#डुमरी #पेयजलसंकट : आदिम जनजाति परिवारों को आज भी नहीं मिल रहा स्वच्छ पेयजल।
गुमला जिले के डुमरी प्रखंड स्थित औरापाठ माचाडीपा गांव में लाखों रुपये की लागत से बनी सोलर आधारित पेयजल योजना पर गंभीर सवाल उठे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण में भारी अनियमितता और लापरवाही के कारण योजना शुरू होने के कुछ ही समय बाद बंद हो गई। आदिम जनजाति परिवार आज भी स्वच्छ पेयजल के लिए लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने मामले की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
- औरापाठ माचाडीपा में ₹13.42 लाख की सोलर जलापूर्ति योजना पर सवाल।
- पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडल, गुमला के तहत हुआ था निर्माण।
- ग्रामीणों का आरोप— निर्माण के एक माह बाद ही बंद हो गई योजना।
- हीरा कंस्ट्रक्शन पर घटिया कार्य और लापरवाही का आरोप।
- आदिम जनजाति परिवारों को पानी के लिए एक किलोमीटर दूर जंगल जाना पड़ रहा है।
- ग्रामीणों ने उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग उठाई।
गुमला जिले के आकांक्षी प्रखंड डुमरी के उदनी पंचायत अंतर्गत औरापाठ माचाडीपा गांव में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। जिला प्रशासन द्वारा गोद लिए गए इस गांव में आदिम जनजाति परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबसे गंभीर स्थिति पेयजल व्यवस्था की है, जहां लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद ग्रामीणों को स्वच्छ पानी नसीब नहीं हो रहा।
ग्रामीणों का आरोप है कि करोड़ों नहीं तो लाखों रुपये की सरकारी योजनाओं के बावजूद उनकी जिंदगी में कोई ठोस बदलाव नहीं आया। जिस सोलर आधारित पेयजल योजना से गांव को राहत मिलने की उम्मीद थी, वह आज बंद पड़ी है और ग्रामीण फिर पुराने संकटों से जूझ रहे हैं।
13 लाख से अधिक की लागत से बनी थी योजना
जानकारी के अनुसार पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडल, गुमला द्वारा जिला अनबद्ध निधि से औरापाठ माचाडीपा में ₹13,42,184 की लागत से सोलर आधारित पेयजलापूर्ति योजना का निर्माण कराया गया था। इस कार्य का जिम्मा गुमला के संवेदक हीरा कंस्ट्रक्शन को दिया गया था।
योजना का उद्देश्य गांव के आदिम जनजाति परिवारों को घर के नजदीक स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना था। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण कार्य में गंभीर अनियमितताएं बरती गईं और योजना शुरू होने के कुछ ही समय बाद पूरी तरह ठप हो गई।
निर्माण में गंभीर अनियमितता का आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि योजना के निर्माण के दौरान उनकी राय तक नहीं ली गई। गांव के बुजुर्ग मानु कोरवा और श्रीमती कोरवाइन ने बताया कि कुएं का निर्माण ऐसे स्थान पर कर दिया गया जहां बारिश के दौरान नाली का गंदा पानी सीधे उसमें प्रवेश कर सकता है।
उनका कहना है कि तकनीकी मानकों के अनुसार कुएं को पर्याप्त गहराई तक नहीं खोदा गया। इसके बजाय आसपास पड़े पत्थरों को जमा कर ढांचा तैयार कर दिया गया और ऊपर से सीमेंट का लेप चढ़ाकर निर्माण पूरा दिखा दिया गया।
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य केवल कागजों पर गुणवत्तापूर्ण दिखाया गया, जबकि वास्तविकता में योजना शुरू से ही कमजोर आधार पर खड़ी थी।
सोलर योजना बनी शोपीस
ग्रामीणों के अनुसार योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सोलर सिस्टम भी सही तरीके से काम नहीं कर रहा है। टंकी का निर्माण तो किया गया, लेकिन उसमें पानी चढ़ना बंद हो गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि सोलर पैनल भी ऐसे स्थान पर लगाए गए हैं जहां रखरखाव और निगरानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। नतीजतन पूरी योजना कुछ ही समय में बेकार साबित हो गई।
पानी के लिए जंगलों का सफर
योजना बंद होने के बाद गांव के लोगों की मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं। आदिम जनजाति परिवारों को आज भी पानी के लिए करीब एक किलोमीटर दूर जंगलों के रास्ते जाना पड़ता है।
ग्रामीणों ने बताया कि दिनभर मजदूरी और जंगल से लकड़ी लाने के बाद शाम को पानी की व्यवस्था के लिए अलग संघर्ष करना पड़ता है। कई बार रात के अंधेरे में पानी लाने के दौरान जंगली जानवरों का भी खतरा बना रहता है।
ग्रामीणों का कहना है: “सरकार ने पानी की सुविधा देने का वादा किया था, लेकिन आज भी हमें जंगलों में भटककर पानी लाना पड़ रहा है।”
आदर्श गांव के दावों पर उठे सवाल
औरापाठ माचाडीपा गांव को जिला प्रशासन द्वारा आदर्श गांव के रूप में गोद लिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि गोद लिए गए गांव की यह स्थिति है, तो अन्य दूरस्थ गांवों की हालत का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक निरीक्षण और योजनाओं की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन धरातल पर उनका लाभ नहीं पहुंचता। इससे लोगों में सरकारी योजनाओं के प्रति निराशा बढ़ रही है।
ग्रामीणों ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग
ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। उनका कहना है कि यदि निर्माण कार्य में अनियमितता और भ्रष्टाचार पाया जाता है तो जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
ग्रामीणों ने यह भी मांग की कि बंद पड़ी योजना को जल्द चालू कराया जाए और गांव में स्थायी एवं सुरक्षित पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
मौके पर विरोध जताने वालों में दुर्गा कोरवा, श्रीमती कोरवा, अश्मिता देवी, संध्या बाई, मनु कोरवा, राकेश कोरवा, मदन कोरवा, भैरव कोरवा, आनंद कोरवा, रामदयाल कोरवा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।
न्यूज़ देखो: योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब लाभ जमीन तक पहुंचे
औरापाठ माचाडीपा की यह तस्वीर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आदिम जनजाति परिवारों के लिए बनाई गई योजना यदि कुछ ही समय में बंद हो जाए तो यह केवल तकनीकी विफलता नहीं बल्कि जवाबदेही का भी विषय है। प्रशासन को चाहिए कि वह मामले की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाए और ग्रामीणों को बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराए। आखिर विकास का वास्तविक अर्थ वही है जो अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
स्वच्छ पानी हर नागरिक का अधिकार है
पेयजल केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की मूल आवश्यकता है।
दूरदराज के गांवों तक योजनाओं का सही लाभ पहुंचना ही सुशासन की पहचान है।
यदि किसी योजना में गड़बड़ी दिखे तो जागरूक नागरिक बनकर आवाज उठाना भी जरूरी है।
ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान तभी होगा जब समाज और प्रशासन मिलकर जवाबदेही सुनिश्चित करें।
आप इस मामले को कैसे देखते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें, खबर को अधिक से अधिक लोगों तक साझा करें और ग्रामीण क्षेत्रों की बुनियादी समस्याओं को सामने लाने की इस पहल में सहभागी बनें।

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