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माइक्रोफाइनेंस पर शोध से पलामू को अंतरराष्ट्रीय पहचान, डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी की पुस्तक बनी मानव सशक्तिकरण की मिसाल

#मेदिनीनगर #शैक्षणिक_उपलब्धि : माइक्रोफाइनेंस एवं ह्यूमन इंपावरमेंट पर पुस्तक लिखकर डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी ने पलामू और झारखंड को गौरवान्वित किया।
  • डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी ने माइक्रोफाइनेंस एवं ह्यूमन इंपावरमेंट पर पुस्तक लिखी।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता एवं हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड सदस्य हृदयानंद मिश्र ने उपलब्धि को पलामू के लिए गौरव बताया।
  • पुस्तक को गरीबी उन्मूलन और मानव सशक्तिकरण के लिए मील का पत्थर बताया गया।
  • डॉ प्रियंका एनआईटी जमशेदपुर में विज़िटिंग फैकल्टी के रूप में कार्यरत।
  • आईआईएम संबलपुर और एक्सएलआरआई जमशेदपुर से भी शैक्षणिक जुड़ाव।
  • माइक्रोफाइनेंस में पीएचडी, ग्रामीण विकास में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

मेदिनीनगर, पलामू से जुड़ी एक शैक्षणिक उपलब्धि ने न केवल जिले बल्कि पूरे झारखंड को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर गौरवान्वित किया है। डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी द्वारा माइक्रोफाइनेंस एवं ह्यूमन इंपावरमेंट विषय पर लिखी गई पुस्तक को सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जा रहा है। इस उपलब्धि पर झारखंड प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड, झारखंड सरकार के सदस्य हृदयानंद मिश्र, एडवोकेट ने हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें हार्दिक बधाई दी है।

हृदयानंद मिश्र ने जताया गर्व

वरिष्ठ अधिवक्ता हृदयानंद मिश्र ने कहा कि डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी ने अपने अकादमिक शोध और लेखन के माध्यम से पलामू को नई पहचान दिलाई है।
उन्होंने कहा:

हृदयानंद मिश्र ने कहा: “डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी मेरी पुत्री के समान हैं। माइक्रोफाइनेंस एवं ह्यूमन इंपावरमेंट पर उनकी पुस्तक मानव सशक्तिकरण और गरीबी उन्मूलन की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।”

उन्होंने यह भी बताया कि डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी रेड़मा निवासी विश्वविख्यात पर्यावरणविद् प्रोफेसर डॉ एम जी तिवारी की पुत्री हैं, और उनके परिवार से ही सामाजिक सरोकार और बौद्धिक परंपरा की मजबूत विरासत जुड़ी रही है।

पुस्तक का विषय और सामाजिक महत्व

माइक्रोफाइनेंस और ह्यूमन इंपावरमेंट पर आधारित यह पुस्तक आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए वित्तीय समावेशन, आत्मनिर्भरता और सतत विकास के पहलुओं को गहराई से प्रस्तुत करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, माइक्रोफाइनेंस न केवल गरीब तबके को वित्तीय संसाधनों से जोड़ता है, बल्कि उन्हें निर्णय लेने की क्षमता, आत्मसम्मान और सामाजिक भागीदारी भी प्रदान करता है।
डॉ प्रियंका की यह पुस्तक नीति निर्माताओं, शोधार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वित्तीय संस्थानों के लिए एक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ के रूप में देखी जा रही है।

शैक्षणिक योग्यता और अकादमिक सफर

डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी माइक्रोफाइनेंस में पीएचडी धारक हैं और उन्होंने ग्रामीण विकास में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी प्राप्त किया है।
वर्तमान में वे एनआईटी जमशेदपुर में विज़िटिंग फैकल्टी के रूप में कार्यरत हैं, जहां वे छात्रों को वित्त, विकास और सामाजिक उद्यमिता से जुड़े विषयों में मार्गदर्शन प्रदान कर रही हैं।
इससे पहले वे आईआईएम संबलपुर और एक्सएलआरआई जमशेदपुर जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से शैक्षणिक रूप से जुड़ी रह चुकी हैं, जो उनके अकादमिक कद को और मजबूत करता है।

बैंकिंग सेक्टर से अकादमिक दुनिया तक

अकादमिक क्षेत्र में आने से पूर्व डॉ प्रियंका ने बैंकिंग सेक्टर में भी कार्य किया है। इस अनुभव ने उन्हें वित्तीय प्रणालियों, जमीनी स्तर पर वित्तीय समावेशन और आम लोगों की आर्थिक चुनौतियों को करीब से समझने का अवसर दिया।
बैंकिंग अनुभव और अकादमिक शोध का यह संगम उनके लेखन और शिक्षण को अधिक व्यावहारिक और प्रभावी बनाता है।

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शोध, पेटेंट और नवाचार

डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी का शोध कार्य केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है। उनके नाम एक स्वीकृत पेटेंट और दो प्रकाशित पेटेंट दर्ज हैं, जो यह दर्शाता है कि वे अकादमिक गहराई को नवाचार और व्यावहारिक समाधान से जोड़ती हैं।
उनकी पेशेवर रुचि के प्रमुख क्षेत्र माइक्रोफाइनेंस, वित्त, बैंकिंग और सामाजिक उद्यमिता हैं। उनका कार्य समुदायों को सशक्त बनाने, महिलाओं और ग्रामीण वर्ग को आत्मनिर्भर बनाने तथा समावेशी विकास को बढ़ावा देने की स्पष्ट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पलामू के लिए प्रेरणा

डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी की यह उपलब्धि पलामू के युवाओं, विशेषकर छात्राओं के लिए प्रेरणास्रोत बनकर सामने आई है। यह साबित करती है कि छोटे शहरों और जिलों से भी वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने वाला शोध और लेखन संभव है, बशर्ते समर्पण और दृष्टि स्पष्ट हो।

न्यूज़ देखो: जब शोध से बदलती है समाज की दिशा

डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी की पुस्तक यह दर्शाती है कि अकादमिक शोध केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान भी बन सकता है। माइक्रोफाइनेंस जैसे विषय पर उनका कार्य नीति और व्यवहार दोनों स्तरों पर प्रभाव डालने की क्षमता रखता है। ऐसे विद्वानों को संस्थागत और सामाजिक स्तर पर प्रोत्साहन मिलना चाहिए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

ज्ञान से सशक्त समाज की ओर कदम

शिक्षा, शोध और नवाचार ही किसी समाज की असली ताकत होते हैं।
डॉ प्रियंका प्रियदर्शिनी की सफलता हमें यह सिखाती है कि सामाजिक बदलाव की शुरुआत विचारों से होती है।
इस प्रेरक उपलब्धि पर अपनी राय साझा करें, इस खबर को आगे बढ़ाएं और शिक्षा व शोध को सम्मान देने की संस्कृति को मजबूत करें।

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