#बरवाडीह #वन्यजीव_संरक्षण : पलामू टाइगर रिजर्व में वैज्ञानिक तरीके से वन्यजीवों की निगरानी की गई।
पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) के कोर और बफर क्षेत्रों में वन्यजीवों की गतिविधियों के आकलन के लिए एक दिवसीय वाटरहोल गणना अभियान चलाया गया। भीषण गर्मी के बीच जलस्रोतों पर आने वाले वन्यजीवों की 14 घंटे तक लगातार निगरानी की गई। अभियान में वन विभाग के कर्मियों, ट्रैकर्स और स्वयंसेवकों ने भाग लिया। इस गणना से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग भविष्य में वन्यजीव संरक्षण, जल प्रबंधन और शिकार विरोधी रणनीति को मजबूत करने में किया जाएगा।
- पलामू टाइगर रिजर्व में एक दिवसीय वाटरहोल गणना अभियान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
- भीषण गर्मी में जलस्रोतों पर आने वाले वन्यजीवों की 14 घंटे तक लगातार निगरानी की गई।
- अभियान में वन कर्मियों, ट्रैकर्स एवं प्रकृति प्रेमी स्वयंसेवकों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।
- प्रारंभिक रिपोर्ट में हाथी, तेंदुआ, गौर, चीतल, सांभर, भालू और सियार की गतिविधियां दर्ज हुईं।
- मचानों और छलावरण तकनीक की मदद से वन्यजीवों की गतिविधियों का वैज्ञानिक अवलोकन किया गया।
- पीटीआर प्रबंधन ने कहा कि आंकड़ों का उपयोग वाटरहोल प्रबंधन और शिकार विरोधी तंत्र को मजबूत करने में होगा।
बरवाडीह स्थित पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) में वन्यजीव संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी को लेकर एक महत्वपूर्ण अभियान चलाया गया। भीषण गर्मी के दौरान जंगलों में जलस्रोतों पर आने वाले वन्यजीवों की गतिविधियों को रिकॉर्ड करने के उद्देश्य से एक दिवसीय वाटरहोल गणना अभियान आयोजित किया गया। इस अभियान के तहत पीटीआर के कोर एवं बफर क्षेत्रों में चयनित जलस्रोतों पर 14 घंटे तक लगातार निगरानी रखी गई। वन विभाग के अधिकारियों ने इसे वन्यजीव संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया है।
वैज्ञानिक तरीके से हुई वन्यजीवों की निगरानी
वाटरहोल गणना अभियान के दौरान वन विभाग ने आधुनिक एवं पारंपरिक दोनों तकनीकों का उपयोग किया। जंगलों में विभिन्न जलस्रोतों के पास मचान बनाए गए और छलावरण तकनीक के जरिए वन्यजीवों की गतिविधियों का सूक्ष्म अवलोकन किया गया। अभियान में शामिल टीमों ने बिना वन्यजीवों को परेशान किए उनकी आवाजाही, संख्या और व्यवहार का रिकॉर्ड तैयार किया।
वन विभाग के अनुसार गर्मी के मौसम में जंगलों में जलस्रोत वन्यजीवों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन जाते हैं। ऐसे समय में जलस्रोतों पर निगरानी रखने से वन्यजीवों की वास्तविक उपस्थिति और उनकी गतिविधियों का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।
हाथी, तेंदुआ और भालू समेत कई वन्यजीव दिखे सक्रिय
प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार अभियान के दौरान कई महत्वपूर्ण वन्यजीवों की सक्रियता दर्ज की गई। इनमें हाथी, तेंदुआ, गौर, चीतल, सांभर, कोटरा, भालू और सियार प्रमुख रूप से शामिल हैं। वन अधिकारियों का कहना है कि यह संकेत देता है कि पीटीआर क्षेत्र में जैव विविधता अब भी मजबूत स्थिति में है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार जलस्रोतों पर वन्यजीवों की उपस्थिति जंगल की पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संतुलन को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इससे यह भी पता चलता है कि जंगल के विभिन्न हिस्सों में जल की उपलब्धता और वन्यजीवों की निर्भरता किस स्तर पर है।
वन कर्मियों और स्वयंसेवकों ने निभाई अहम भूमिका
अभियान में वन विभाग के अधिकारियों और कर्मियों के साथ ट्रैकर्स एवं प्रकृति प्रेमी स्वयंसेवकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगातार 14 घंटे तक जंगल के भीतर रहकर निगरानी करना चुनौतीपूर्ण कार्य माना जाता है। इसके बावजूद टीमों ने पूरी सतर्कता और समर्पण के साथ कार्य किया।
पीटीआर प्रबंधन ने बताया कि इस तरह के अभियानों में स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित ट्रैकर्स की भूमिका काफी अहम होती है, क्योंकि उन्हें जंगल और वन्यजीवों की गतिविधियों की बेहतर जानकारी होती है।
भविष्य की योजनाओं में होगा आंकड़ों का उपयोग
पीटीआर के डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जेना ने बताया कि इस अभियान से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग भविष्य की संरक्षण योजनाओं में किया जाएगा।
डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जेना ने कहा: “वाटरहोल गणना से प्राप्त आंकड़े वन्यजीवों की वास्तविक गतिविधियों को समझने में मदद करेंगे। इन आंकड़ों के आधार पर वाटरहोल प्रबंधन, कृत्रिम जल आपूर्ति और शिकार विरोधी तंत्र को और अधिक मजबूत बनाया जाएगा।”
उन्होंने कहा कि गर्मी के मौसम में जलस्रोतों की उपलब्धता वन्यजीवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए पीटीआर क्षेत्र में जरूरत पड़ने पर कृत्रिम जलस्रोतों की व्यवस्था भी की जाती है।
वन्यजीव संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा अभियान
विशेषज्ञों का मानना है कि वाटरहोल गणना जैसे अभियान वन्यजीव संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इससे जंगल में वन्यजीवों की संख्या, उनके मूवमेंट और निवास क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिलती है। साथ ही शिकार रोकने और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने में भी मदद मिलती है।
पलामू टाइगर रिजर्व झारखंड के प्रमुख वन्यजीव क्षेत्रों में से एक है और यहां बाघ, हाथी, तेंदुआ सहित कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। ऐसे में वैज्ञानिक निगरानी और संरक्षण आधारित गतिविधियां जंगल की जैव विविधता को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।
न्यूज़ देखो: जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए जरूरी है वैज्ञानिक निगरानी
पीटीआर में चलाया गया वाटरहोल गणना अभियान यह दिखाता है कि वन्यजीव संरक्षण अब केवल पारंपरिक तरीकों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक पद्धतियों को भी प्राथमिकता दी जा रही है। जंगलों में जलस्रोतों की स्थिति, वन्यजीवों की आवाजाही और उनकी जरूरतों को समझे बिना प्रभावी संरक्षण संभव नहीं है। ऐसे अभियान वन विभाग को भविष्य की योजनाएं बनाने में मदद करते हैं और शिकार जैसी घटनाओं को रोकने में भी सहायक साबित होते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
प्रकृति बचेगी तो भविष्य सुरक्षित रहेगा
जंगल, वन्यजीव और जलस्रोत हमारी प्राकृतिक धरोहर हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति का दायित्व है। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण और प्राकृतिक संतुलन मिल सकेगा।
वन्यजीवों के संरक्षण और पर्यावरण बचाने के लिए जागरूक बनें, पेड़ लगाएं और जंगलों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों का विरोध करें।
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