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डुमरी प्रखंड में सरहुल महोत्सव धूमधाम से संपन्न, पारंपरिक झांकी और शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब

#डुमरी #सरहुल_महोत्सव : पारंपरिक पूजा, शोभायात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूंजा पूरा क्षेत्र।

डुमरी प्रखंड में मंगलवार को आदिवासी समुदाय का प्रमुख पर्व सरहुल पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। प्रखंड सरहुल पूजा समिति के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों की बड़ी भागीदारी रही। सरना स्थल पर पूजा-अर्चना के बाद भव्य शोभायात्रा निकाली गई। इस आयोजन ने क्षेत्र में सांस्कृतिक एकता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत किया।

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  • डुमरी प्रखंड में मंगलवार को सरहुल पर्व धूमधाम से मनाया गया।
  • मुख्य अतिथि पूर्व सांसद सुदर्शन भगत और विशिष्ट अतिथि शिव शंकर उरांव रहे।
  • सरना स्थल पर बैगा बीरबल द्वारा विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई गई।
  • पारंपरिक वेशभूषा में निकली शोभायात्रा टांगरडीह झखराकुम्बा तक पहुंची।
  • हिंदू-मुस्लिम समाज द्वारा दुर्गा मंदिर और नवाडीह चौक पर शरबत वितरण किया गया।
  • सांस्कृतिक कार्यक्रमों में खोड़हा दलों को समिति द्वारा पुरस्कृत किया गया।

डुमरी प्रखंड में आदिवासी समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण पर्व सरहुल को इस वर्ष भी बड़े ही उत्साह और पारंपरिक तरीके से मनाया गया। इस आयोजन में न केवल स्थानीय ग्रामीणों बल्कि जनप्रतिनिधियों और गणमान्य नागरिकों की भी व्यापक भागीदारी देखने को मिली। कार्यक्रम की शुरुआत धार्मिक आस्था के केंद्र सरना स्थल से हुई, जहां पूजा-अर्चना के बाद पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बन गया। इसके बाद निकली भव्य शोभायात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पूरे आयोजन को और भी खास बना दिया।

सरना स्थल पर पारंपरिक पूजा से हुई शुरुआत

कार्यक्रम की शुरुआत सरना स्थल पर विधिवत पूजा-अर्चना के साथ हुई। मुख्य पुजारी बैगा बीरबल ने पूरे विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई। इस दौरान उपस्थित अतिथियों और श्रद्धालुओं को सरई फूलखोसी अर्पित की गई और प्रसाद वितरण किया गया। पूजा के समय पूरे वातावरण में श्रद्धा और भक्ति का माहौल देखने को मिला।

मुख्य अतिथि पूर्व सांसद सुदर्शन भगत ने इस अवसर पर कहा:

सुदर्शन भगत ने कहा: “सरहुल पर्व आदिवासी समाज की पहचान और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है, जिसे सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी है।”

शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब, पारंपरिक नृत्य से झूमे लोग

पूजा के बाद सरहुल शोभायात्रा निकाली गई, जो सरना स्थल से होते हुए टांगरडीह स्थित झखराकुम्बा तक पहुंची। इस शोभायात्रा में बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। मांदर और नगाड़ों की थाप पर लोग नाचते-गाते हुए आगे बढ़ते रहे।

शोभायात्रा के दौरान पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बना रहा। लोगों के उत्साह और सहभागिता ने इस आयोजन को और भी भव्य बना दिया।

झखराकुम्बा में विशाल सभा और सांस्कृतिक कार्यक्रम

शोभायात्रा झखराकुम्बा पहुंचकर एक विशाल सभा में परिवर्तित हो गई, जहां विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। सामूहिक नृत्य और पारंपरिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया।

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कार्यक्रम के अंत में खोड़हा दलों को समिति की ओर से पुरस्कृत कर उनका उत्साहवर्धन किया गया। इससे प्रतिभागियों में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार हुआ।

सामाजिक सौहार्द की मिसाल, सभी समुदायों की भागीदारी

इस आयोजन की खास बात यह रही कि इसमें सभी समुदायों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। डुमरी के हिंदू और मुस्लिम समाज द्वारा दुर्गा मंदिर और नवाडीह चौक पर शोभायात्रा में शामिल लोगों के लिए शरबत की व्यवस्था की गई।

इस मौके पर शंकर भगत, रविशंकर भगत, बीरेंद्र भगत, संजय उरांव, जून उरांव, बीरबल भगत, अनिल भगत, वासुदेव भगत, श्रीराम उरांव, अमूल भगत, बेला देवी, जसिंता देवी, अनुराधा देवी, अन्नपुर्णा देवी, सुमति देवी, ममता एक्का, सेवती उरांव, बिमला कुजूर, संपति देवी, सुखमनी देवी, मीना देवी, गीता एक्का, अनिल उरांव, रामकृपा भगत, राकेश भगत, हेमंत भगत, मनोज उरांव, वीर बहादुर भगत, सुमेश उरांव सहित हजारों ग्रामीण उपस्थित रहे।

साथ ही कार्यक्रम में पूर्व विधायक शिव शंकर उरांव, थाना प्रभारी शशि प्रकाश, हरेंद्र भगत, अनिल ताम्रकार, राजू केशरी, शिवबालक उरांव, बीरेंद्र जायसवाल, अकलू भगत, संजय जायसवाल, जगरनाथ भगत समेत कई जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

जनप्रतिनिधियों ने सरहुल के महत्व को बताया

विशिष्ट अतिथि शिव शंकर उरांव सहित अन्य वक्ताओं ने भी सरहुल पर्व के महत्व पर प्रकाश डाला और इसे प्रकृति, संस्कृति और समाज के बीच संतुलन का प्रतीक बताया। सभी ने इस पर्व को मिलजुल कर मनाने और इसकी परंपराओं को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

न्यूज़ देखो: सरहुल में दिखी संस्कृति, एकता और सामाजिक समरसता

डुमरी में आयोजित सरहुल महोत्सव ने यह साबित किया कि परंपराएं आज भी समाज को जोड़ने का मजबूत माध्यम हैं। इस आयोजन में न केवल आदिवासी संस्कृति की झलक दिखी, बल्कि सभी समुदायों की भागीदारी ने सामाजिक एकता का संदेश भी दिया। ऐसे आयोजन प्रशासन और समाज के बीच बेहतर तालमेल को भी दर्शाते हैं। आगे भी क्या इस तरह के आयोजन लगातार होते रहेंगे और युवा पीढ़ी इससे जुड़ेगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

अपनी संस्कृति को जानें और आगे बढ़ाएं

सरहुल जैसे पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और समाज में एकता का संदेश देते हैं। ऐसे आयोजनों में भाग लेना सिर्फ परंपरा निभाना नहीं, बल्कि अपनी पहचान को मजबूत करना भी है।

आज जरूरत है कि हम अपनी संस्कृति को समझें, उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं और सामाजिक सौहार्द को बनाए रखें।

आप भी अपने क्षेत्र के ऐसे आयोजनों में शामिल हों, जागरूक बनें और समाज को जोड़ने का काम करें।

अपनी राय कमेंट में जरूर दें, इस खबर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करें और अपनी संस्कृति पर गर्व करना शुरू करें।

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Aditya Kumar

डुमरी, गुमला

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