#महुआडांड़ #शिक्षा_संकट : नेतरहाट के गांवों में बच्चे अभावों के बीच शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
लातेहार जिले के नेतरहाट क्षेत्र के आधे और कोरगी गांवों में बच्चे आज भी कठिन पहाड़ी रास्तों, भूख और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच शिक्षा हासिल करने को मजबूर हैं। गांव में स्कूल नहीं होने के कारण मासूमों को रोज कई किलोमीटर दूर दुरूप गांव तक पैदल जाना पड़ता है। बिजली, सड़क और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। पर्यटन के लिए प्रसिद्ध नेतरहाट की खूबसूरती के पीछे छिपी यह सच्चाई प्रशासनिक दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
- आधे और कोरगी गांव के बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए रोज पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ता है।
- कई बच्चे बिना चप्पल और खाली पेट कई किलोमीटर पैदल चलकर शिक्षा हासिल करने जाते हैं।
- बरसात में उफनते नाले और फिसलन भरे रास्ते बच्चों के लिए बड़ा खतरा बन जाते हैं।
- गांवों में अब भी सड़क, बिजली और स्थानीय स्कूल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
- ग्रामीणों ने प्रशासन से गांव में स्कूल और सड़क निर्माण की मांग उठाई है।
- कठिन हालात के बावजूद बच्चों की आंखों में बेहतर भविष्य के सपने अब भी जिंदा हैं।
महुआडांड़ प्रखंड अंतर्गत नेतरहाट क्षेत्र के आधे और कोरगी गांवों की तस्वीर एक बार फिर ग्रामीण इलाकों में शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति को सामने ला रही है। एक ओर नेतरहाट अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सूर्योदय और पर्यटन स्थलों के कारण देशभर में पहचान बना चुका है, वहीं दूसरी ओर इन्हीं पहाड़ियों के बीच बसे गांवों के बच्चे आज भी शिक्षा के लिए रोज संघर्ष कर रहे हैं। यहां बच्चों का हर दिन कठिन रास्तों, भूख और अभावों से लड़ते हुए गुजरता है।
पहाड़ों के बीच शिक्षा तक पहुंचना बना चुनौती
आधे और कोरगी गांवों में प्राथमिक विद्यालय नहीं होने के कारण बच्चों को रोज दुरूप गांव स्थित स्कूल तक पैदल जाना पड़ता है। यह सफर सामान्य नहीं, बल्कि जोखिमों से भरा होता है। पथरीले पहाड़ी रास्ते, उबड़-खाबड़ पगडंडियां और कई किलोमीटर की दूरी छोटे बच्चों के लिए रोज की परीक्षा बन चुकी है।
सुबह होते ही गांवों में मासूम कदम स्कूल की ओर बढ़ने लगते हैं। कई बच्चों के पैरों में चप्पल तक नहीं होती। कोई पुराने बैग में किताबें लेकर चलता है, तो कोई फटी कॉपियों के सहारे अपने सपनों को जिंदा रखने की कोशिश करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों को शिक्षा के लिए इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ना बेहद दुखद है। कई बार रास्तों की स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि बच्चों को स्कूल पहुंचाना मुश्किल हो जाता है।
बरसात में और भयावह हो जाते हैं हालात
बरसात के मौसम में इन गांवों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। रास्तों में बहने वाले छोटे नाले उफान पर आ जाते हैं और पगडंडियां कीचड़ से भर जाती हैं। ऐसे में बच्चों का स्कूल जाना जान जोखिम में डालने जैसा हो जाता है।
कई बार बच्चे रास्ते में फिसलकर घायल हो जाते हैं। अभिभावकों का कहना है कि डर के कारण उन्हें कई दिनों तक बच्चों को घर में ही रोकना पड़ता है। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ता है।
ग्रामीणों के अनुसार, यदि गांव में ही स्कूल की व्यवस्था हो जाए तो बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है और उन्हें रोज इस खतरनाक सफर से नहीं गुजरना पड़ेगा।
भूख और गरीबी के बीच पल रहे सपने
इन गांवों में आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर है। कई परिवार ऐसे हैं जो बच्चों को सुबह भरपेट भोजन तक नहीं दे पाते। बच्चे खाली पेट स्कूल के लिए निकल पड़ते हैं। ऐसे में स्कूल में मिलने वाला मिड-डे मील ही उनके लिए सबसे बड़ा सहारा बन जाता है।
लेकिन जब खराब मौसम या अन्य कारणों से बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते, तब उन्हें भोजन भी नहीं मिल पाता। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार की योजनाओं की चर्चा तो होती है, लेकिन उसका लाभ जमीनी स्तर तक सही तरीके से नहीं पहुंच पा रहा है।
एक ग्रामीण ने बताया कि कई परिवार मजदूरी और जंगल पर निर्भर हैं। रोज कमाने और खाने की स्थिति में बच्चों की पढ़ाई को लगातार जारी रखना भी बड़ी चुनौती बन गया है।
पर्यटन की चमक, गांवों में अंधेरा
नेतरहाट को झारखंड का ‘क्वीन ऑफ छोटानागपुर’ कहा जाता है। यहां हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं और खूबसूरत वादियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। लेकिन इन्हीं पर्यटन स्थलों के आसपास बसे गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
रात होते ही गांव अंधेरे में डूब जाते हैं। बिजली की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चे ढिबरी, लालटेन या लकड़ी की रोशनी में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। तेज हवा या बारिश के दौरान वह रोशनी भी बुझ जाती है और बच्चों की पढ़ाई अधूरी रह जाती है।
स्थानीय युवाओं का कहना है कि आज के डिजिटल दौर में भी गांव में मोबाइल नेटवर्क तक सही से उपलब्ध नहीं है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा या आधुनिक संसाधनों का लाभ मिलना संभव नहीं हो पाता।
एक स्थानीय युवक ने कहा: “मोबाइल में शहरों के बड़े स्कूल और सुविधाएं दिखती हैं, लेकिन हमारे गांव में आज भी सड़क और नेटवर्क तक नहीं है।”
वर्षों से विकास के केवल दावे
ग्रामीणों के अनुसार, कई बार प्रशासनिक अधिकारी गांव पहुंचे और सर्वे भी किया गया। योजनाओं की घोषणाएं हुईं, लेकिन जमीन पर स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। गांवों में सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, बिजली और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं अब भी अधूरी हैं।
लोगों का कहना है कि यदि गांव तक सड़क बन जाए और प्राथमिक विद्यालय की व्यवस्था कर दी जाए तो बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है। ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से जल्द ठोस पहल करने की मांग की है।
ग्रामीणों ने कहा: “बच्चों को पढ़ने के लिए पहाड़ नहीं, स्कूल चाहिए। विकास केवल कागजों में नहीं, गांव तक दिखना चाहिए।”
कठिन हालात के बावजूद जिंदा हैं उम्मीदें
सभी मुश्किलों के बावजूद बच्चों के सपने अब भी जिंदा हैं। दिनभर संघर्ष के बाद जब बच्चे शाम को गांव लौटते हैं, तब भी उनके चेहरे पर आगे बढ़ने की उम्मीद दिखाई देती है।
बृज्या समुदाय की एक बच्ची ने कहा कि वह पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी बनना चाहती है ताकि अपने गांव की हालत बदल सके। यह केवल एक बच्ची का सपना नहीं, बल्कि उन हजारों ग्रामीण बच्चों की आवाज है जो बेहतर भविष्य की उम्मीद में हर दिन संघर्ष कर रहे हैं।
इन मासूम बच्चों की कहानी केवल गरीबी की नहीं, बल्कि जिद, हौसले और शिक्षा के प्रति उनकी चाहत की भी कहानी है। यह तस्वीर प्रशासन और समाज दोनों से गंभीर सवाल पूछती है कि आखिर विकास की रोशनी इन गांवों तक कब पहुंचेगी।
न्यूज़ देखो: नेतरहाट की तस्वीर का दूसरा सच
नेतरहाट की खूबसूरती देशभर में प्रसिद्ध है, लेकिन उसके आसपास बसे गांवों की वास्तविक स्थिति विकास के दावों की पोल खोल रही है। शिक्षा, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बच्चों का भविष्य संघर्ष में गुजर रहा है। यह केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उन दूरस्थ क्षेत्रों की कहानी है जहां आज भी विकास पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है। अब जरूरत केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर तेज और प्रभावी कार्रवाई की है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
बच्चों के सपनों तक विकास की रोशनी पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी
हर बच्चे को सुरक्षित रास्ता, बेहतर स्कूल और सम्मानजनक जीवन मिलना उसका अधिकार है।
गांवों की समस्याओं को केवल खबर बनाकर नहीं, समाधान तक पहुंचाकर ही बदलाव संभव होगा।
यदि समाज और प्रशासन मिलकर प्रयास करें तो कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा।
आज जरूरत है कि दूरदराज गांवों की आवाज को मजबूती से उठाया जाए।
आपको क्या लगता है, ऐसे गांवों में सबसे पहले कौन सी सुविधा पहुंचनी चाहिए?
अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें।
इस खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं ताकि इन मासूम बच्चों की आवाज प्रशासन तक पहुंचे।

🗣️ Join the Conversation!
What are your thoughts on this update? Read what others are saying below, or share your own perspective to keep the discussion going. (Please keep comments respectful and on-topic).