
#खलारी #रांची #चैती_छठ : तीसरे दिन व्रतियों ने श्रद्धा से डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया।
खलारी, मैकलुस्कीगंज और डकरा क्षेत्र में चैती छठ महापर्व के तीसरे दिन व्रतियों ने संध्या बेला में डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया। पूरे क्षेत्र में भक्ति, आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने निर्जला उपवास रखते हुए विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। यह पर्व प्रकृति, सूर्य उपासना और पारिवारिक सुख-समृद्धि से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है।
- खलारी, मैकलुस्कीगंज, डकरा सहित क्षेत्रों में व्रतियों ने डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया।
- निर्जला उपवास के साथ श्रद्धालुओं ने पूरे दिन कठिन साधना का पालन किया।
- ठेकुआ, प्रसाद और छठ गीतों से घाटों पर भक्तिमय माहौल बना।
- महिलाएं सिर पर डलिया लेकर गीत गाते हुए छठ घाट पहुंचीं।
- शुक्रवार को उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ महापर्व का समापन होगा।
खलारी और आसपास के क्षेत्रों में चैती छठ महापर्व का उल्लास चरम पर है। मंगलवार को इस चार दिवसीय पर्व के तीसरे दिन व्रतधारियों ने पूरे दिन निर्जला उपवास रखकर संध्या समय डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया। घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहां भक्तों ने पूरे विधि-विधान से सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की।
आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम
चैती छठ, भले ही कार्तिक छठ जितना व्यापक न हो, लेकिन इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। इस पर्व में व्रती पूरे नियम और अनुशासन के साथ पूजा करते हैं। सुबह स्नान के बाद दिनभर उपवास रखते हुए शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य देना इस दिन की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है।
घाटों पर महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर पूजा की डलिया लेकर पहुंचीं। छठ गीतों की मधुर गूंज और ढोल-नगाड़ों की धुनों ने वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया। हर तरफ श्रद्धा और भक्ति की झलक स्पष्ट दिखाई दी।
छठ घाटों पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
मैकलुस्कीगंज, खलारी और डकरा के विभिन्न छठ घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र हुए। व्रतियों ने जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की। इस दौरान घाटों पर सुरक्षा और व्यवस्था भी सुचारू रूप से बनाए रखी गई।
श्रद्धालुओं ने पूरी निष्ठा के साथ ठेकुआ, फल और अन्य प्रसाद तैयार कर छठी मैया को अर्पित किया। प्रसाद वितरण के दौरान लोगों में उत्साह और श्रद्धा का विशेष माहौल देखने को मिला।
कठिन तपस्या और आत्मशुद्धि का प्रतीक
छठ पर्व को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। 36 घंटे का निर्जला उपवास न केवल शारीरिक अनुशासन का प्रतीक है, बल्कि आत्मिक शुद्धि और आस्था की गहराई को भी दर्शाता है। व्रतियों के चेहरे पर संतोष और आध्यात्मिक शांति साफ झलक रही थी।
छठ पूजा के माध्यम से सूर्य देव की उपासना के साथ-साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यह पर्व मानव और प्रकृति के बीच संतुलन और सामंजस्य का संदेश देता है।
उदीयमान सूर्य को अर्घ्य के साथ होगा समापन
अब इस महापर्व का अंतिम चरण शेष है। शुक्रवार की सुबह व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करेंगे, जिसके साथ ही चार दिवसीय चैती छठ का समापन होगा। इसके बाद व्रती पारण कर अपना उपवास समाप्त करेंगी।
न्यूज़ देखो: बढ़ती आस्था के साथ मजबूत हो रही सांस्कृतिक पहचान
चैती छठ का बढ़ता प्रचलन यह दर्शाता है कि लोग अपनी परंपराओं और आस्था से गहराई से जुड़े हुए हैं। इस तरह के आयोजन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करते हैं। प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि ऐसे पर्वों को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराया जाए। क्या आने वाले समय में चैती छठ भी कार्तिक छठ जितना व्यापक रूप ले पाएगा—यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
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छठ महापर्व हमें अनुशासन, समर्पण और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है। ऐसे पर्व समाज में सकारात्मक ऊर्जा और एकता को बढ़ावा देते हैं।
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