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लावालौंग में 21 मार्च को प्राकृतिक सरहुल पूजा, खरवार भोगता समाज की बैठक में बनी रूपरेखा

#लावालौंग #चतरा #सरहुलपर्व : बैठक में सरहुल पूजा और नीलांबर-पीतांबर शहादत दिवस मनाने की तैयारी।

चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड में प्राकृतिक सरहुल पर्व की तैयारी शुरू हो गई है। खरवार भोगता समाज की बैठक में 21 मार्च को पारंपरिक तरीके से सरहुल पूजा मनाने की रूपरेखा तय की गई। इसके साथ ही 28 मार्च को नीलांबर-पीतांबर शहादत दिवस कार्यक्रम को लेकर भी समाज के लोगों ने रणनीति बनाई।

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  • लावालौंग प्रखंड मुख्यालय में खरवार भोगता समाज की बैठक आयोजित।
  • 21 मार्च को प्राकृतिक सरहुल पर्व धूमधाम से मनाने का निर्णय।
  • 28 मार्च को नीलांबर-पीतांबर शहादत दिवस मनाने की तैयारी।
  • बैठक की अध्यक्षता गुल्ली सिंह भोगता, संचालन टिकेंद्र गंझू ने किया।
  • कार्यक्रम में समाज के सैकड़ों लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने का आह्वान।

चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड मुख्यालय स्थित अनुसूचित जनजाति आवासीय विद्यालय के समीप सरहुल बर के नीचे खरवार भोगता समाज की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में आगामी प्राकृतिक सरहुल पर्व और नीलांबर-पीतांबर शहादत दिवस को लेकर विस्तृत चर्चा की गई।

बैठक की अध्यक्षता समाज के सांस्कृतिक टीम के केंद्रीय अध्यक्ष गुल्ली सिंह भोगता ने की, जबकि संचालन समाज के प्रखंड उपाध्यक्ष टिकेंद्र गंझू ने किया। बैठक में समाज के लोगों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी सरहुल पर्व को पारंपरिक रीति-रिवाज और उत्साह के साथ मनाया जाएगा।

21 मार्च को मनाया जाएगा सरहुल पर्व

बैठक में तय किया गया कि आगामी 21 मार्च को प्राकृतिक सरहुल पूजा का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर समाज के लोग पारंपरिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करेंगे और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करेंगे।

समाज के लोगों ने बताया कि सरहुल पर्व आदिवासी समाज की संस्कृति और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक है। इस दिन लोग प्रकृति की पूजा कर अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और समाज की खुशहाली की कामना करते हैं।

बैठक में यह भी तय किया गया कि कार्यक्रम में समाज के अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी, ताकि पर्व को सामूहिक रूप से भव्य तरीके से मनाया जा सके।

28 मार्च को मनाया जाएगा नीलांबर-पीतांबर शहादत दिवस

बैठक में 28 मार्च को नीलांबर-पीतांबर शहादत दिवस मनाने को लेकर भी चर्चा की गई। समाज के लोगों ने बताया कि पिछले वर्षों में यह कार्यक्रम जिला स्तर पर आयोजित किया जाता था, लेकिन इस वर्ष इसे राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित किया जाएगा।

इस कार्यक्रम में झारखंड के विभिन्न जिलों से आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में शामिल होंगे। समाज के लोगों ने कहा कि यह दिन आदिवासी वीरों के बलिदान को याद करने और उनके संघर्ष को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर होता है।

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समाज की एकता पर दिया गया बल

बैठक में वक्ताओं ने समाज की एकता और सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरहुल जैसे पर्व समाज को एकजुट करने और अपनी पहचान को मजबूत करने का अवसर देते हैं।

समाज के वरिष्ठ सदस्यों ने युवाओं से भी अपील की कि वे अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास को समझें तथा उसे आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।

कई सदस्य रहे उपस्थित

इस बैठक में समाज के कई पदाधिकारी और सदस्य उपस्थित रहे। इनमें मुख्य रूप से चंदू गंझू, कामाख्या सिंह भोगता, जोगेंद्र गंझू, संतोष भोगता, राजेंद्र मुंडा, सरवन मुंडा, सुरेंद्र गंझू, बैजनाथ गंझू, जेपी गंझू, गोपाल गंझू, हजारी गंझू सहित सैकड़ों समाज के लोग शामिल हुए।

न्यूज़ देखो: परंपरा और संस्कृति को जीवित रखने का पर्व

सरहुल पर्व आदिवासी समाज की प्रकृति के प्रति आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। ऐसे आयोजनों से न केवल परंपराएं जीवित रहती हैं, बल्कि समाज की एकता और सांस्कृतिक चेतना भी मजबूत होती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

संस्कृति से जुड़ाव ही समाज की असली ताकत

जब समाज अपनी संस्कृति और इतिहास को याद रखता है, तभी उसकी पहचान मजबूत होती है। सरहुल जैसे पर्व हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जीवन के महत्व का संदेश देते हैं।

ऐसे आयोजनों में भाग लेकर नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ती है और समाज की परंपराएं आगे बढ़ती हैं।

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Binod Kumar

लावालोंग, चतरा

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