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गुरबख्श सिंह ढिल्लों की विरासत: साहस, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के संकल्प की अमिट गाथा

#स्वतंत्रता_संग्राम : आज़ाद हिंद फ़ौज के कर्नल ढिल्लों का प्रेरक जीवन और राष्ट्रीय चेतना पर प्रभाव।

आज़ाद हिंद फ़ौज के कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन सेनानायकों में रहे, जिनकी भूमिका ने देशव्यापी चेतना को झकझोरा। 18 मार्च 1914 को जन्मे ढिल्लों ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग चुना। लाल क़िला मुक़दमे ने उनके साहस को राष्ट्रीय प्रतीक बना दिया और स्वतंत्रता आंदोलन को नई गति दी।

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  • 18 मार्च 1914 को जन्मे थे गुरबख्श सिंह ढिल्लों
  • आज़ाद हिंद फ़ौज में कर्नल के रूप में निभाई अहम भूमिका।
  • मलाया और बर्मा मोर्चों पर दिखाया नेतृत्व और साहस।
  • लाल क़िला मुक़दमा बना राष्ट्रीय जनआंदोलन का प्रतीक।
  • स्वतंत्रता के बाद चुना सादगीपूर्ण और अनुशासित जीवन।

इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का क्रम नहीं होता; वह उन व्यक्तित्वों की जीवंत स्मृति भी है, जिनके संकल्प ने समय की धारा मोड़ी। गुरबख्श सिंह ढिल्लों ऐसे ही सेनानायक थे—आज़ाद हिंद फ़ौज के निर्भीक कर्नल, जिनका जीवन स्वतंत्रता के अर्थ और उसकी जिम्मेदारी का बोध कराता है। उनका स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि देश और समाज के प्रति कर्तव्य निभाने का आह्वान है।

सैन्य प्रशिक्षण से स्वराज के संकल्प तक

18 मार्च 1914 को जन्मे ढिल्लों ने प्रारंभिक प्रशिक्षण ब्रिटिश भारतीय सेना में प्राप्त किया। किंतु शीघ्र ही उन्होंने समझ लिया कि विदेशी सत्ता की सेवा करते हुए स्वराज का स्वप्न साकार नहीं हो सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन किया, तब ढिल्लों ने सुरक्षित भविष्य छोड़कर जोखिम भरा मार्ग चुना। यह निर्णय केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और राष्ट्रीय स्वाभिमान का उद्घोष था।

आज़ाद हिंद फ़ौज में नेतृत्व की मिसाल

INA में कर्नल के रूप में ढिल्लों का नेतृत्व रणभूमि तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सैनिकों के मन में यह विश्वास स्थापित किया कि स्वतंत्रता किसी और से मिलने वाला उपहार नहीं, बल्कि अपने साहस और संकल्प से अर्जित अधिकार है। मलाया और बर्मा के मोर्चों पर उन्होंने अनुशासन, संगठन और अदम्य साहस का परिचय दिया। उनके लिए युद्ध केवल सीमाओं का संघर्ष नहीं था; यह दासता और हीनता के विरुद्ध आत्मसम्मान की लड़ाई थी।

लाल क़िला मुक़दमा और राष्ट्रीय चेतना

गुरबख्श सिंह ढिल्लों के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लाल क़िला मुक़दमा रहा। कर्नल प्रेम सहगल और कर्नल शाहनवाज़ ख़ान के साथ उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया। परंतु अदालत में उनके शब्दों में पश्चाताप नहीं, बल्कि गर्व झलकता था कि उन्होंने मातृभूमि के लिए संघर्ष किया।

यह मुक़दमा न्यायालय की सीमाओं से निकलकर जनआंदोलन बन गया। देशभर में जनसमर्थन उमड़ा और सड़कों पर उठती आवाज़ों ने ब्रिटिश शासन की नैतिक वैधता को गहरी चुनौती दी। इतिहास साक्षी है कि INA और इस मुक़दमे ने स्वतंत्रता की प्रक्रिया को निर्णायक गति प्रदान की।

स्वतंत्रता के बाद का जीवन

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ढिल्लों ने सार्वजनिक जीवन में किसी पद या प्रतिष्ठा की लालसा नहीं दिखाई। उन्होंने सादगीपूर्ण जीवन को अपनाया और युवाओं को अनुशासन, ईमानदारी और राष्ट्रहित का संदेश दिया। उनका मानना था कि आज़ादी केवल प्रतीक नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की निरंतर प्रक्रिया है।

वे कहा करते थे:

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“स्वतंत्रता का सम्मान तभी है जब हम अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहें।”

उनका जीवन इस विचार का जीवंत उदाहरण रहा कि सच्चा राष्ट्रप्रेम उत्सवों से आगे बढ़कर दैनिक आचरण में दिखाई देता है।

स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव

चौतरफा जनसमर्थन और लाल क़िला मुक़दमे की गूंज ने भारतीय राष्ट्रीय चेतना को एकजुट किया। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रश्न है। गुरबख्श सिंह ढिल्लों जैसे सेनानायकों ने यह सिद्ध किया कि साहस और सत्य, सत्ता से बड़े होते हैं।

न्यूज़ देखो: साहस की विरासत और आज की जिम्मेदारी

गुरबख्श सिंह ढिल्लों का जीवन हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारी है। INA का संघर्ष और लाल क़िला मुक़दमा यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय एकता और जनसमर्थन किसी भी सत्ता को चुनौती दे सकते हैं। आज आवश्यकता है कि हम उनके साहस को केवल स्मृति में न रखें, बल्कि आचरण में उतारें। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

स्वतंत्रता को जिएं, केवल याद न करें

आज की पीढ़ी के लिए यह समय आत्ममंथन का है। क्या हम अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी उतना ही सम्मान करते हैं? क्या राष्ट्रप्रेम हमारे व्यवहार में झलकता है?

आइए संकल्प लें कि ईमानदारी, अनुशासन और संवेदनशीलता को अपने जीवन का आधार बनाएंगे। गुरबख्श सिंह ढिल्लों की स्मृति में यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

अपनी राय कमेंट में साझा करें, इस लेख को आगे बढ़ाएं और नई पीढ़ी तक स्वतंत्रता की प्रेरक गाथा पहुंचाएं।

Guest Author
वरुण कुमार

वरुण कुमार

बिष्टुपुर, जमशेदपुर

वरुण कुमार, कवि और लेखक: अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद जमशेदपुर के सदस्य हैं।

यह आलेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है और NewsDekho के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

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