
#गढ़वा #हरघरनलजल : 264 करोड़ की योजना कागजों में सफल, गांवों में अब भी कुएं और चापाकल का सहारा।
गढ़वा जिले के मेराल प्रखंड में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई हर घर नल जल योजना अपने लक्ष्य से भटकती नजर आ रही है। लगभग 264 करोड़ रुपये की लागत से बनी यह बहुप्रतीक्षित योजना वर्षों बाद भी ग्रामीणों तक पानी नहीं पहुंचा सकी है। योजना के तहत कई गांवों में जलमीनार और पाइपलाइन तो बन गई, लेकिन जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी। इससे सरकारी मंशा, क्रियान्वयन और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
- 264 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बनी योजना।
- 2019 में शुरू, 2022 में पूरा होने का लक्ष्य।
- बाना गांव में बनी दो विशाल जलमीनार।
- लक्ष्मणपुर, अरंगी, हसनदगा, गोवां सहित कई गांव प्रभावित।
- ग्रामीण आज भी कुएं और चापाकल पर निर्भर।
गढ़वा जिले के मेराल प्रखंड में घर-घर शुद्ध पेयजल पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू की गई हर घर नल जल योजना आज ग्रामीणों के लिए राहत नहीं, बल्कि निराशा का कारण बन चुकी है। केंद्र और राज्य सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना पर करीब 2 अरब 64 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीणों को आज तक नल से एक बूंद पानी भी नसीब नहीं हुआ।
सरकार की मंशा थी कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, ताकि लोगों को जलजनित बीमारियों से राहत मिले और महिलाओं को पानी ढोने की मजबूरी से मुक्ति मिले। लेकिन मेराल प्रखंड में यह योजना भ्रष्टाचार, तकनीकी खामियों और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है।
किन गांवों के लिए बनी थी योजना
इस योजना के तहत बाना, लक्ष्मणपुर, मेराल, अरंगी, हसनदगा और गोवां गांवों के हर घर तक नल के माध्यम से शुद्ध पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था। इन गांवों में पाइपलाइन बिछाई गई, घरों में नल लगाए गए और जलमीनारों का निर्माण भी किया गया। लेकिन यह सारी संरचना आज शोपीस बनकर रह गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि नल तो लगे हैं, लेकिन उनमें आज तक पानी नहीं आया। कई जगह पाइप टूट चुके हैं, कहीं वाल्व खराब हैं, तो कहीं बिजली कनेक्शन और मोटर की व्यवस्था ही अधूरी है।
बाना गांव में बनी विशाल जलमीनारें भी बेकार
बाना गांव में योजना के तहत 19-19 लाख लीटर क्षमता वाली दो विशाल जलमीनारों का निर्माण कराया गया। इन जलमीनारों को देखकर ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें शुद्ध पानी मिलेगा। लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद ये जलमीनारें पानी के इंतजार में खड़ी हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत से बनी जलमीनारें आज जंग खा रही हैं, जबकि आसपास के गांवों में लोग आज भी कुओं और चापाकलों से पानी भरने को मजबूर हैं।
समयसीमा पूरी, लेकिन योजना अधूरी
इस परियोजना की शुरुआत 3 जून 2019 को नाबार्ड के सहयोग से की गई थी। योजना के दस्तावेजों के अनुसार इसे 3 जून 2022 तक पूरा कर जलापूर्ति शुरू हो जानी थी। लेकिन अब 2025 चल रहा है और स्थिति जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब तय समयसीमा में काम पूरा नहीं हुआ, तो जिम्मेदार एजेंसियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। क्या करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद किसी की जवाबदेही तय नहीं होगी?
ग्रामीणों की मजबूरी और नाराजगी
गांव की महिलाओं और बुजुर्गों का कहना है कि गर्मी के दिनों में जल संकट और भी गंभीर हो जाता है। कई जगहों पर चापाकल सूख जाते हैं और कुओं का पानी भी पीने लायक नहीं रह जाता। इसके बावजूद प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है।
एक ग्रामीण ने कहा:
“सरकार ने कहा था कि हर घर में नल से पानी आएगा, लेकिन आज भी हमें बाल्टी लेकर कुएं तक जाना पड़ता है। करोड़ों रुपये गए, लेकिन फायदा शून्य है।”
भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोप
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि योजना में भारी भ्रष्टाचार हुआ है। घटिया सामग्री, अधूरा काम और बिना परीक्षण के भुगतान कर दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं। कई जगहों पर पाइपलाइन बिछाने के बाद दोबारा खुदाई नहीं की गई, जिससे लीकेज की समस्या बनी हुई है।
प्रशासनिक स्तर पर निगरानी और गुणवत्ता जांच की कमी ने इस योजना को विफल बना दिया है।
न्यूज़ देखो: जवाबदेही तय होगी या नहीं?
हर घर नल जल योजना मेराल में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की सच्चाई उजागर करती है। सवाल यह है कि क्या करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी ग्रामीणों को मूलभूत सुविधा से वंचित रखा जाएगा। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वे इस योजना की उच्चस्तरीय जांच कराएं और दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित करें। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
पानी जीवन है, इसे वादों में न गुम होने दें
शुद्ध पेयजल कोई सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है।
यदि योजनाएं कागजों तक सीमित रहीं, तो जनता का विश्वास कैसे बचेगा?
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