Palamau

राजनीतिक शिष्टाचार या वैचारिक उलटफेर, हुसैनाबाद के जेपी चौक पर दिखा अनोखा दृश्य

#हुसैनाबाद #राजनीतिक_गतिविधि : भाजपा नेताओं द्वारा कांग्रेस मंत्री के स्वागत ने खड़े किए कई सवाल।

हुसैनाबाद के जेपी चौक पर बुधवार को एक ऐसा राजनीतिक दृश्य देखने को मिला, जिसने स्थानीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी। झारखंड सरकार के वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण किशोर का स्वागत भाजपा सांसद प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं ने किया। मकर संक्रांति के अवसर पर दंगवार मेला उद्घाटन के लिए पहुंचे मंत्री का कांग्रेस कार्यकर्ताओं की अनुपस्थिति में भाजपा नेताओं द्वारा अभिनंदन चर्चा का केंद्र बन गया। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक शिष्टाचार, रिश्तों और विचारधाराओं की सीमाओं पर सवाल खड़े कर दिए।

Join News देखो WhatsApp Channel
  • हुसैनाबाद जेपी चौक पर हुआ मंत्री राधाकृष्ण किशोर का स्वागत।
  • स्वागत करने वालों में भाजपा सांसद प्रतिनिधि और कार्यकर्ता शामिल।
  • कांग्रेस कार्यकर्ताओं की अनुपस्थिति रही चर्चा का विषय।
  • मकर संक्रांति पर दंगवार मेला उद्घाटन के लिए पहुंचे थे मंत्री।
  • रिश्तेदारी और राजनीतिक शिष्टाचार को लेकर जनचर्चा तेज।

हुसैनाबाद, पलामू के राजनीतिक परिदृश्य में बुधवार का दिन सामान्य नहीं रहा। जेपी चौक पर जो दृश्य सामने आया, उसने राजनीति के पारंपरिक खांचों को कुछ देर के लिए धुंधला कर दिया। झारखंड सरकार के वित्त मंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण किशोर का जिस गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ स्वागत किया गया, वह किसी औपचारिक सरकारी कार्यक्रम से अधिक एक पारिवारिक मिलन जैसा प्रतीत हुआ।

भाजपा नेताओं ने किया मंत्री का आत्मीय स्वागत

मंत्री राधाकृष्ण किशोर मकर संक्रांति के अवसर पर दंगवार में आयोजित मेले के उद्घाटन हेतु हुसैनाबाद पहुंचे थे। उनके आगमन पर भाजपा सांसद प्रतिनिधि अखिलेश मेहता, उदय विश्वकर्मा, विनय पासवान सहित कई भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने फूल-मालाओं के साथ उनका स्वागत किया। स्वागत का अंदाज इतना आत्मीय था कि देखने वालों को क्षणभर के लिए यह समझना मुश्किल हो गया कि यह आयोजन किस दल का है।

कांग्रेस की गैरमौजूदगी बनी चर्चा का केंद्र

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि स्वागत स्थल पर कांग्रेस का कोई भी स्थानीय कार्यकर्ता या पदाधिकारी नजर नहीं आया। आमतौर पर किसी वरिष्ठ मंत्री के आगमन पर पार्टी कार्यकर्ताओं की उपस्थिति स्वाभाविक मानी जाती है, लेकिन यहां तस्वीर ठीक उलट थी। विपक्षी दल के नेताओं की मौजूदगी और सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया।

राजनीति से ऊपर रिश्तों की चर्चा

घटना के बाद हुसैनाबाद के चौराहों, चाय की दुकानों और चौपालों पर चर्चा का बाजार गर्म हो गया। स्थानीय लोगों के बीच यह बात सामने आई कि इस आत्मीय स्वागत के पीछे राजनीतिक समीकरणों से अधिक पारिवारिक संबंध अहम भूमिका में रहे। जनचर्चा में यह तथ्य उभरकर आया कि भाजपा सांसद वी.डी. राम और वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के बीच जीजा–साले का रिश्ता है।

भारतीय सामाजिक परंपरा में रिश्तेदार का सम्मान स्वाभाविक माना जाता है, लेकिन जब यह सम्मान सार्वजनिक राजनीतिक मंच पर स्पष्ट रूप से दिखे, तो सवाल उठना लाज़िमी हो जाता है।

राजनीतिक संस्कार या वैचारिक भ्रम

हुसैनाबाद की इस घटना ने कई बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या यह राजनीतिक संस्कार का उदाहरण था, जहां दलगत भेद से ऊपर उठकर अतिथि का सम्मान किया गया?
या फिर यह केवल सामाजिक शिष्टाचार था, जिसे राजनीति का रंग दे दिया गया?
अथवा यह संकेत है कि आज की राजनीति में विचारधाराओं से अधिक रिश्तों की अहमियत बढ़ती जा रही है?

स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन सार्वजनिक मंच पर इस तरह की तस्वीरें वैचारिक स्पष्टता को कमजोर करती हैं।

विचारधारा बनाम व्यवहार की बहस

राजनीति के विद्यार्थियों और जागरूक नागरिकों के लिए यह दृश्य कई संदेश छोड़ गया। निजी संबंध और सामाजिक व्यवहार अपनी जगह अहम हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में जब नीति की जगह रीति और सिद्धांतों की जगह संबंध लेने लगें, तो राजनीति का मूल स्वरूप प्रभावित होता है। यह घटना इस बात का उदाहरण बन गई कि आज की राजनीति में “कौन किस दल का है” से ज्यादा अहम सवाल यह हो गया है कि “कौन किसका कौन लगता है”।

जनता के बीच मिली-जुली प्रतिक्रिया

कुछ लोगों ने इस स्वागत को राजनीतिक परिपक्वता और सौहार्द का प्रतीक बताया, वहीं कई नागरिकों ने इसे वैचारिक समझौते के रूप में देखा। आम जनमानस का कहना है कि नेताओं को व्यक्तिगत रिश्तों और सार्वजनिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए, ताकि जनता में कोई भ्रम न फैले।

न्यूज़ देखो: रिश्ते मजबूत, विचारधाराएं कमजोर?

हुसैनाबाद का यह दृश्य बताता है कि मौजूदा राजनीति में रिश्ते और आत्मीयता कई बार विचारधाराओं पर भारी पड़ते नजर आते हैं। यह स्वागत चाहे शिष्टाचार हो या पारिवारिक संबंधों की अभिव्यक्ति, लेकिन इसने राजनीतिक स्पष्टता पर सवाल जरूर खड़े किए हैं। आने वाले समय में ऐसे दृश्य राजनीति की दिशा तय करेंगे या भ्रम बढ़ाएंगे, यह देखने वाली बात होगी। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

लोकतंत्र में स्पष्टता ही भरोसे की नींव

राजनीति में सौहार्द जरूरी है, लेकिन विचारधारा की पहचान भी उतनी ही अहम।
निजी रिश्ते सम्मान के पात्र हैं, पर सार्वजनिक मंच पर संदेश भी मायने रखता है।
लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नेता अपने आचरण से स्पष्ट संकेत दें।
आप क्या सोचते हैं—यह शिष्टाचार था या वैचारिक उलझन? अपनी राय कमेंट करें, खबर साझा करें और संवाद को आगे बढ़ाएं।

📥 Download E-Paper

यह खबर आपके लिए कितनी महत्वपूर्ण थी?

रेटिंग देने के लिए किसी एक स्टार पर क्लिक करें!

इस खबर की औसत रेटिंग: 0 / 5. कुल वोट: 0

अभी तक कोई वोट नहीं! इस खबर को रेट करने वाले पहले व्यक्ति बनें।

चूंकि आपने इस खबर को उपयोगी पाया...

हमें सोशल मीडिया पर फॉलो करें!

IMG-20251223-WA0009
IMG-20250723-WA0070
आगे पढ़िए...

नीचे दिए बटन पर क्लिक करके हमें सोशल मीडिया पर फॉलो करें


Yashwant Kumar

हुसैनाबाद, पलामू

Related News

ये खबर आपको कैसी लगी, अपनी प्रतिक्रिया दें

Back to top button
error: