मिट्टी के हुनरमंदों संग कॉफ़ी पर हुई खुली बातचीत: गढ़वा में होगा मृदा शिल्प मेला

मिट्टी के हुनरमंदों संग कॉफ़ी पर हुई खुली बातचीत: गढ़वा में होगा मृदा शिल्प मेला

author Sonu Kumar
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#गढ़वा #शिल्पकला : कॉफ़ी विद एसडीएम में मिट्टी के कलाकारों का हुआ सम्मान, तीन दिवसीय शिल्प मेले की घोषणा
  • एसडीएम संजय कुमार ने मूर्तिकारों संग किया संवाद।
  • मिट्टी के कलाकारों को मिलेगा मंच, होगा मृदा शिल्प मेला
  • मूर्तिकारों ने रखी मिट्टी उपलब्धता और बाजार विस्तार की मांग।
  • इको-फ्रेंडली मूर्तियों को बढ़ावा देने की बात हुई।
  • हुनरमंद शिल्पकारों को अंगवस्त्र ओढ़ाकर किया गया सम्मानित

गढ़वा। सदर अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार ने बुधवार को अपने नियमित कार्यक्रम “कॉफ़ी विद एसडीएम” के तहत मिट्टी की मूर्तियां बनाने वाले शिल्पकारों से संवाद किया। बैठक में गढ़वा और आसपास के कई मूर्तिकार पहुंचे और अपनी समस्याएं व सुझाव साझा किए।

मिट्टी से भगवान का रूप गढ़ने वाले कलाकार

एसडीएम संजय कुमार ने कहा कि मिट्टी के शिल्पकार न सिर्फ कलाकार हैं बल्कि हमारी संस्कृति, धर्म और परंपरा के वास्तविक वाहक भी हैं। उन्होंने कहा, “जो लोग मिट्टी को भगवान का रूप दे देते हैं, वे सचमुच आदर के पात्र हैं।” एसडीएम ने भरोसा दिया कि शिल्पकारों के कौशल विकास, प्रशिक्षण और बाज़ार से जुड़ाव के लिए प्रशासन हर संभव प्रयास करेगा।

कोयल नदी की मिट्टी सर्वश्रेष्ठ

शिल्पकारों ने बताया कि गढ़वा की कोयल नदी की मिट्टी मूर्ति निर्माण के लिए सबसे अनुकूल है। यहां पुआल और अन्य आवश्यक सामग्री की भी कमी नहीं है। कलाकारों का मानना है कि थोड़े प्रयास से गढ़वा को मूर्तिकला के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

इको-फ्रेंडली मूर्तियों का महत्व

पुरस्कार प्राप्त शिल्पकार संजय सूत्रधार ने कहा कि मिट्टी और पुआल से बनी मूर्तियां पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल होती हैं और जलाशयों में विसर्जन के बाद आसानी से घुल जाती हैं। इसके विपरीत, प्लास्टर ऑफ पेरिस और केमिकल रंगों से बनी मूर्तियां जल प्रदूषण बढ़ाती हैं। उन्होंने कहा कि गढ़वा में इस कला को बढ़ावा देकर बड़े स्तर पर पर्यावरण संरक्षण किया जा सकता है।

बाजार और मिट्टी उपलब्धता की समस्या

मूर्तिकारों ने शिकायत की कि छोटी मूर्तियों और खिलौनों को स्थानीय बाजार में खरीदार नहीं मिलते। वहीं नदी से मिट्टी लाने में भी दिक्कत आती है क्योंकि स्थानीय लोग रोकते हैं। उन्होंने मांग रखी कि प्रशासन मिट्टी उठाने के लिए चिह्नित क्षेत्र निर्धारित करे और बाजार उपलब्धता में मदद करे।

प्रशिक्षण और योजनाओं से जुड़ाव

दिव्यांग शिल्पकार संतोष प्रजापति ने कहा कि प्रशासन अगर प्रशिक्षण और उपकरणों की सुविधा दिला दे तो यहां के युवा इस कला से सम्मानजनक जीविका कमा सकते हैं। उन्होंने बताया कि अभी उन्हें मिट्टी के लिए हर बार 1500 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

शिल्प मेला दिवाली के आसपास

एसडीएम संजय कुमार ने घोषणा की कि गढ़वा में विशेष रूप से मिट्टी के कलाकारों को मंच देने के लिए तीन दिवसीय “मृदा शिल्प मेला” आयोजित किया जाएगा। यह मेला संभवतः दिवाली के आसपास होगा ताकि अधिक से अधिक लोग इन कलाकारों की प्रतिभा को देख सकें और खरीदारी कर सकें।

हुनर का हुआ सम्मान

कार्यक्रम के अंत में एसडीएम ने सभी कलाकारों को अंगवस्त्र ओढ़ाकर सम्मानित किया और कहा कि प्रशासन हमेशा उनके साथ खड़ा है।

न्यूज़ देखो: कला को मिले पहचान और सम्मान

गढ़वा के कलाकार केवल मूर्तियां ही नहीं गढ़ते, वे समाज की आस्था, परंपरा और संस्कृति का भी आकार गढ़ते हैं। प्रशासन का यह कदम न केवल कला को नई पहचान देगा बल्कि शिल्पकारों की आजीविका को भी मजबूती देगा।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

हुनरमंदों के लिए नई सुबह की शुरुआत

यह समय है कि हम सब मिलकर इन कलाकारों के हाथों को और मजबूत करें। मिट्टी की कला न केवल पर्यावरण के लिए हितकारी है बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का माध्यम भी है। अपनी राय कॉमेंट करें और इस खबर को दोस्तों के साथ शेयर करें ताकि गढ़वा की यह अनमोल धरोहर दूर-दूर तक पहुंचे।

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गढ़वा

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