#सिमडेगा #धार्मिकसमितिपुनर्गठन : मां वनदुर्गा मंदिर को शक्तिपीठ आस्था केंद्र बनाने पर हुआ विस्तार एवं नई जिम्मेदारियां तय।
सिमडेगा जिले के बोलबा प्रखंड स्थित मां वनदुर्गा मंदिर समिति का पुनर्गठन पूज्य स्वामी उमाकांत दास जी महाराज की उपस्थिति में किया गया। इस बैठक में समिति का विस्तार करते हुए नए संरक्षक और मार्गदर्शक पदों की घोषणा की गई। कार्यक्रम में मंदिर को पर्यटन स्थल के बजाय शक्तिपीठ आस्था केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया। आगामी एक जून को मासिक बैठक में आगे की कार्य योजना पर चर्चा की जाएगी।
- बोलबा प्रखंड के मां वनदुर्गा मंदिर समिति का पूज्य स्वामी उमाकांत दास जी की उपस्थिति में पुनर्गठन।
- स्वामी उमाकांत दास जी को बनाया गया मुख्य संरक्षक, संजय मिश्रा बने मुख्य मार्गदर्शक।
- समिति में कई नए सक्रिय सदस्यों एवं संरक्षकों का किया गया विस्तार।
- मंदिर को पर्यटन स्थल नहीं बल्कि शक्तिपीठ आस्था केंद्र बनाने पर दिया गया जोर।
- आगामी 1 जून को मासिक बैठक में आगे की कार्य योजना पर होगी चर्चा।
- धार्मिक और सांस्कृतिक विकास को लेकर क्षेत्र में उत्साह का माहौल।
सिमडेगा जिले के बोलबा प्रखंड अंतर्गत प्रसिद्ध धार्मिक एवं दार्शनिक स्थल मां वनदुर्गा मंदिर समिति का पुनर्गठन गुरुवार को अपराह्न 2 बजे किया गया। इस अवसर पर पूज्य स्वामी उमाकांत दास जी महाराज की विशेष उपस्थिति रही, जिनकी देखरेख में समिति का विस्तार और नई जिम्मेदारियों का निर्धारण किया गया।
बैठक में क्षेत्र के विभिन्न गांवों से आए श्रद्धालुओं और समिति सदस्यों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। इस पुनर्गठन को मंदिर के विकास और धार्मिक गतिविधियों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
समिति का विस्तार और नई जिम्मेदारियां
इस अवसर पर कई नए सदस्यों को समिति में शामिल किया गया। इनमें सोमारू सिंह (भंडार टोली), बालगोविंद सिंह (बेड़ा टोली), विश्वनाथ सिंह (नवा टोली), कृष्ण सिंह (लेटर टोली) और रामप्रसाद सिंह (महुआ टोली) शामिल हैं।
इसके साथ ही संरक्षक पदों पर ज़हूरण सिंह (बनटोली) और नीलांबर महतो (डीपा टोली) को जिम्मेदारी दी गई, जबकि ज्योतिष आचार्य संजय मिश्रा को मुख्य मार्गदर्शक के रूप में चयनित किया गया।
स्वामी उमाकांत दास जी का मार्गदर्शन
कार्यक्रम के दौरान पूज्य स्वामी उमाकांत दास जी महाराज ने आशीर्वचन देते हुए कहा कि मां वनदुर्गा मंदिर को केवल एक पर्यटक स्थल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक शक्तिपीठ और आस्था के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं से मंदिर की धार्मिक गरिमा और परंपरा को बनाए रखने का आह्वान किया।
आगामी योजनाओं पर चर्चा की तैयारी
समिति अध्यक्ष ने जानकारी दी कि आगामी 1 जून को मासिक बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें मंदिर के विकास, धार्मिक कार्यक्रमों और भविष्य की कार्य योजना पर विस्तृत चर्चा की जाएगी।
इस बैठक को लेकर समिति सदस्यों और ग्रामीणों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
क्षेत्रीय सहभागिता और सामाजिक एकता
इस कार्यक्रम में गजेंद्र रौतीया, रूपलाल रौतीया, कलिंदर रौतिया, बलराम रौतिया, हरिराम रौतिया, केसरी रौतिया, रविंद्र रौतिया, महेंद्र रौतिया, जगरनाथ रौतिया, ललन रौतिया सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।
स्थानीय लोगों ने मंदिर समिति के पुनर्गठन को धार्मिक एकता और सामाजिक समरसता के लिए एक सकारात्मक कदम बताया।
न्यूज़ देखो: आस्था और विकास का संतुलित प्रयास
मां वनदुर्गा मंदिर समिति का पुनर्गठन केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का प्रयास है। जब किसी धार्मिक स्थल को शक्तिपीठ के रूप में विकसित करने की बात होती है, तो उसमें श्रद्धा के साथ-साथ जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। ऐसे प्रयास समाज में आस्था को संगठित करने का कार्य करते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
आस्था को संरक्षित करें, परंपरा को आगे बढ़ाएं
धार्मिक स्थलों का संरक्षण केवल समिति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।
जब समाज एकजुट होकर संस्कृति और आस्था की रक्षा करता है, तभी परंपराएं जीवित रहती हैं।
आइए, मिलकर अपने धार्मिक धरोहरों को सशक्त बनाएं और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।
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