#गुमला #जनजातीय_समागम : दिल्ली से लौटे प्रतिनिधियों का ग्रामीणों ने पारंपरिक स्वागत किया।
दिल्ली में आयोजित जनजातीय समागम से लौटे प्रतिनिधिमंडल का गुमला जिले के पुसो थाना क्षेत्र में ग्रामीणों ने भव्य स्वागत किया। आदिवासी नेता सोमेश्वर उरांव के नेतृत्व में गए जत्थे के स्वागत में ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक नृत्य का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान डीलिस्टिंग, जनजातीय अधिकारों और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर समाज की एकजुटता देखने को मिली। ग्रामीणों ने जनजातीय पहचान और परंपराओं की रक्षा के लिए संगठित होकर संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया।
- दिल्ली से लौटे जनजातीय प्रतिनिधिमंडल का पुसो थाना क्षेत्र में पारंपरिक स्वागत किया गया।
- आदिवासी नेता सोमेश्वर उरांव के नेतृत्व में डीलिस्टिंग कार्यक्रम में शामिल हुआ था जत्था।
- ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ा, नृत्य और पुष्प वर्षा के साथ जत्थे का किया स्वागत।
- कार्यक्रम में कार्तिक उरांव, भगवान बिरसा मुंडा और तेलंगा खड़िया के नारों से गूंजा गांव।
- ग्रामीणों ने जनजातीय अधिकार, संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए एकजुट रहने का संकल्प लिया।
- बड़ी संख्या में महिला-पुरुष एवं युवा स्वागत कार्यक्रम में शामिल हुए।
गुमला जिले के सिसई प्रखंड अंतर्गत पुसो थाना क्षेत्र के निजमा सीधा टोली गांव में मंगलवार देर रात जनजातीय समाज की एकजुटता और सांस्कृतिक उत्साह का अनोखा दृश्य देखने को मिला। दिल्ली में आयोजित डीलिस्टिंग कार्यक्रम में शामिल होकर लौटे प्रतिनिधिमंडल का ग्रामीणों ने भव्य स्वागत किया। आदिवासी नेता सोमेश्वर उरांव के नेतृत्व में दिल्ली गए सदस्यों के गांव पहुंचते ही पूरा क्षेत्र ढोल-नगाड़ों, नृत्य और नारों से गूंज उठा। ग्रामीणों ने पुष्प वर्षा कर उनका अभिनंदन किया और समाज की एकता का संदेश दिया।
ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक नृत्य से गूंज उठा गांव
रात करीब एक बजे प्रतिनिधिमंडल के गांव पहुंचते ही ग्रामीण बड़ी संख्या में स्वागत के लिए जुट गए। महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों ने पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य प्रस्तुत किया। स्वागत के दौरान पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल बन गया। ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हुए जनजातीय संस्कृति की झलक पेश की।
स्वागत कार्यक्रम के दौरान “कार्तिक उरांव अमर रहे”, “भगवान बिरसा मुंडा अमर रहे” और “वीर शहीद तेलंगा खड़िया अमर रहे” जैसे नारे लगातार लगाए जाते रहे। इन नारों ने पूरे वातावरण को जोश और उत्साह से भर दिया।
डीलिस्टिंग मुद्दे पर समाज की एकजुटता
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों ने डीलिस्टिंग के मुद्दे पर अपनी एकजुटता दिखाई। उपस्थित लोगों ने एक स्वर में कहा कि जनजातीय समाज अपने अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष करेगा।
ग्रामीणों ने कहा कि धर्मांतरण और जनजातीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर समाज को जागरूक और संगठित रहने की आवश्यकता है। लोगों ने कहा कि यदि समाज समय रहते एकजुट नहीं हुआ तो भविष्य में जनजातीय पहचान और संस्कृति पर संकट गहरा सकता है।
सोमेश्वर उरांव ने समाज को किया जागरूक
आदिवासी नेता सोमेश्वर उरांव ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए समाज की एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज को अपने अस्तित्व, परंपरा और संस्कृति की रक्षा के लिए संगठित होकर आगे बढ़ना होगा।
सोमेश्वर उरांव ने कहा: “यदि हम समय रहते नहीं जागे तो जनजातीय समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। हमें अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।”
उन्होंने कहा कि समाज की मजबूती उसकी एकता में है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से जोड़ना आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
जनजातीय संस्कृति संरक्षण का दिया संदेश
कार्यक्रम में शामिल लोगों ने जनजातीय संस्कृति, भाषा और परंपराओं के संरक्षण को लेकर भी चर्चा की। ग्रामीणों ने कहा कि समाज को आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी मजबूत बनाए रखना होगा।
स्वागत कार्यक्रम के दौरान युवाओं की सक्रिय भागीदारी विशेष रूप से देखने को मिली। ग्रामीणों ने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक विरासत और महापुरुषों के संघर्षों की जानकारी देना आवश्यक है।
बड़ी संख्या में जुटे ग्रामीण
कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में महिला-पुरुष और युवा शामिल हुए। ग्रामीणों ने पूरे उत्साह के साथ प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया और सामाजिक एकजुटता का परिचय दिया।
कार्यक्रम के दौरान गांव का माहौल पूरी तरह उत्सवमय बना रहा। लोगों ने नृत्य और गीतों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को प्रदर्शित किया।
न्यूज़ देखो: जनजातीय पहचान को लेकर बढ़ रही सामाजिक जागरूकता
दिल्ली से लौटे प्रतिनिधिमंडल के स्वागत कार्यक्रम ने यह साफ कर दिया कि जनजातीय समाज अब अपनी पहचान, अधिकार और संस्कृति को लेकर अधिक जागरूक हो रहा है। समाज के लोग अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए एकजुटता दिखा रहे हैं। ऐसे आयोजन केवल स्वागत कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक बनते जा रहे हैं। अब देखने वाली बात होगी कि जनजातीय समाज से जुड़े मुद्दों पर सरकार और प्रशासन किस प्रकार सकारात्मक पहल करता है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अपनी संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए समाज की एकता जरूरी
समाज तभी मजबूत बनता है जब लोग अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़े रहते हैं। जनजातीय संस्कृति केवल एक समुदाय की पहचान नहीं बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। युवाओं को अपनी भाषा, परंपरा और इतिहास के प्रति जागरूक रहना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी पहचान पर गर्व कर सकें।
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