खुरा गांव में पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया सरहुल पर्व, मांदर की थाप पर झूमे ग्रामीण

खुरा गांव में पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया सरहुल पर्व, मांदर की थाप पर झूमे ग्रामीण

author Akram Ansari
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#लातेहार #सरहुल_पर्व : खुरा गांव में प्रकृति पूजा के साथ पारंपरिक रीति-रिवाज निभाए गए।

बरवाडीह प्रखंड के खुरा गांव में आदिवासी समाज का प्रकृति पर्व सरहुल पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में सरना स्थल पहुंचे, जहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर गांव की सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की गई। पर्व के दौरान मांदर की थाप पर युवक-युवतियां पारंपरिक नृत्य और गीतों में शामिल हुए। पूरे गांव में सांस्कृतिक उत्साह और सामाजिक एकता का माहौल देखने को मिला।

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  • खुरा गांव में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया सरहुल पर्व।
  • सरना स्थल पर बैगा ने विधि-विधान से की पूजा-अर्चना।
  • गांव की सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की गई।
  • मांदर की थाप पर युवक-युवतियां पारंपरिक नृत्य में हुए शामिल।
  • बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ग्रामीणों ने लिया उत्सव में हिस्सा।
  • ग्रामीणों ने सरहुल को प्रकृति और संस्कृति से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व बताया।

लातेहार जिले के बरवाडीह प्रखंड अंतर्गत ग्राम खुरा में रविवार को आदिवासी समाज का प्रमुख प्रकृति पर्व सरहुल हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। गांव में सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला। ग्रामीण पारंपरिक परिधानों में सज-धज कर सरना स्थल पहुंचे और पूरे श्रद्धाभाव के साथ पूजा-अर्चना में शामिल हुए।

सरहुल पर्व को लेकर गांव में विशेष उत्साह देखने को मिला। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी इस सांस्कृतिक आयोजन में शामिल हुए और प्रकृति के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।

सरना स्थल पर हुई पारंपरिक पूजा

सरहुल पर्व के अवसर पर गांव के सरना स्थल पर बैगा द्वारा विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई गई। पूजा के दौरान गांव की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की गई।

ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति के अनुसार जल, जंगल और जमीन के प्रति आभार व्यक्त किया। पूजा के दौरान वातावरण पूरी तरह धार्मिक और सांस्कृतिक रंग में रंगा नजर आया।

ग्रामीणों ने कहा: “सरहुल पर्व प्रकृति और संस्कृति से जुड़ी हमारी पहचान का प्रतीक है, जिसे हम हर वर्ष पूरे उत्साह से मनाते हैं।”

मांदर की थाप पर झूमे युवक-युवतियां

पूजा-अर्चना के बाद गांव में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। युवक-युवतियां मांदर की थाप पर पारंपरिक नृत्य और लोकगीतों में झूमते नजर आए। गांव की गलियों और चौक-चौराहों पर पारंपरिक संगीत और नृत्य का उत्साह देखने को मिला।

स्थानीय लोगों ने बताया कि सरहुल पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

पूरे गांव में दिखा उत्सव जैसा माहौल

सरहुल पर्व के दौरान पूरे खुरा गांव में उल्लास का वातावरण बना रहा। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से पर्व का आनंद लिया और आपसी भाईचारे का संदेश दिया। महिलाएं पारंपरिक परिधानों और आभूषणों में विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रहीं।

बच्चों और युवाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। गांव में पारंपरिक खान-पान और सामूहिक मेल-मिलाप का भी आयोजन किया गया।

प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक है सरहुल

ग्रामीणों ने बताया कि सरहुल पर्व आदिवासी समाज की प्रकृति के प्रति आस्था और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का संदेश देता है और लोगों को प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा भी देता है।

आदिवासी समाज में सरहुल का विशेष महत्व है, क्योंकि यह नई फसल, हरियाली और प्रकृति के नवजीवन का उत्सव माना जाता है।

शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ आयोजन

ग्रामीणों के सहयोग और सहभागिता से पूरा आयोजन शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। गांव के लोगों ने एकजुट होकर पर्व को सफल बनाया और सामाजिक एकता का परिचय दिया।

स्थानीय लोगों ने कहा कि ऐसे पारंपरिक पर्व समाज को जोड़ने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

न्यूज़ देखो: प्रकृति और संस्कृति से जुड़ी पहचान को सहेजने का पर्व

सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और सामाजिक एकता का जीवंत उत्सव है। आधुनिकता के दौर में भी गांवों में पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखना समाज के लिए सकारात्मक संकेत है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का संदेश देने वाला यह पर्व आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक बन गया है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

अपनी संस्कृति और परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं

पारंपरिक पर्व और लोक संस्कृति समाज की असली पहचान होते हैं। अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं को सहेजना केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य विरासत छोड़ने जैसा है। प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण का संदेश देने वाले ऐसे पर्व समाज को सकारात्मक दिशा देते हैं।

अपनी सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व करें, स्थानीय परंपराओं को बढ़ावा दें और समाज में भाईचारे का संदेश फैलाएं। इस खबर को अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें और सरहुल पर्व से जुड़ी अपनी यादें कमेंट में जरूर बताएं।

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बरवाडीह, लातेहार

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