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के भी मजबूत समर्थक थे। वे पैदल चलने को प्रोत्साहित करते थे और अनावश्यक वाहन उपयोग का विरोध करते थे।

वे स्वयं रिक्शा चलाकर सामान लाते थे तथा स्वच्छता को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते थे। उनका मानना था कि प्रकृति की रक्षा करना भी मानव सेवा का ही एक महत्वपूर्ण रूप है।

पद्मश्री सम्मान और उनका त्याग

मानवता की सेवा में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1981 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया।

हालांकि बाद में उन्होंने यह सम्मान लौटा दिया। उनके लिए सम्मान और पुरस्कार से अधिक महत्वपूर्ण सेवा और मानवता का धर्म था।

यह निर्णय उनके व्यक्तित्व की सादगी और सिद्धांतों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

अमर हो गई सेवा की विरासत

5 अगस्त 1992 को भगत पूर्णसिंह इस संसार से विदा हो गए, लेकिन उनके विचार और सेवा कार्य आज भी समाज को प्रेरित कर रहे हैं।

उनका जीवन यह साबित करता है कि एक व्यक्ति यदि संकल्प और करुणा के साथ कार्य करे तो वह हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

न्यूज़ देखो: सेवा ही सबसे बड़ा धर्म

भगत पूर्णसिंह का जीवन आधुनिक समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ता है। आज जब स्वार्थ और भौतिकता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, तब उनका जीवन निस्वार्थ सेवा और मानवता का आदर्श प्रस्तुत करता है। पिंगलवाड़ा जैसी संस्थाएं यह साबित करती हैं कि समाज की वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि कमजोर और जरूरतमंद लोगों के प्रति संवेदनशीलता से होती है। ऐसे व्यक्तित्वों को याद रखना और उनके आदर्शों को अपनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सेवा और संवेदना से ही बनेगा बेहतर समाज

हर व्यक्ति अपने स्तर पर किसी जरूरतमंद की सहायता कर सकता है। समाज को बदलने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि बड़े हृदय की जरूरत होती है।

भगत पूर्णसिंह का जीवन हमें सिखाता है कि करुणा, सहानुभूति और सेवा ही सच्चे मानव धर्म के आधार हैं।

आइए उनकी जयंती पर यह संकल्प लें कि हम अपने आसपास जरूरतमंद लोगों की सहायता करेंगे और मानवता के मूल्यों को आगे बढ़ाएंगे।

यदि आपको भी लगता है कि सेवा सबसे बड़ा धर्म है, तो अपनी राय कमेंट में साझा करें, इस प्रेरक कहानी को दूसरों तक पहुंचाएं और समाज में सकारात्मक बदलाव की इस सोच को मजबूत बनाएं।

Guest Author
वरुण कुमार

वरुण कुमार

बिष्टुपुर, जमशेदपुर

वरुण कुमार, कवि और लेखक: अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद जमशेदपुर के सदस्य हैं।

यह आलेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है और NewsDekho के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

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