
#लातेहार #वन_अधिकार : दस दिवसीय पदयात्रा के तीसरे दिन बेतला पहुंचे ग्रामीण — वन विभाग को सौंपा मांग पत्र।
लातेहार जिले में वन अधिकारों और ग्राम सभाओं के अधिकारों को लेकर ग्रामीणों की दस दिवसीय पदयात्रा जारी है। तीसरे दिन पदयात्री बेतला पहुंचे और वन क्षेत्र कार्यालय का घेराव कर अधिकारियों को मांग पत्र सौंपा। ग्रामीणों ने वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत लंबित दावों के निष्पादन और विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया। प्रतिनिधिमंडल ने वन विभाग से ग्राम सभाओं के अधिकारों का सम्मान करने की मांग की।
- संयुक्त ग्राम सभा मंच बरवाडीह के नेतृत्व में 10 दिवसीय पदयात्रा जारी।
- तीसरे दिन बेतला वन क्षेत्र कार्यालय का घेराव कर सौंपा मांग पत्र।
- नेतृत्व में जिला परिषद सदस्य कन्हाई सिंह और समाजसेवी श्यामली शर्मा।
- वन अधिकार अधिनियम 2006 के लंबित दावों के निष्पादन की मांग।
- 7384 दावों में से 3599 अब भी लंबित होने का ग्रामीणों का आरोप।
लातेहार जिले में वन अधिकारों और ग्राम सभाओं के अधिकारों को लेकर ग्रामीणों की आवाज तेज होती जा रही है। संयुक्त ग्राम सभा मंच बरवाडीह के तत्वावधान में ग्राम मंडल से लातेहार तक निकाली जा रही दस दिवसीय पदयात्रा के तीसरे दिन मंगलवार को पदयात्री बेतला पहुंचे। यहां ग्रामीणों ने बेतला वन क्षेत्र कार्यालय का घेराव कर वन विभाग के अधिकारियों को अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा।
पदयात्रा का नेतृत्व बरवाडीह पूर्वी के जिला परिषद सदस्य कन्हाई सिंह और समाजसेवी श्यामली शर्मा कर रहे हैं। घेराव के दौरान आयोजित सभा में कई वक्ताओं ने बारी-बारी से ग्रामीणों की समस्याओं और वन अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाया।
टाइगर सफारी योजना पर उठाए सवाल
सभा को संबोधित करते हुए समाजसेवी श्यामली शर्मा ने पुटुवागढ़ में प्रस्तावित टाइगर सफारी योजना को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस परियोजना को ग्राम सभा की स्वीकृति के बिना शुरू किया जाना पूरी तरह गलत है।
समाजसेवी श्यामली शर्मा ने कहा:
“जब राज्य में पेसा कानून लागू है तो किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले ग्राम सभा की अनुमति लेना अनिवार्य है। इसके बावजूद बिना ग्राम सभा की स्वीकृति के योजना शुरू करना कानून का उल्लंघन है।”
उन्होंने कहा कि ग्राम सभाओं के अधिकारों की अनदेखी कर विकास परियोजनाओं को लागू करना ग्रामीणों के अधिकारों का हनन है।
वन अधिकार अधिनियम के लंबित दावों का मुद्दा
ग्रामीणों ने ज्ञापन के माध्यम से बताया कि लातेहार जिले में ग्राम सभाओं द्वारा कुल 7384 वन अधिकार दावे प्रस्तुत किए गए थे। इनमें से 3599 दावे अब भी जिला प्रशासन के पास लंबित हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई मामलों में अधिकार पत्र जारी करते समय क्षेत्रफल में कटौती कर दी गई है और सामुदायिक अधिकार भी अधूरे दिए गए हैं।
ग्रामीणों ने मांग की कि वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत लंबित सामुदायिक और व्यक्तिगत दावों का जल्द से जल्द निष्पादन किया जाए।
ग्रामीणों ने उठाईं कई अहम मांगें
पदयात्रा के दौरान ग्रामीणों ने वन विभाग और प्रशासन के सामने कई महत्वपूर्ण मांगें रखीं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- ग्राम सभाओं को वन उपज पर पूर्ण अधिकार दिया जाए।
- ग्रामीणों पर दर्ज कथित फर्जी मुकदमों को वापस लिया जाए।
- विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर ग्रामीणों को बेदखल करने की कार्रवाई पर रोक लगे।
- वन अधिकार अधिनियम के लंबित दावों का शीघ्र निपटारा किया जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे अपने पारंपरिक अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं और अब इन मुद्दों का स्थायी समाधान जरूरी है।
विभिन्न परियोजनाओं को लेकर भी जताई चिंता
मांग पत्र में यह भी कहा गया कि उत्तर कोयल जलाशय (मंडल डैम), हिरण पार्क, ग्रास प्लॉट निर्माण और टाइगर सफारी जैसी परियोजनाओं के नाम पर ग्रामीणों को उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
ग्रामीणों ने कहा कि विकास परियोजनाओं के नाम पर यदि स्थानीय समुदायों के अधिकारों की अनदेखी होगी तो इससे सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है।
वन विभाग को सौंपा गया मांग पत्र
ग्रामीणों के प्रतिनिधिमंडल ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन बल प्रमुख), वन भवन डोरंडा, रांची के नाम संबोधित मांग पत्र बेतला के प्रभारी वनपाल संतोष कुमार सिंह को सौंपा।
इस दौरान ग्रामीणों ने अपनी समस्याओं और मांगों को विस्तार से रखते हुए जल्द कार्रवाई की उम्मीद जताई।
बड़ी संख्या में ग्रामीण रहे मौजूद
इस मौके पर कई ग्रामीण और स्थानीय प्रतिनिधि मौजूद रहे। इनमें प्रमुख रूप से
रामजन्म सिंह, भोलेनाथ सिंह, बिनोद सिंह, महिंद्र सिंह, राजू उरांव, पविता कुंभारा, सविता कुमारी, मोहन सिंह, रीता देवी, चिन्नावणी देवी, रेखा कुमारी, सरिता कुमारी, शादेवी, रजन्ती देवी, जीरा देवी और हेसकु कुमारी देवी सहित कई ग्रामीण उपस्थित थे।
न्यूज़ देखो: वन अधिकारों पर संवाद जरूरी
लातेहार जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में वन अधिकारों का मुद्दा केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और आजीविका से जुड़ा सवाल भी है। यदि ग्राम सभाओं की भागीदारी और सहमति के बिना परियोजनाएं लागू की जाती हैं तो इससे स्थानीय समुदायों में असंतोष बढ़ सकता है। प्रशासन और ग्रामीणों के बीच संवाद और पारदर्शिता इस तरह के विवादों के समाधान का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकता है।
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अधिकारों के प्रति जागरूकता ही लोकतंत्र की ताकत
अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है। जब नागरिक संगठित होकर अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखते हैं तो व्यवस्था भी जवाबदेह बनती है।
यदि आपके क्षेत्र में भी विकास योजनाओं, वन अधिकारों या स्थानीय मुद्दों से जुड़ी समस्याएं हैं तो उन्हें जागरूकता और संवाद के माध्यम से सामने लाना जरूरी है।
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