विस्थापन विवाद को लेकर गढ़वा में राजनीतिक घमासान, विधायक के बयान से गरमाई सियासत

विस्थापन विवाद को लेकर गढ़वा में राजनीतिक घमासान, विधायक के बयान से गरमाई सियासत

author Sonu Kumar
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#गढ़वा #विस्थापन_विवाद : मंडल डैम और डूब क्षेत्र के मुद्दे पर बैठक में तीखे आरोप और विरोध सामने आए।

गढ़वा जिले के रंका प्रखंड के विश्रामपुर और बड़गड़ पंचायत में डूब क्षेत्र विस्थापन को लेकर आयोजित बैठक में स्थानीय ग्रामीणों और कुटकु मंडल डैम क्षेत्र के लोगों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। बैठक में विस्थापन नीति, जमीन आवंटन और पेसा कानून के अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। विधायक ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार पर आदिवासी हितों की अनदेखी और ऐतिहासिक अस्तित्व से जुड़े मामलों को कमजोर करने का आरोप लगाया।

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  • रंका प्रखंड के विश्रामपुर और बड़गड़ पंचायत में हुई ग्रामीण बैठक।
  • कुटकु मंडल डैम डूब क्षेत्र के विस्थापन मुद्दे पर हुआ विरोध।
  • विधायक ने सरकार पर आदिवासी अधिकारों के हनन का आरोप लगाया।
  • ग्रामीणों ने रोजगार और जमीन को लेकर चिंता जताई।
  • पेसा कानून और ग्रामसभा अनुमति को लेकर उठे सवाल।

गढ़वा जिले के रंका प्रखंड अंतर्गत विश्रामपुर और बड़गड़ पंचायत क्षेत्र में आयोजित बैठक में मंडल डैम डूब क्षेत्र के विस्थापन को लेकर बड़ा विवाद सामने आया। बैठक में स्थानीय ग्रामीणों, डूब क्षेत्र से आए लोगों और जनप्रतिनिधियों के बीच विस्थापन नीति और जमीन आवंटन को लेकर गंभीर चर्चा हुई।

बैठक में स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोगों ने कहा कि कुटकु मंडल डैम डूब क्षेत्र से विस्थापित किए जा रहे परिवारों को विश्रामपुर और बलीगढ़ क्षेत्र में बसाने की योजना से स्थानीय जनजीवन और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ग्रामीणों ने आशंका जताई कि इससे जंगल आधारित जीवन और रोजगार प्रभावित होगा।

वहीं डूब क्षेत्र से आए लोगों ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि उनके पास लगभग 20 एकड़ भूमि होने के बावजूद सरकार उन्हें मात्र 1 एकड़ भूमि उपलब्ध करा रही है, जो जीवन यापन के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विस्थापन प्रक्रिया में पेसा कानून के प्रावधानों की अनदेखी की जा रही है।

ग्रामीणों की चिंताओं पर सामने आए अलग-अलग पक्ष

बैठक में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी समस्याएं रखीं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना था कि बड़े पैमाने पर विस्थापन से उनके संसाधन और रोजगार प्रभावित होंगे, जबकि डूब क्षेत्र के लोग पुनर्वास नीति को लेकर असंतोष जता रहे थे।

ग्रामीणों ने यह भी कहा कि किसी भी विस्थापन से पहले ग्रामसभा की अनुमति आवश्यक होती है, लेकिन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी देखी जा रही है।

ग्रामीणों ने कहा: “हमारे जीवन का आधार जंगल और जमीन है, इसे प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।”

विधायक का सरकार पर तीखा आरोप

बैठक में शामिल स्थानीय विधायक ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आदिवासी समुदाय के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है और उनके अस्तित्व को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है।

उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए यह भी कहा गया कि पलामू क्षेत्र में आदिवासी संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है और वर्तमान नीतियां उसी दिशा में चिंता पैदा कर रही हैं।

विधायक ने कहा: “सरकार आदिवासी हितों की अनदेखी कर रही है और उनके अधिकारों पर चोट पहुंचा रही है।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन विस्थापन प्रक्रिया में बलपूर्वक कार्रवाई कर रहा है और ग्रामीणों की सहमति को नजरअंदाज किया जा रहा है।

पेसा कानून और ग्रामसभा को लेकर उठे सवाल

बैठक में पेसा कानून के अनुपालन को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। डूब क्षेत्र से आए लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

ग्रामीणों ने मांग की कि किसी भी विस्थापन प्रक्रिया में ग्रामसभा की सहमति और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।

प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल

बैठक में यह भी कहा गया कि विस्थापन से पहले उचित पुनर्वास नीति और पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराना आवश्यक है, ताकि प्रभावित परिवारों का जीवन प्रभावित न हो।

ग्रामीणों ने कहा कि अगर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

आंदोलन की चेतावनी

विधायक ने चेतावनी दी कि यदि विस्थापन और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो गढ़वा से रांची तक आंदोलन किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा।

विधायक ने कहा: “हम अपने अधिकारों के लिए हर स्तर पर संघर्ष करेंगे।”

न्यूज़ देखो: विस्थापन और विकास के बीच संतुलन की चुनौती

यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि विकास परियोजनाओं और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। मंडल डैम जैसे प्रोजेक्ट वर्षों से विस्थापन और पुनर्वास को लेकर चर्चा में रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर समाधान आज भी चुनौती बना हुआ है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

#आदिवासी_अधिकार : विकास के नाम पर संवाद और सहमति सबसे जरूरी

किसी भी विकास परियोजना की सफलता केवल निर्माण से नहीं बल्कि प्रभावित लोगों के विश्वास और सहमति से तय होती है। संवाद और पारदर्शिता के बिना समाधान अधूरा रहता है।

स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना ही स्थायी विकास की दिशा है। लोग भी अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझकर आगे आएं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाएं।

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Written by

गढ़वा

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