पारंपरिक स्वशासन की मिसाल बना मूली पड़हा जतरा, गुमला में एकजुट हुए समाज के अगुवा

पारंपरिक स्वशासन की मिसाल बना मूली पड़हा जतरा, गुमला में एकजुट हुए समाज के अगुवा

author News देखो Team
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#गुमला #पड़हा_जतरा : पारंपरिक स्वशासन और संस्कृति संरक्षण पर दिया गया जोर।

गुमला जिले में मूली पड़हा द्वारा आयोजित एक दिवसीय पड़हा जतरा सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जिसमें विभिन्न गांवों के पारंपरिक पदाधिकारी और सामाजिक अगुवा शामिल हुए। कार्यक्रम में पड़हा व्यवस्था को क्षेत्र का पारंपरिक संविधान बताते हुए उसके संरक्षण और सशक्तिकरण पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने पेसा कानून और ग्रामसभा की भूमिका पर भी चर्चा की। इस आयोजन ने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक एकजुटता का संदेश दिया।

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  • मूली पड़हा, गुमला द्वारा एक दिवसीय पड़हा जतरा का आयोजन।
  • विभिन्न गांवों के महतो, बैगा, पहान, पुजार, कोटवार सहित पदाधिकारी शामिल।
  • देवराम भगत ने पड़हा को क्षेत्र का संविधान बताया।
  • देवेन्द्र लाल उराँव ने पेसा कानून के उल्लंघन पर जताई चिंता।
  • नगर परिषद अध्यक्ष शंकुतला उराँव ने संस्कृति संरक्षण पर दिया जोर।
  • कई सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक प्रतिनिधियों की रही भागीदारी।

गुमला जिले में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से मूली पड़हा द्वारा एक दिवसीय पड़हा जतरा का आयोजन किया गया। इस आयोजन में विभिन्न गांवों के महतो, बैगा, पहान, पाइन, भरवा, पुजार, बेल, देवान और कोटवार सहित खोड़हा दल के सदस्य, सामाजिक कार्यकर्ता एवं राजनीतिक अगुवा बड़ी संख्या में शामिल हुए।

कार्यक्रम में पारंपरिक पड़हा व्यवस्था की महत्ता, उसके ऐतिहासिक स्वरूप और वर्तमान समय में इसके संरक्षण की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान उपस्थित वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि पड़हा केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि गांव की संस्कृति, न्याय व्यवस्था और पहचान का आधार है।

पड़हा को बताया गया क्षेत्र का संविधान

कार्यक्रम की शुरुआत मूली पड़हा के बेल देवराम भगत के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि पड़हा व्यवस्था हमारे क्षेत्र का पारंपरिक संविधान है, जिसे भारतीय संविधान में भी मान्यता प्राप्त है।

देवराम भगत ने कहा: “पड़हा हमारे क्षेत्र का संविधान है और यह हमारी पहचान एवं परंपरा का आधार है।”

उन्होंने सभी लोगों से इस व्यवस्था को सशक्त और संरक्षित रखने की अपील की।

पेसा कानून के उल्लंघन पर जताई चिंता

मूली पड़हा के कोटवार देवेन्द्र लाल उराँव ने अपने वक्तव्य में पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि वर्ष 1996 में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के लिए पेसा कानून लागू किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका सही पालन नहीं हो रहा है।

देवेन्द्र लाल उराँव ने कहा: “ग्राम सभा के गठन में गैर पारंपरिक लोगों का दबाव बढ़ रहा है, जो पेसा कानून का उल्लंघन है।”

उन्होंने पारंपरिक व्यवस्था को मजबूत करने और ग्रामसभा की स्वायत्तता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

जल, जंगल और जमीन की रक्षा में पड़हा की भूमिका

मूली देवान चुंइया कुजूर ने पड़हा व्यवस्था की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि यह व्यवस्था 12 जाति और 36 समुदायों को जोड़कर संचालित करती है।

चुंइया कुजूर ने कहा: “पड़हा जल, जंगल, जमीन, भाषा और संस्कृति की रक्षा का मजबूत आधार है।”

उन्होंने इसे सामाजिक न्याय और सामुदायिक संतुलन का प्रमुख स्तंभ बताया।

जनप्रतिनिधियों ने भी दिया समर्थन

कार्यक्रम में शामिल नगर परिषद अध्यक्ष शंकुतला उराँव ने कहा कि अपनी संस्कृति, धरोहर और परंपरा को संरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।

शंकुतला उराँव ने कहा: “सामाजिक और राजनीतिक अगुवाओं को मिलकर हमारी विरासत को बचाना होगा।”

वहीं जिला परिषद उपाध्यक्ष संयुक्ता देवी ने कहा कि पड़हा व्यवस्था गांव की शक्ति का प्रतीक है और लोकतंत्र देश की मजबूती का आधार।

पड़हा के पुनर्गठन और विस्तार पर जोर

पदा पड़हा के बेल राजू उराँव ने अपने संबोधन में कहा कि पड़हा व्यवस्था पूर्वजों की देन है, जिसे बाबा कार्तिक उराँव और भिखराम भगत ने वर्ष 1962 में पुनर्गठित किया था।

राजू उराँव ने कहा: “हर गांव, प्रखंड और जिला स्तर पर पड़हा का गठन आवश्यक है।”

उन्होंने इस व्यवस्था को व्यापक स्तर पर मजबूत करने की अपील की।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी

इस कार्यक्रम में मूली पड़हा के सोनो मिंज, गौरी किण्डो, फूलमनी उराँव, पुष्पा उराँव, राजबेल उराँव, महेन्द्र उराँव, शांति देवी, शांति मिंज सहित कई सदस्य उपस्थित रहे।
साथ ही सच्चिदानंदन उराँव, विनोद मिंज, खेदू नायक, बिरजू नगेसिया, रामवतार भगत, हिन्दू भगत, राम उराँव, बलराम उराँव समेत अन्य लोगों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई।

डांडा पड़हा के अजय उराँव, महाबीर उराँव, शशिकांत उराँव, राजेश उराँव, संत कुमार भगत, जगजीवन भगत, विमल राम भगत, झाड़ी भगत सहित विभिन्न गांवों के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

इस आयोजन ने सामाजिक एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और पारंपरिक व्यवस्था के महत्व को एक बार फिर सामने रखा।

न्यूज़ देखो: परंपरा और आधुनिक व्यवस्था के बीच संतुलन की जरूरत

पड़हा जतरा का यह आयोजन दर्शाता है कि आज भी ग्रामीण समाज में पारंपरिक स्वशासन की गहरी जड़ें हैं। यह व्यवस्था न केवल सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखती है, बल्कि सामाजिक न्याय और सामुदायिक संतुलन भी सुनिश्चित करती है। हालांकि, पेसा कानून के सही क्रियान्वयन और पारंपरिक संस्थाओं के संरक्षण पर अभी भी गंभीरता से काम करने की जरूरत है। क्या आने वाले समय में प्रशासन और समाज मिलकर इस व्यवस्था को और मजबूत कर पाएंगे? हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

अपनी जड़ों से जुड़ें, संस्कृति को बचाएं और आगे बढ़ाएं

पड़हा जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं हमें हमारी पहचान और मूल्यों से जोड़ती हैं।
आज जरूरत है कि हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को समझें और उन्हें सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।
सामाजिक एकता और जागरूकता ही किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है।
आइए, मिलकर अपने गांव, समाज और संस्कृति को मजबूत बनाएं।

आपकी क्या राय है पारंपरिक व्यवस्था और पेसा कानून को लेकर? कमेंट में जरूर बताएं, इस खबर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करें और अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाने में भागीदार बनें।

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