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प्रथम शंखनाद प्रतियोगिता में गूंजा संस्कृति और विज्ञान का स्वर, शशांक शेखर तिवारी बने विजेता

#गढ़वा #शंखनाद_प्रतियोगिता : पंडित हर्ष द्विवेदी कला मंच की पहल ने युवाओं को भारतीय परंपरा और विज्ञान से जोड़ा।

गढ़वा में आयोजित प्रथम शंखनाद प्रतियोगिता ने भारतीय संस्कृति और वैज्ञानिक चेतना का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। पंडित हर्ष द्विवेदी कला मंच के आयोजन में युवाओं ने शंखनाद की परंपरा को नए दृष्टिकोण से अपनाया। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने इसके धार्मिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी महत्व पर प्रकाश डाला। प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए शशांक शेखर तिवारी ने प्रथम स्थान हासिल किया।

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  • आयोजन स्थल: नवादा मोड़ स्थित बंधन मैरिज हॉल, गढ़वा
  • आयोजक संस्था: पंडित हर्ष द्विवेदी कला मंच, नवादा (गढ़वा)
  • मुख्य उद्देश्य: युवाओं को भारतीय परंपराओं और शंखनाद के वैज्ञानिक महत्व से जोड़ना
  • प्रथम विजेता: शशांक शेखर तिवारी
  • निर्णायक मंडल: पंडित संजय पांडेय, अरुण कुमार दुबे, श्रवण कुमार शुक्ल

गढ़वा जिले के नवादा मोड़ स्थित बंधन मैरिज हॉल में आयोजित प्रथम शंखनाद प्रतियोगिता ने सांस्कृतिक चेतना को एक नई दिशा दी। कला और समाज सेवा को समर्पित संस्था पंडित हर्ष द्विवेदी कला मंच द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल प्रतियोगिता कराना नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय परंपराओं से जोड़ते हुए शंखनाद के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी महत्व को जन-जन तक पहुँचाना भी था।

कार्यक्रम की शुरुआत भगवान नटराज की प्रतिमा के समक्ष विधिवत दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इस अवसर पर उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों ने इसे भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक सराहनीय प्रयास बताया।

अध्यात्म और विज्ञान का सार्थक संगम

कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि वक्ताओं ने शंखनाद को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रखते हुए उसे विज्ञान और स्वास्थ्य से भी जोड़ा।

डॉ. टी. पीयूष, चिकित्सा पदाधिकारी, सदर अस्पताल गढ़वा ने अपने संबोधन में कहा:

डॉ. टी. पीयूष ने कहा: “शंखनाद भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। इसका वैज्ञानिक महत्व भी है। कोरोना काल में हमने देखा कि शंख बजाने से फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने में सहायता मिली, जिससे स्वास्थ्य रक्षा में भी योगदान हुआ।”

उन्होंने बताया कि नियमित शंखनाद श्वसन तंत्र को मजबूत करता है और मानसिक तनाव को कम करने में भी सहायक हो सकता है।

शंख की आध्यात्मिक उत्पत्ति और प्रभाव

ज्योतिषाचार्य पंडित संजय पांडेय ने शंख की आध्यात्मिक उत्पत्ति और उसके प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा:

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पंडित संजय पांडेय ने कहा: “शंख की उत्पत्ति सृष्टि कल्याण के उद्देश्य से हुई है। इसकी ध्वनि वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती है।”

उन्होंने यह भी बताया कि प्राचीन काल से शंखनाद को शुभ कार्यों की शुरुआत में अनिवार्य माना गया है।

हर व्यक्ति को शंखनाद का अधिकार

आचार्य अखिलेश कुमार पांडेय ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया कि:

आचार्य अखिलेश कुमार पांडेय ने कहा: “शंखनाद किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं है। सृष्टि के कल्याण की भावना रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति शंखनाद कर सकता है।”

उन्होंने इसे मानव कल्याण से जुड़ी एक सार्वभौमिक परंपरा बताया।

आयोजन का उद्देश्य और भावी सोच

कला मंच के निदेशक नीरज श्रीधर ‘स्वर्गीय’ ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि इस प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है। उन्होंने बताया कि आज के डिजिटल युग में युवाओं का अपनी परंपराओं से जुड़ाव कम हो रहा है, ऐसे में इस तरह के आयोजन सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भूमिका निभा सकते हैं।

प्रतियोगिता और विजेताओं की घोषणा

शंखनाद प्रतियोगिता में विभिन्न प्रतिभागियों ने अपने कौशल और अभ्यास का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। निर्णायक मंडल में पंडित संजय पांडेय, अरुण कुमार दुबे और श्रवण कुमार शुक्ल शामिल थे, जिन्होंने तकनीकी दक्षता, ध्वनि की गुणवत्ता और प्रस्तुति के आधार पर परिणाम घोषित किए।

विजेता सूची:

  • प्रथम स्थान: शशांक शेखर तिवारी
  • द्वितीय स्थान: सिद्धांत कमलापुरी
  • तृतीय स्थान: सुजल कुमार

विजेताओं को शंख और अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। सम्मान पाकर प्रतिभागियों के चेहरे पर उत्साह और गर्व साफ झलक रहा था।

सामाजिक जुड़ाव और सांस्कृतिक चेतना

कार्यक्रम में उपस्थित अन्य गणमान्य अतिथियों ने भी अपने विचार साझा किए। श्रवण कुमार शुक्ल ने कहा कि प्रत्येक घर में प्रतिदिन शंखनाद होना चाहिए, जिससे सकारात्मक वातावरण बने।

मानस मंडली के अध्यक्ष अरुण कुमार दुबे और संस्कार भारती के संरक्षक विजय कुमार सोनी ने इस आयोजन को नवाचारपूर्ण पहल बताते हुए कहा कि इससे समाज का संस्कृति के प्रति जुड़ाव और मजबूत होगा।

आयोजन को सफल बनाने में सामूहिक योगदान

इस कार्यक्रम को सफल बनाने में संतोष पांडेय, राकेश तिवारी, चंद्र प्रकाश मिश्रा, ललन सोनी, अमोद कुमार सिन्हा सहित संस्था के अन्य सदस्यों का उल्लेखनीय योगदान रहा। आयोजकों ने बताया कि भविष्य में भी इस तरह के सांस्कृतिक और वैचारिक कार्यक्रमों का आयोजन जारी रहेगा।

न्यूज़ देखो: परंपरा को आधुनिक दृष्टि से जोड़ने की पहल

प्रथम शंखनाद प्रतियोगिता यह दर्शाती है कि भारतीय परंपराओं को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो युवा पीढ़ी उनसे सहजता से जुड़ सकती है। यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक संरक्षण का उदाहरण है, बल्कि सामाजिक जागरूकता की दिशा में भी एक मजबूत कदम है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

संस्कृति से जुड़ें, विज्ञान को समझें

ऐसे आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और नई पीढ़ी को सकारात्मक दिशा देते हैं।
यदि आप भी मानते हैं कि भारतीय परंपराओं का वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व समझना जरूरी है, तो इस खबर को साझा करें।
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