#गुमला #पड़हा_स्वशासन : सर्वसम्मति से डांड़ा पड़हा गठन कर सामाजिक एकता पर जोर दिया गया।
गुमला जिले के बसिया प्रखंड में पारंपरिक पड़हा स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रखण्ड स्तरीय डांड़ा पड़हा का गठन किया गया। मूली पड़हा गुमला के नेतृत्व में आयोजित इस बैठक में समाज की परंपराओं, अधिकारों और संवैधानिक मान्यता पर विस्तार से चर्चा हुई। सर्वसम्मति से विभिन्न पदाधिकारियों का चयन किया गया और आदिवासी सामाजिक व्यवस्था को सशक्त बनाने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण और समाज के प्रतिनिधि शामिल हुए।
- बसिया प्रखंड में पारंपरिक डांड़ा पड़हा का सर्वसम्मति से गठन हुआ।
- बैठक में आदिवासी स्वशासन व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों पर हुई चर्चा।
- देवेन्द्र लाल उराँव ने पड़हा व्यवस्था को सामाजिक न्याय का आधार बताया।
- सर्वसम्मति से विभिन्न पदाधिकारियों के नामों का चयन किया गया।
- पेसा नियमावली 2025 में पड़हा को ग्राम सभा से ऊपर की इकाई बताए जाने का उल्लेख।
- कार्यक्रम में समाज के सैकड़ों ग्रामीण और प्रबुद्ध लोग मौजूद रहे।
गुमला जिले के बसिया प्रखंड में रविवार को पारंपरिक आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण सामाजिक बैठक आयोजित की गई। मूली पड़हा गुमला के नेतृत्व में आयोजित इस बैठक में ‘प्रखण्ड स्तरीय डांड़ा पड़हा’ का सर्वसम्मति से गठन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक अन्नाअदि प्रार्थना के साथ हुई, जिसके बाद समाज की एकता, परंपराओं और अधिकारों को लेकर विस्तृत चर्चा की गई। बैठक में समाज के विभिन्न प्रतिनिधियों, ग्रामीणों और प्रबुद्ध लोगों ने भाग लिया।
पड़हा व्यवस्था की ऐतिहासिक भूमिका पर चर्चा
बैठक के दौरान मूली पड़हा के कोटवार देवेन्द्र लाल उराँव ने प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए पड़हा व्यवस्था की ऐतिहासिक और सामाजिक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पड़हा केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन प्रणाली है, जो सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और न्यायिक मामलों का संचालन करती है।
देवेन्द्र लाल उराँव ने कहा: “हमारे समाज में चुनाव या वोटिंग की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सर्वसहमति से निर्णय लेने की गौरवशाली परंपरा है।”
उन्होंने बताया कि वर्ष 1962 में कार्तिक उराँव, भिखराम भगत और रामकुजूर जैसे नेताओं ने इस व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर तक पहचान दिलाने का कार्य किया था। उन्होंने यह भी कहा कि पेसा नियमावली 2025 में पड़हा व्यवस्था को ग्राम सभा से ऊपर की इकाई के रूप में मान्यता दी गई है।
सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों पर जोर
बैठक में उपस्थित विभिन्न वक्ताओं ने आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों को लेकर अपने विचार रखे। देवान चुंईया कुजूर ने कहा कि उराँव जनजाति की मजबूती उसकी सामाजिक शासन व्यवस्था में निहित है।
वहीं उप देवान सोनो मिंज ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13(3) क का उल्लेख करते हुए कहा कि जनजातीय समाज की पारंपरिक व्यवस्थाओं को विशेष महत्व प्राप्त है।
सोनो मिंज ने कहा: “आदिवासी समाज की पारंपरिक संरचना संविधान में भी विशेष महत्व रखती है।”
बदलते परिवेश पर चिंता
बैठक के दौरान गौरी किण्डो ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिकता और बदलते सामाजिक परिवेश के कारण पारंपरिक व्यवस्थाएं धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को मिले विशेष अधिकारों और पहचान की जड़ें इन्हीं पारंपरिक व्यवस्थाओं में मौजूद हैं।
वहीं पुष्पा उरांव ने पांचवीं अनुसूची का उल्लेख करते हुए कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में सामान्य कानून सीधे लागू नहीं होते और यहां निर्णय लेने में राज्यपाल एवं राष्ट्रपति की विशेष भूमिका होती है।
सर्वसम्मति से हुआ पदाधिकारियों का चयन
बैठक में सर्वसम्मति के आधार पर विभिन्न पदाधिकारियों का चयन किया गया। इसमें:
- बेल राजा – पंचु उराँव
- उप बेल – जयमंगल उरांव
- देवान मंत्री – दिनेश लकड़ा
- उप देवान – निकोलस तिग्गा
- कोटवार – बन्दी मिंज
- उप कोटवार – सुधीर उराँव
- कहतो – बिरसा लकड़ा
- उप कहतो – तुलसी उराँव
- रकम उर्वस – सरोजनी उराँव
- उप रकम उर्वस – सोमारी कच्छप
- करटाहा – अहम्बा पुजार
का चयन किया गया।
समाज की एकजुटता बनाए रखने की अपील
कार्यक्रम के अंत में नवनियुक्त पदाधिकारियों ने समाज के सभी लोगों से पारंपरिक व्यवस्थाओं और सामाजिक मूल्यों को बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपरा और सामूहिक निर्णय प्रणाली में निहित है।
नवनियुक्त बेल पंचु उराँव ने कहा: “समाज की एकता और परंपराओं की रक्षा हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।”
बैठक में मनोज लोहरा, गोपाल बराइक, पुरूषोत्तम लकड़ा, जीता तिर्की, लालू ओरांव, नानकु मिंज, मंगरा उराँव, बलि ओरांव, मनोहर चिक बराइक सहित सैकड़ों ग्रामीण और समाज के प्रबुद्ध लोग मौजूद रहे।
न्यूज़ देखो: परंपराओं के संरक्षण का मजबूत संदेश
बसिया में आयोजित यह बैठक आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को जीवित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। बदलते समय में जहां पारंपरिक व्यवस्थाएं कमजोर पड़ती दिख रही हैं, वहीं इस तरह के आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। सामाजिक एकता, सामूहिक निर्णय और संवैधानिक अधिकारों की समझ को मजबूत करना आज के समय की आवश्यकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि समाज इस व्यवस्था को नई पीढ़ी तक किस प्रकार पहुंचाता है।
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अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी
समाज की ताकत उसकी एकता और परंपराओं में छिपी होती है।
जब समुदाय मिलकर अपने अधिकारों और संस्कृति की रक्षा करता है, तभी विकास का रास्ता मजबूत होता है।
नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सामाजिक व्यवस्थाओं से जोड़ना बेहद जरूरी है।
सामाजिक जागरूकता और सहभागिता से ही मजबूत समाज का निर्माण संभव है।
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