गढ़वा की जीवनदायिनी सरस्वती नदी बनी बदबूदार नाला: 25 साल की बर्बादी पर भड़का जनता का आक्रोश

गढ़वा की जीवनदायिनी सरस्वती नदी बनी बदबूदार नाला: 25 साल की बर्बादी पर भड़का जनता का आक्रोश

author Avinash Kumar
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#गढ़वा #सरस्वती_नदी : पवित्र विरासत को बचाने और पुनरुत्थान के लिए उठे तीखे सवाल।

गढ़वा शहर के बीच से बहने वाली पवित्र सरस्वती नदी पिछले 25 वर्षों में प्रशासनिक उदासीनता के कारण कचरे के डंपिंग यार्ड में बदल चुकी है। नगर परिषद के गठन के 20 साल बाद भी करोड़ों का बजट साफ-सफाई के नाम पर गायब हो गया। अब स्थानीय जनता और नए परिषद अध्यक्ष से नदी के पुनरुत्थान के लिए युद्ध स्तर पर कार्रवाई की मांग की जा रही है।

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  • गढ़वा की जीवनदायिनी सरस्वती नदी पिछले 25 वर्षों में प्रशासनिक और जन उदासीनता के कारण एक बदबूदार नाले में तब्दील हुई।
  • लगभग 20 वर्ष पूर्व गठित नगर परिषद के कार्यकाल में करोड़ों का बजट आने के बावजूद नदी की स्थिति लगातार बदतर होती गई।
  • श्मशान घाट पर शेड के शिलान्यास के बीच नदी के मूल कचरा प्रबंधन और स्वच्छता को लेकर जनता ने उठाए गंभीर सवाल।
  • स्थानीय नागरिकों द्वारा नदी को पर्सनल डस्टबिन की तरह इस्तेमाल करने से इसमें प्लास्टिक और कूड़े का अंबार लगा।
  • नए परिषद अध्यक्ष से युद्ध स्तर पर घेराबंदी, सफाई अभियान और कचरा फेंकने वालों पर भारी जुर्माना लगाने की मांग।

झारखंड के गढ़वा जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी सरस्वती नदी आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। आज से ठीक 25 साल पहले जिस नदी की कल-कल गूंजती साफ धारा दूर से ही सुनाई देती थी, वह आज पूरी तरह से एक कचरे के डंपिंग यार्ड के रूप में बदल चुकी है। इस भारी तबाही को लेकर अब गढ़वा की जागरूक जनता के भीतर आक्रोश भड़क उठा है। लोग पिछले दो से तीन दशकों के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर सीधे तीखे सवाल खड़े कर रहे हैं। यह मुद्दा केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि गढ़वा की आने वाली पीढ़ी के भविष्य और उसकी अनमोल विरासत की रक्षा से जुड़ा हुआ है।

25 सालों की प्रशासनिक उदासीनता और जन प्रतिनिधियों की चुप्पी

गढ़वा के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले 25 वर्षों के दौरान जिले ने कई विधायक, मंत्री और बड़े प्रशासनिक अधिकारी देखे। हर चुनाव में इस पवित्र नदी के संरक्षण और इसकी सफाई को एक बड़ा मुद्दा बनाया गया, लेकिन चुनाव बीतते ही सारे वादे ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। नेताओं ने सिर्फ वोट बटोरने के लिए इस जीवनदायिनी नदी के नाम का इस्तेमाल किया, जबकि धरातल पर इसके संरक्षण के लिए कोई भी ठोस या दीर्घकालिक नीति लागू नहीं की गई।

समय-समय पर बदले जनप्रतिनिधियों और हुक्मरानों को इस गंभीर समस्या की पूरी जानकारी थी, लेकिन इसके बावजूद किसी ने भी नदी को इस दुर्दशा से निकालने के लिए वास्तविक प्रयास नहीं किए। नतीजतन, जो नदी कभी प्रकृति की असली खूबसूरती का अहसास कराती थी, वह आज केवल एक बदबूदार नाले के रूप में बहने को विवश है।

नगर परिषद के 20 साल और करोड़ों के बजट का रहस्य

गढ़वा को नगर परिषद बने लगभग 20 साल का लंबा समय बीत चुका है। इस दो दशक की अवधि के दौरान न जाने कितने प्रशासनिक अधिकारी, कार्यपालक पदाधिकारी और अफसर गढ़वा में आए और अपना ट्रांसफर कराकर चले गए। हर साल नगर परिषद को शहर की साफ-सफाई, नालियों के निर्माण और जल स्रोतों के संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया जाता रहा है।

नागरिकों का आरोप है कि सफाई के नाम पर आया यह सारा पैसा कागजी खानापूर्ति और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर गायब हो गया। यदि इस बजट का एक छोटा हिस्सा भी पूरी ईमानदारी के साथ सरस्वती नदी की गाद निकालने, इसकी घेराबंदी करने और इसके किनारों को सुंदर बनाने में खर्च किया गया होता, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। अधिकारियों के आते-जाते रहने के सिलसिले के बीच नदी का हाल सुधरने के बजाय लगातार और भी बदतर होता चला गया।

श्मशान घाट के शेड का शिलान्यास और जनता के बुनियादी सवाल

हाल ही में नदी के तट पर स्थित श्मशान घाट पर शेड निर्माण के लिए किए गए शिलान्यास को लेकर भी जनता के मन में गहरे सवाल उठ रहे हैं। लोगों का मानना है कि जनता की सहूलियत के लिए श्मशान घाट पर शेड और अन्य सुविधाओं का विकास किया जाना पूरी तरह से जायज और स्वागत योग्य कदम है, लेकिन क्या केवल इस प्रतीकात्मक शिलान्यास से नदी के भीतर जमा टनों कचरा भी साफ हो जाएगा?

सरस्वती नदी गढ़वा की एक ऐतिहासिक विरासत है, जिसे भूतकाल के अधिकारियों और नेताओं ने औपचारिक रूप से मरने के लिए छोड़ दिया था। आज की तारीख में जनता सीधे वर्तमान प्रशासनिक तंत्र और नए परिषद अध्यक्ष की ओर देख रही है। लोगों का सवाल है कि क्या वर्तमान के नए परिषद अध्यक्ष और आज की जागरूक जनता मिलकर इस मरती हुई नदी के पुनरुत्थान के लिए कोई ठोस, साहसिक और ऐतिहासिक कदम नहीं उठा सकते?

जन भागीदारी का अभाव: जनता भी इस पाप में बराबर की दोषी

इस नदी को नाले में तब्दील करने के इस महापाप में केवल राजनेता या प्रशासनिक अधिकारी ही दोषी नहीं हैं, बल्कि गढ़वा की आम जनता भी बराबर की जिम्मेदार है। स्थानीय नागरिकों ने अपनी ही जीवनदायिनी नदी को एक पर्सनल डस्टबिन (कूड़ेदान) समझ लिया है। लोग अपने घरों का सारा प्लास्टिक, सड़ा-गला कूड़ा-कचरा और गंदगी बिना किसी संकोच के सीधे नदी की धारा में प्रवाहित कर देते हैं। इस नागरिक गैर-जिम्मेदारी के कारण नदी का दम पूरी तरह से घुट चुका है। जब तक जनता अपनी इस सोच को नहीं बदलेगी, तब तक कोई भी सरकारी योजना इस नदी को पुनर्जीवित नहीं कर सकती।

न्यूज़ देखो: राजनीतिक इच्छाशक्ति और नागरिक चेतना की अग्निपरीक्षा

सरस्वती नदी की यह दर्दनाक स्थिति गढ़वा के पूरे सिस्टम की विफलता को उजागर करती है। यह कहानी बयां करती है कि कैसे विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच एक पूरी नदी को प्रशासनिक लापरवाही और बिचौलियों के भ्रष्टाचार की वेदी पर चढ़ा दिया गया। क्या केवल श्मशान घाट के शेड चमका देने से हमारी मुख्य पर्यावरण चुनौतियां समाप्त हो जाएंगी? न्यूज़ देखो यह साफ मानता है कि नए नगर परिषद अध्यक्ष को अब पुरानी गलतियों को सुधारते हुए इस नदी के पुनरुद्धार को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाना होगा। क्या प्रशासन अब भी चैन की नींद सोता रहेगा या सरस्वती नदी को बचाने के लिए कोई ठोस कानूनी और धरातलीय कदम उठाएगा?
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

विरासत को बचाएं जीवनदायिनी सरस्वती नदी को नया जीवन दें

हमारी नदियां केवल जल का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे हमारी सभ्यता, संस्कृति और अस्तित्व की पहचान होती हैं। आज यदि हम अपनी ही जीवनदायिनी का गला घोंटते रहे, तो आने वाली पीढ़ी हमारे इस अपराध को कभी माफ नहीं करेगी। वक्त आ गया है कि नगर परिषद अपनी कुंभकर्णी नींद से जागे और इस पवित्र नदी की युद्ध स्तर पर घेराबंदी और मुकम्मल सफाई की व्यवस्था शुरू करे। इसके साथ ही नदी को प्रदूषित करने और इसमें कचरा फेंकने वालों पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाने का कड़ा नियम लागू होना चाहिए। आइए, गढ़वा के नागरिक होने के नाते हम सब मिलकर कसम खाएं कि इस नदी को अब और गंदा नहीं होने देंगे और इसे इसका पुराना गौरव वापस दिलाएंगे।

यदि आप भी गढ़वा के इस कड़वे सच और सरस्वती नदी के पुनरुत्थान की इस मुहिम से पूरी तरह सहमत हैं, तो अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर दर्ज करें। इस लेख को बिना रुके सोशल मीडिया और वाट्सएप पर इतना शेयर करें कि इसकी गूंज सीधे रांची के आला हुक्मरानों से लेकर गढ़वा के नीति-निर्धारकों के कानों तक पहुंचे और इस पवित्र विरासत को बचाने के लिए एक जन-आंदोलन की शुरुआत हो सके। आपकी एक शेयरिंग इस सोई हुई व्यवस्था को जगाने में बड़ा माध्यम बन सकती है।

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